Soma Pradosh 2022: सोम प्रदोष आज, जानिए पूजा विधि और महत्व

नई दिल्ली, 14 फरवरी। भगवान शिव के व्रतों में सबसे प्रमुख प्रदोष व्रत होता है। प्रदोष व्रत से जीवन के बड़े से बड़े संकटों से मुक्ति पाई जा सकती है। आर्थिक, शारीरिक, पारिवारिक प्रत्येक प्रकार के संकटों का हल प्रदोष व्रत करने से हो जाता है। इस बार माघ माह के शुक्ल पक्ष में आ रहा प्रदोष व्रत अत्यंत विशेष है क्योंकिइस दिन अनेक प्रकार के शुभ संयोगों का योग हो रहा है। 14 फरवरी 2022 को आ रहे प्रदोष के दिन सोमवार है। सोमवार भगवान शिव का दिन होता है इसलिए इस दिन सोम प्रदोष का शुभ संयोग बना है। इस दिन नक्षत्रों का राजा और सभी कार्यो में सफलता दिलाने वाला परम पुण्यदायी पुष्य नक्षत्र भी है।

 Soma Pradosh 2022: पुष्य नक्षत्र और आयुष्मान-सौभाग्य योग में सोम प्रदोष का संयोग 14 फरवरी को

इस दिन आयु में वृद्धि करने वाला आयुष्मान योग और सौभाग्य प्रदान करने वाला सौभाग्य योग भी है। इस प्रदोष के दिन सर्वार्थसिद्धि और रवियोग का संगम भी हो रहा है। साथ ही भगवान शिव का परम प्रिय चंद्रमा अपनी ही राशि कर्क में भी रहने वाला है। इतने सारे संयोगों के कारण यह दिन सर्वकार्यो में सिद्धि देने वाला और जीवन के बड़े से बड़े सकटों को हल करने वाला दिन बन गया है।

त्रयोदशी तिथि रात्रि 8.29 बजे तक

14 फरवरी को त्रयोदशी तिथि रात्रि 8.29 बजे तक रहेगी। अर्थात् प्रदोषकाल में पूजन के लिए पूर्ण तिथि मिलेगी। इस दिन पुष्य नक्षत्र प्रात: 11.53 बजे से प्रारंभ होगा। आयुष्मान योग रात्रि 9.27 बजे तक रहेगा और इसके बाद सौभाग्य योग प्रारंभ हो जाएगा। इसके साथ ही प्रात: 11.54 से दूसरे दिन प्रात: 6.03 बजे तक सर्वार्थसिद्धि योग रहेगा। रवियोग भी प्रात: 11.54 बजे से रहेगा। इसके साथ ही इस दिन चंद्रमा अपनी स्वयं की राशि कर्क में भी रहेगा। चंद्रमा का अपनी राशि में रहना इस दिन का महत्व और भी बढ़ा रहा है क्योंकिसोम प्रदोष को चंद्र प्रदोष भी कहा जाता है।

कैसे करते हैं प्रदोष व्रत पूजन

सोम प्रदोष व्रत करने वाले सूर्योद htय के पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं। उगते सूर्य को जल का अ‌र्घ्य दें, उसके बाद अपने पूजा स्थान की साफ-सफाई करके शुद्ध वस्त्र धारण करें और भगवान शिव का पूजन करने के बाद प्रदोष व्रत का संकल्प लें। यह संकल्प सकाम और निष्काम दोनों हो सकता है। सकाम अर्थात् आप अपनी किसी समस्या या संकट के निवारण के लिए व्रत करना चाहते हैं तो संकल्प में उस संकट का उल्लेख करें। निष्काम अर्थात् बिना किसी कामना के प्रदोष व्रत करना। संकल्प लेने के बाद दिनभर निराहार रहें। सायंकाल सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व और 45 मिनट बाद का समय प्रदोषकाल होता है। इस समय में सुंदर मंडप सजाकर शिव परिवार की स्थापना करें। विधिवत मंत्रोच्चार के साथ अभिषेक पूजन करें। पांच प्रकार के फलों और मिष्ठान्न का नैवेद्य लगाएं। प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें। शिवजी की आरती करें और प्रसाद बांटें और स्वयं ग्रहण करें।

प्रदोष व्रत कथा

प्राचीनकाल में एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। पति की मृत्यु हो जाने के बाद आजीविका चलाने के लिए उसे भिक्षा मांगनी पड़ती थी। वह सुबह-सुबह अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगने निकल पड़ती थी। वह ब्राह्मणी प्रत्येक प्रदोष का व्रत करती थी। एक दिन वह पुत्र के साथ भिक्षाटन से घर लौट रही थी तो रास्ते में उसे पुत्र की आयु का ही एक बालक घायल और मूर्छित अवस्था में पड़ा मिला। आसपास कोई न होने के कारण ब्राह्मणी उसे उपचार के लिए अपने घर ले आई। बालक को होश आया तो उसने बताया किवह विदर्भ का राजकुमार है। शत्रुओं ने उसके पिता को बंदी बना लिया और राज्य छीन लिया, तब से वह भी मारा-मारा फिर रहा है। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपने साथ ही रख लिया।

बालक वन में विचरण कर रहे थे

एक दिन दोनों बालक वन में विचरण कर रहे थे। राजकुमार अत्यंत सुंदर और आकर्षक था। वहीं वन में गंधर्व कन्याएं भी क्रीडा कर रही थी। एक गंधर्व कन्या अंशुमति राजकुमार पर मोहित हो गई। दोनों वन में रोज मिलने लगे। एक दिन अंशुमति ने अपने माता-पिता को राजकुमार के बारे में बताया और उससे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलवाने ब्राह्मणी के घर आई। माता-पिता को भी राजकुमार भा गया। इसके अगले दिन अंशुमति के पिता को स्वप्न में भगवान शंकर ने आदेश दिया किराजकुमार और अंशुमति का विवाह तुरंत कर दिया जाए। राजा ने वैसा ही किया। इसके बाद राजकुमार ने गंधर्वराज की सेवा की सहायता से अपने राज्य विदर्भ से शत्रु सेना को खदेड़ कर पिता को मुक्त कराया और पुन: अपना राज्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के फल से ही हुआ।

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