Ujjain's Mahakal temple: विश्वप्रसिद्ध महाकाल मंदिर के बारे में जानिए ये खास बातें
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नई दिल्ली। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध महाकाल मंदिर में स्थापित शिवलिंग में हो रहे क्षरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश दिए हैं, जिनके मुताबिक शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले जल की मात्रा तय करना और सिर्फ आरओ से शुद्ध किया जल चढ़ाया जाना शामिल हैं। कोर्ट ने कहा है कि श्रद्धालु 500 मिलीलिटर से ज्यादा जल नहीं चढ़ाएंगे। चढ़ाया जाने वाला जल सिर्फ RO का होगा और यही नहीं भस्म आरती के दौरान शिवलिंग को सूखे सूती कपड़े से पूरी तरह ढका जाएगा। हर श्रद्धालु को निश्चित मात्रा में दूध या पंचामृत चढ़ाने की इजाज़त होगी, शिवलिंग चीनी पाउडर की जगह खांडसारी लगाया जाएगा और बेलपत्र व फूल-पत्ती शिवलिंग के ऊपरी भाग में चढ़ेंगे, ताकि शिवलिंग के पत्थर को प्राकृतिक सांस लेने में कोई दिक्कत न हो और ड्रायर का प्रयोग होगा और शाम पांच बजे के बाद सूखी पूजा होगी। गौरतलब है कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती में कंडे की भस्म चढ़ाई जाती है, जिससे शिवलिंग का क्षरण हो रहा है, जिसके बाद कोर्ट ने ये आदेश दिया है।
चलिए जानते हैं महाकाल मंदिर के बारे में खास बातें

इंसान को मोक्ष मिलता है
आपको बता दें कि महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो कि मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में स्थित है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। ऐसी मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही इंसान को मोक्ष मिलता है। 235 ई. में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया।

इतिहास
इतिहास कहता है कि उज्जैन में 1690 ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 29 नवंबर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया था।

महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण
मराठों के शासनकाल में यहां दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटीं - पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा और सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया था।

महाकाल की आरती
आपको बता दें कि मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। यूं तो इस मंदिर का काफी महत्व है। यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन कुंभ के दौरान यहां भीड़ और भी अधिक बढ़ जाती है। महाकाल की आरती देखने के लिए केवल देश से ही नहीं बल्कि विदेश से भी लोग आते हैं।












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