My Voice: बदलनी चाहिये दूल्हे के सहिवाला बनाने की चयन प्रक्रिया
[प्रभांशु ओझा] हालांकि कहने को आजकल शादी का मौसम नहीं है, पर दिल्ली में शादियों के कार्ड मिल रहे हैं। दिल्ली या उत्तर भारत की बारातों में तो कुछ पता ही नहीं चल पाता की कौन आम है और कौन खास। पूर्वांचल की बारातों में आपकी महत्ता आपको दिए गए दायित्वों से तय होती है। बारात पक्ष में सबसे ज्यादा मार सहिबाला बनने को लेकर होती है। यूपी में सहिबाला को सरवाला व शहगोला भी कहते हैं।
दूल्हे की अगर एक से अधिक बहनें व भाभियां तथा भांजे और भतीजे हैं तो यह तय करना बड़ा मुश्किल हो जाता है की इतना महान पद किसे दिया जाये। एक को मानाएं तो दूजा रूठ जाता है। जो भतीजा सहिबाला नहीं बन पाता वह तो नाराज़ होता ही है। साथ ही उनकी माएं यानी दूल्हे की बहनें व भाभियां भी नाराज़ हो जाती हैं। हों भी क्यूँ न सहिबाले जैसा मलाईदार पद फिर कहाँ मिलने वाला है।
बारात में सहिबाला सबसे ज्यादा लाइम लाइट में रहने वाला प्राणी होता है उसपर सबकी निगाहें टिकी होती हैं। दूल्हा तो एक जगह फिक्स हो चूका होता है जबकि सहिबाले में अपार संभावनाएं छिपी होती हैं। दूल्हे से ज्यादा प्रोटोकाल सहिबाले के लिए फॉलो किये जाते हैं, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखा जाता है। हंसी- मजाक ,नैन -मटक्के सब सहिबाले साहब से ही वो नाराज़ न होने पाएं इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता है।
बारात में सहिबाले की हैसियत प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव जैसी होती है, दूल्हा तो बस औपचारिकतायें निभाता है महत्वपूर्ण निर्णय सहिबाला ही लेता है या ऐसा उसे आभास कराया जाता है कि वह महत्वपूर्ण है।मगर इस पद के चयन की प्रक्रिया बहुत ही अलोकतांत्रिक है।
आम तौर पर सबसे बड़े बच्चे को यह पद सौंप दिया जाता है उनसे छोटे बस मन मसोस कर रह जाते हैं वह चाहते हुए भी विरोध नहीं कर पाते हैं। यह एक प्रथा है जो चलती आई है। बड़े के आगे छोटों की सारी योग्यताएं नजरंदाज कर दी जाती हैं वह भले ही अधिक योग्य और स्मार्ट क्यूँ न हों। मेरा मानना है कि सहिबाला तो एक ही बनेगा लेकिन कौन बनेगा इसके निर्धारण पर गंभीर विचार की आवश्यकता है।
समाज को इस तरफ सोचना होगा। आज तक मै कभी सहिबाला नहीं बन पाया और इस जीवन में इस सुख से वंचित रह गया आप न होने पाएं इसलिए अभी से तिकड़म भिड़ाने शुरू कर दीजिये। दूल्हा बनिये न बनिए सहिबाला जरूर बन जाइये।
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