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बस्तर में भी होती है जगन्नाथ स्वामी की 600 साल पुरानी रथयात्रा, जिसे कहते हैं गोंचा महापर्व !

वैसे में पुरी के जगन्नाथ मंदिर में होने वाली जगन्नाथ यात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है,लेकिन हम आपको छत्तीसगढ़ के बस्तर में 613 सालों से निकाली जाने वाली रथयात्रा के बारे में बताएंगे।

जगदलपुर,30 जून। ओड़िसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की उपासना के पर्व रथयात्रा का आगाज़ होने जा रहा है। इस साल रथ यात्रा की शुरुआत 01 जुलाई से होगी और समापन 12 जुलाई को होगा। हिंदू पंचांग के मुताबिक , हर साल आषाढ़ मास की द्वितीया तिथि को प्रभु जगन्नाथ स्वामी अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। वैसे में पुरी के जगन्नाथ मंदिर में होने वाली जगन्नाथ यात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है,लेकिन हम आपको छत्तीसगढ़ के बस्तर में 613 सालों से निकाली जाने वाली रथयात्रा के बारे में बताएंगे।

सैकड़ों साल पुराना है गोंचा महापर्व

सैकड़ों साल पुराना है गोंचा महापर्व

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भगवन जगन्नाथ के रथयात्रा महापर्व को गोंचा कहते हैं। यह त्यौहार यहां करीब 613 वर्षों से मनाया जा रहा है। जगदलपुर शहर में स्थित भगवान जगन्नाथ स्वामी के 6 गर्भगृह वाले मंदिर में गोंचा महापर्व चल रहा है। इस महापर्व में बस्तर राजपरिवार के सदस्यों के अलावा बस्तर अंचल के वनवासी आदिवासी भी शामिल होते हैं ।

बस्तर में अरण्यक ब्राह्मण समाज की तरफ से पिछले 600 वर्षों से गोंचा का पर्व मनाया जा रहा है। महाराज के शासनकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है।विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के बाद गोंचा पर्व को अंचल में दूसरा बड़ा पर्व माना जाता है।

रथ खींचने के पीछे है दिलचस्प कथा

रथ खींचने के पीछे है दिलचस्प कथा

जानकारी के मुताबिक वर्ष 1408 में तत्कालीन बस्तर के महाराजा पुरुषोत्तम देव लंबी यात्रा करके जगन्नाथपुरी पहुंचे थे। वह भगवान् कृष्ण की कृपा से ओडिसा में पुरी के तत्तकालीन राजा गजपति ने उन्हें रथपति की उपाधि देकर 16 पहियों वाला रथ दिया गया था। उस ज़माने में ख़राब सड़को के कारण रथ को खींचना आसान नहीं था,लिहाजा बस्तर महाराजा ने 16 पहियों वाले रथ को सुविधा मुताबिक तीन हिस्सों में विभक्त कर दिया गया। इस प्रकार हर साल चार पहिया वाले पहले रथ गोंचा के अवसर पर खींचा जाता है , वही दूसरे रथ को बस्तर दशहरा में फूल रथ के नाम से 6 दिवसों तक खींचा जाता है। इसी प्रकार 8 पहियों वाले रथ रैनी के दिन खींचा जाता है।

रियासतकालीन आभूषणों से होता है श्रृंगार

रियासतकालीन आभूषणों से होता है श्रृंगार

गोंचा के अवसर पर भगवान जगन्नाथ को हर साल रियासतकालीन चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है । इसके अलावा अरण्यक ब्राह्मण समाज की तरफ से भी भगवान जगन्नाथ के लिए 14 किलो भारी चांदी के आभूषण तैयार करवाया है। इनसे ही भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की कई मूर्तियों को सजाया किया जाता है।

गोंचा पर्व के दौरान जगदलपुर शहर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन को जनकपुर के मानकर में संवारा जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ 8 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दरमियान सिरहासार में कई धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मांगलिक कार्य किये जाते हैं। यहीं पर हरसाल आषाढ़ शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया जाता है।

बांस की बंदूक से दी जाती है सलामी

बांस की बंदूक से दी जाती है सलामी

रथयात्रा की धूम वैसे तो पूरी दुनिया में देखी जाती है , लेकिन बस्तर के गोंचा पर्व के दौरान भगवान जगन्नाथ को बांस से निर्मित तुपकी चला और विशेष प्रकार की आवाज कर भगवान को सलामी दी जाती है। इस प्रकार गोंचा और तुपकी एकदूसरे दे जुड़ चुके हैं । खासकर बच्चों को तुपकी की वजह से ही गोंचा महापर्व का इंतजार रहता है।

श्रीगोंचा और बाहूड़ा गोंचा के दिवस पर तुपकी चलाई जाती है। रथों पर सवार भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और बलभद्र की रथयात्रा के दिन तुपकी यानी बांस से बनी बंदूक से सलामी दी जाती है। बस्तर के ग्रामीण बांस की नली से तुपकी तैयार करते हैं,जिसमे जंगल में आये जाने वाले पेंग फल को बांस की नली में डाल कर छोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया से गोलियों तरह आवाज निकलती है।

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