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Success Mantra: वाणी बता देती है आपके संस्कार

By Pt. Gajendra Sharma
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नई दिल्ली। बोलना, बात करना, अपने विचार व्यक्त करना, ये दैनिक जीवन के सामान्य शिष्टाचार के आवश्यक अंग हैं। अपने आस-पड़ोस या परिचित से मिलते ही सबसे पहले नमस्कार या राम राम करना हमारे जीवन का सामान्य शिष्टाचार है। दुर्भाग्यवश जिनमें ये संस्कार नहीं होते, उन लोगों को भी वाणी का काम पड़ता है। यूं तो बोलना एक आम चीज है, पर अच्छा बोलना, मीठा बोलना एक अलग बात है। मीठी बोली स्वतः ही सबको आकर्षित कर लेती है। इतना ही नहीं, आपकी वाणी, आपका शब्द चयन आपके संस्कार और परिवार की गरिमा का भी बखान करते हैं। कोई भी अनुभवी व्यक्ति 5 मिनट आपसे बात करते ही आपके ज्ञान, आपके संस्कार और आपकी संगत के बारे में जान जाता है।

वाणी कैसे आपके जीवन का परिचय दे देती है, आइए, कथा के माध्यम से जानते हैं-

तोता ने अपना घोंसला बनाया था...

तोता ने अपना घोंसला बनाया था...

किसी राज्य में एक बड़े पेड़ पर एक तोता ने अपना घोंसला बनाया था। उसमें उसके दो छोटे छोटे बच्चे थे। एक दिन अचानक आंधी आई और घोंसला टूट गया। तोती का एक बच्चा पेड़ के एक तरफ और दूसरा अन्य दिशा में गिर गया। संयोग से एक तरफ से एक साधु महाराज निकले। उन्होंने तोती के बच्चे को उठाकर अपने कमंडल में रख लिया और चले गए। दूसरी तरफ से कुछ डाकू डाका डालकर निकल रहे थे। उनमें से एक डाकू की नजर तोती के दूसरे बच्चे पर पड़ गई और वह उसे अपने साथ ले गया।

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राजा अपनी प्रजा का हाल चाल जानने अकेले निकले

राजा अपनी प्रजा का हाल चाल जानने अकेले निकले

इस घटना को कई साल बीत गए। एक बार उस राज्य के राजा अपनी प्रजा का हाल चाल जानने अकेले निकले। रास्ते में वे एक नदी पर पानी पीने रूके। जैसे ही वह पानी पीने झुके, एक तोता जोर से चिल्लाया, काट डालो, मार डालो, लूट लो, जाने ना पाए। राजा को बड़ा विचित्र लगा और वह बिना पानी पिए आगे बढ़ गए। आगे जाकर उन्हें एक कुटिया दिखी। जैसे ही उन्होंने कुटिया के द्वार पर पैर रखे, एकदम से आवाज आई, पधारिए महाराज, कुटिया को अपनी चरण रज से पवित्र कीजिए। कलश में ठंडा जल रखा है, ग्रहण कीजिए। टोकनी में मीठे फल रखे हैं, कृपया ग्रहण कीजिए। साधु महाराज अभी आते ही होंगे। तब तक आप विश्राम कीजिए।

थोड़ी देर में ऋषि महाराज भी आ गए

थोड़ी देर में ऋषि महाराज भी आ गए

ऐसी मीठी वाणी सुनकर राजा का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने शीतल जल पिया, फलाहार किया और वहीं लेटकर तोते से बातें करने लगे। थोड़ी देर में ऋषि महाराज भी आ गए। राजा ने उनसे तोते ही अत्यधिक प्रशंसा करते हुए नदी के पास वाली घटना सुनाई और पूछा कि ऋषिवर, देखने में तो दोनों तोतों के रंग, आकार, प्रकार में कोई अंतर नहीं है, फिर वाणी में इतना अंतर क्यों? उनकी बात सुनकर साधु श्री ने हंसकर कहा कि महाराज, ये सब संगत का असर है। दोनों तोते असल में एक ही मां की जुड़वां संतानें हैं। वह डाकुओं की संगत में पड़ा, सो उसे वैसे संस्कार मिले। यह मेरे पास पला, बढ़ा, तो इसकी शिष्टता मनमोहक हो गई। राजा को साधु महाराज की बात बहुत पसंद आई। वे उस तोते की प्रशंसा करते हुए चले गए।

शिक्षा: तो देखा आपने। एक वाणी ने कैसे दोनों तोतों के पालन पोषण का रहस्य खोल दिया, उनके संस्कारों का परिचय दे दिया, उनके जन्म की कहानी कह दी। यही है वाणी का जादू, जो आपका वह परिचय भी दे देती है, जो आपके अंदर बसा है।

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