पांण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान स्थापित किया था यह शिवलिंग
प्रतापगढ़। स्लाइडर में तस्वीर में जिस शिवलिंग को आप देख रहे हैं उसकी स्थापना हस्तिनापुर के पांडवों ने की थी। वो भी अज्ञातवास के दौरान। आज भी इस शिवलिंग की पूजा करने के लिये दूर-दूर से लोग आते हैं। यह प्राचीन शिवलिंग उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित भयहरणनाथ धाम में स्थापित है।
प्रसिद्ध पांडव कालीन धार्मिक, एतिहासिक व आध्यातिमक स्थल भयहरणनाथ धाम उत्तर प्रदेश के जनपद प्रतापगढ में मुख्यालय के दक्षिण लगभग 30 किमी0 तथा इलाहाबाद के उत्तर लगभग 36 किमी0 पर कटरा गुलाब सिंह के पास सिथत है। लगभग 10 एकड के क्षेत्रफल में फैले इस धाम में पाण्डवों द्वारा स्थापित शिवलिंग के मुख्य मंदिर के अलावा हनुमान, शिव पार्वती, संतोषी मां, राधा कृष्ण, विश्वकर्मा भगवान, बैजूबाबा आदि का मंदिर हैं। अपनी प्राकृतिक एवं अनुपम छटा तथा बकुलाही नदी के तट पर सिथत होने के नाते यह स्थल आध्यातिमक दृषिट से काफी जीवन्त है। यह धाम जहां क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए आस्था व विश्वास का केन्द्र है वहीं अपनी विभिन्न गतिविधियों के कारण यह स्थल सामाजिक विकास के केन्द्र के रूप में भी स्थापित हो चुका है।
यही पर किया था बकासुर का वध
लोकमान्यता है कि महाभारत काल में धुत क्रीड़ा में पराजित होने के बाद पाण्डवों को जब 12 वर्ष के लिए वनवास में जाना पड़ा था। उसी दौरान उनके द्वारा इसी स्थल पर शिवलिंग की स्थापना की गर्इ थी। कहा जाता है कि पाण्डवों नें अपने आत्मविश्वास को पुनजागृत करने के लिए इस शिवलिंग को स्थापित किया था। इसी नाते इसे भयहरणनाथ की संज्ञा से सम्बोधित किया गया। वहीं यह भी माना जाता है कि इस दौरान भीम ने यहां बकासुर नामक राक्षस का बध कर ग्रामवासियों के भय का हरण किया था।
बध के पश्चात यहां शिवलिंग स्थापित किया जिससे इस धाम का नाम भयहरणनाथ धाम पड़ा। इस क्षेत्र में महाभारत काल के और कर्इ पौराणिक स्थल तथा भग्नावशेष आज भी मौजूद है। जिसमें उंचडीह का टीला तथा उसकी खुदार्इ से प्राप्त मूर्तियां, स्वरूपपुर गांव का सूर्य मंदिर तथा कमासिन में कामाख्या देवी का मनिदर प्रमुख है। इस सब के सम्बन्ध में तरह तरह की लोक श्रुतियां, मान्यताएं प्रचलित हैं।
ग्रामसभा पूरेतोरर्इ में पूर्व की ओर बकुलाही नदी के पावन तट पर बने टीले के उपर एक भव्य भवभयहरननाथ मनिदर बना है। जो मीलों दूर से दिखार्इ पडता है। यहां की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। पशिचम से बकुलाही नदी आकर भोलेनाथ को भेटती हुर्इ उत्तराभिमुखी हो गर्इ हैं। पशिचम में शिवगंगा ताल था जो अब खेतों में परिवर्तित हो चुका है, क्षेत्रीय समाज व सरकार के सहयोग से शिवगंगा ताल का लघु स्वरूप पुन: कायम हुआ है। भयहरणनाथ धाम का धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व अपने में विशिष्ट स्थान रखता है। प्रेमी भक्त जन अपने मनोरथ की पूर्ति हेतु मनौती करते हैं, पूजन अर्चन करते हैं तथा जलाभिषेक एवं पताका चढाते हैं। यही यहां का मुख्य कृत्य है।
महाशिवरात्रि पर महोत्सव
श्रावण मास, मलमास, अधिमासद्ध तथा महाशिवरात्रि को जनमानस की अपार भीड देखने को मिलती है, वैसे वर्ष भर प्रत्येक मंगलवार को भारी भीड होती है तथा जलाभिषेक एवं पताका चढता है। प्रत्येक अवसर पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मिष्ठान, विसात, फल सब्जी, फूल माला तथा अन्य वस्तुओं की दुकाने सजी रहती हैं। सावन माह में भी प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं, कावड़ियों तथा भक्तों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया है। पूरे सावन माह में प्रत्येक सोमवार व मंगलवार को अपार भीड़ होती है।
क्षेत्रीय जनता अपने पारस्परिक विवादों को निपटाने के लिए इस स्थान का उपयोग पंचायत बुलाकर करते हैं। धार्मिक, सामाजिक एवं क्षेत्रीय विकास तथा कल्याण सभाएं और गोषिठयां प्राय: यहां आयोजित होती हैं तथा यही निर्णय लिए जाते हैं। यहां मेलों के अवसर पर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक परम्परा का अवलोकन सहज रूप से किया जा सकता है। नाच.गाने, वेषभूषा एवं रीति रिवाज का अच्छा खासा दृश्य परिलक्षित होता है।
प्रत्येक अवसर पर भीड़ के समय पुलिस प्रशासन की चुस्त व्यवस्था रहती है। इसी गांव में जन्में सामाजिक चिन्तक श्री चन्द्र शेखर प्राण के मागदर्शन में प्रसिद्ध समाजसेवी स्व0 लालता प्रसाद सिंह व स्व0 राम चन्द्र जौहर के नेतृत्व में विगत 2 दशक पूर्व सामाजिक भागीदारी से इस धाम के विकास के लिए निरन्तर प्रयास किया जा रहा है। लालता प्रसाद सिंह के निधन के पश्चात युवा सामाजिक कार्यकर्ता समाज शेखर पर नेतृत्व की जिम्मेदारी आर्इ जिसे पिछले डेढ दशक से वह कुशलता के साथ निभाते हुए भयहरणनाथ धाम क्षेत्रीय विकास संस्थान का स्वरूप दिया है। क्षेत्र के 250 से अधिक लोग इसके सकि्रय सदस्य हैं तथा 35 लोग कार्य समिति में हैं। जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक पदेन रूप से इस संस्थान के संरक्षक हैं और उपजिलाधिकारी सदर पदेन नोडल अधिकारी व क्षेत्राधिकारी पदेन सुरक्षाधिकारी हैं। मेला व मनिदर व्यवस्था के लिए अलग अलग संस्थान की उपसमितियां बनी हैं जो पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर अपने दायित्वों का निर्वहन करती है।
महाकाल महोत्सव
धाम पर पंचपरमेश्वर ग्रामीण पुस्तकालय एवं सूचना केन्द्र, चरक वाटिका, पंचपरेश्वर चौपाल, श्री श्री रविशंकर ज्ञान मनिदर, ज्ञानपीठ आदि का सफल संचालन एक दशक से जारी है। पिछले 14 वर्षों से महाशिवरात्रि पर चार द्विवसीय महाकाल महोत्सव, नागपंचमी पर घुघुरी उत्सव ने परम्परा का स्वरूप ग्रहण करके इस धाम का महत्व राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित किया है। इस वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर 24 फरवरी से 27 फरवरी तक भव्य रूप से चौदहवें महाकाल महोत्सव का सुरूचि पूर्ण आयोजन जनभागीदारी से होगा।
धाम पर देश विदेश के महत्वपूर्ण व्यकितयों का विभिन्न कार्यक्रमों में आगमन होता रहता है। आध्यातिमक गुरू श्री श्री रविशंकर, जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी बासुदेवानन्द जी, सुन्दर लाल बहुगुणा, जलपुरूष राजेन्द्र सिंह, बरिष्ठ समाजकर्मी पी0बी0 राजगोपाल, बरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, बलदेव भार्इ शर्मा आदि धाम पर पधार कर समय समय पर मागदर्शन करते रहते हैं। विगत वर्ष स्काटलैन्ड के विभिन्न विश्वविधालयों के चार प्रोफेसरों का अध्ययन दल धाम के महत्व व आसपास के सामाजिक जागरण व विकास का अध्ययन करने हेतु इलाहाबाद विश्वविधालय के ततकालीन कुलपति प्रो0 जनक पाण्डेय के नेतृत्व में आया था।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि धाम का धार्मिक महत्व जहां काफी बढ़ा है वहीं यह आसपास के परिवेश के सामाजिक विकास के केन्द्र के रूप में भी स्थापित हो रहा है। बकुलाही नदी की लुप्त हो चुकी 18 किमी0 प्राचीन धारा के पुनरोद्धार की प्रेरणा व शकित इसी जागृत स्थल का ही परिणाम है। समाज व सरकार की भागीदारी से यह धाम निरन्तर विकसित हो रहा है जो सामाजिक विकास के केन्द्र के रूप में पूरी तरह से स्थापित हो गया है।

