Motivational Story: रूप-रंग नहीं, गुण हैं अधिक महत्वपूर्ण

नई दिल्ली। आज की दुनिया में व्यक्ति के रूप-रंग का इतना महत्व हो गया है कि गुणों का महत्व खो सा गया है। हर कोई बाहरी साज-सज्जा में, खुद को खूबसूरत दिखाने में लगा है। जो अपने रंग-रूप पर ध्यान नहीं दे रहा है, उसका सब मजाक उड़ाते हैं और उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। लेकिन क्या वाकई बाहरी चमक-दमक ही महत्व रखती है? व्यक्ति के गुणों का कोई मोल नहीं है?

रूप-रंग नहीं, गुण हैं अधिक महत्वपूर्ण

आज बड़ी ही प्यारी कथा के माध्यम से जानते हैं कि असल सच्चाई क्या है...

यह उस समय की बात है, जब समुद्र मंथन के बाद देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था और भगवान विष्णु से उनका विवाह पक्का हुआ था। पूरा स्वर्ग आनंद में डूबा था। भगवान विष्णु की बारात देवी लक्ष्मी के गृह नगर कुंदनपुर जाने वाली थी। इसे लेकर स्वर्ग में परम हर्ष का वातावरण था। कुंदनपुर की महत्ता और वैभव की बातें सबने सुन रखी थीं और देवता किसी भी तरह घरातियों से कम नहीं पड़ना चाहते थे। इसीलिए एक से एक गहने, कपड़े बनवाए जा रहे थे, सौंदर्य बढ़ाने के हर उपाय अपनाए जा रहे थे। सभी देवता अपनी तैयारियों से संतुष्ट थे, पर एक चिंता सबके मन में थी और इसका कारण थे श्री गणेश। गणेश जी के विशालकाय शरीर और उनकी अति भोजन की आदत से सभी परिचित थे और देवगण यह सोचकर ही लज्जित हो रहे थे कि गणपति उनकी बारात की सारी शोभा बिगाड़ देंगे।

गणेश बारात में जाने को बहुत उत्सुक थे

इसी बात पर चिंतन कर सभी देवता विष्णु भगवान के पास पहुंचे और उनसे विनती की कि गणेश जी को बारात में ना ले जाया जाए। विष्णु भगवान तो सृष्टि के रचयिता ठहरे, वे जानते थे कि इस कार्य का परिणाम क्या होगा? इसके बावजूद देवताओं की आंखें खोलने के लिए उन्होंने बात मान ली। गणेश जी जब बारात में जाने के लिए आए, तो विष्णु जी ने उनसे कहा कि आपको एक महत्वपूर्ण कार्यभार संभालना है। सभी कुंदनपुर चले जाएंगे, तो स्वर्ग की रक्षा कौन करेगा, सो आप यहीं रूककर देखभाल का जिम्मा उठाएं। गणेश जी बारात में जाने को बहुत उत्सुक थे, पर विष्णु जी की बात टाल भी नहीं सकते थे, सो वे स्वर्ग की देखभाल के लिए रूक गए। सबके जाने के बाद नारद जी स्वर्ग में आए और गणेश जी के पास जाकर सारी पोल खोल दी।

गणेश आग-बबूला हो गए

सारी सच्चाई जान गणेश जी आग-बबूला हो गए और उन्होंने अपनी मूषक सेना को बुला लिया। उन्होंने चूहों से कहा कि कुंदनपुर जाएं और जिस रास्ते से बारात जानी है, उसे अंदर से पूरा खोखला कर दें। चूहों ने रात ही रात में काम पूरा कर दिया। नियत समय पर बारात पूरी सज-धज के साथ निकली, पर रास्ते में पोली राह पर विष्णु जी का रथ धंस गया। देवताओं ने एड़़ी-चोटी का दम लगा लिया, पर रथ टस से मस ना हुआ। वहीं सड़क किनारे एक दुबला-पतला किसान खेत में काम कर रहा था। देवताओं को परेशान देख उसने मदद के लिए पूछा। देवताओं ने कहा कि हम सबसे ना हुआ, तो तुम क्या कर लोगे? किसान ने कहा कि मैं नहीं, मेरे गणेश सारे विघ्न हरेंगे। इतना कह कर उसने जय श्री गणेश, जय विघ्नहर्ता का जयकारा लगाया और एक ही झटके में रथ निकाल दिया।

रूप के मुकाबले गुण अधिक महत्वपूर्ण

अब विष्णु जी ने देवताओं की तरफ मुस्कुराकर देखा, देवता अपनी गलती पर पछताकर सीधे स्वर्ग दौड़े और गणेश जी को मना कर लाए। इस बार गणपति जी बारात में सबसे आगे रखे गए। अब किसी को भी गणपति जी का रूप, उनका बेडौल शरीर, उनका खान- पान नहीं अखर रहा था। सभी की समझ में यह बात आ गई थी कि रूप के मुकाबले गुण अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, तो देखा आपने, रूप चाहे जितना भी आकर्षक और साज-सज्जायुक्त हो, वह गुणों के मुकाबले ठहर नहीं सकता। तो आप भी अपने जीवन में इस सच को स्वीकारें और महत्व दें।

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