प्रतापगढ में है मंदिर
प्रसिद्ध पांडव कालीन धार्मिक, एतिहासिक व आध्यातिमक स्थल भयहरणनाथ धाम उत्तर प्रदेश के जनपद प्रतापगढ में मुख्यालय के दक्षिण लगभग 30 किमी0 तथा इलाहाबाद के उत्तर लगभग 36 किमी0 पर कटरा गुलाब सिंह के पास सिथत है।

पाण्डवों की स्थापना
कहा जाता है कि पाण्डवों नें अपने आत्मविश्वास को पुनजागृत करने के लिए इस शिवलिंग को स्थापित किया था।

बकुलाही नदी
ग्रामसभा पूरे तोरर्इ में पूर्व की ओर बकुलाही नदी के पावन तट पर बने टीले के उपर एक भव्य भवभयहरननाथ मनिदर बना है। जो मीलों दूर से दिखार्इ पडता है। यहां की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। पशिचम से बकुलाही नदी आकर भोलेनाथ को भेटती हुर्इ उत्तराभिमुखी हो गर्इ हैं।

सावन माह में भीड़
पूरे सावन माह में प्रत्येक सोमवार व मंगलवार को अपार भीड होती है। क्षेत्रीय जनता अपने पारस्परिक विवादों को निपटाने के लिए इस स्थान का उपयोग पंचायत बुलाकर करते हैं। धार्मिक, सामाजिक एवं क्षेत्रीय विकास तथा कल्याण सभाएं और गोषिठयां प्राय: यहां आयोजित होती हैं तथा यही निर्णय लिए जाते हैं।
दशक से जारी
धाम पर पंचपरमेश्वर ग्रामीण पुस्तकालय एवं सूचना केन्द्र, चरक वाटिका, पंचपरेश्वर चौपाल, श्री श्री रविशंकर ज्ञान मनिदर, ज्ञानपीठ आदि का सफल संचालन एक दशक से जारी है।











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