'देवदास' और 'बंदिनी' के पटकथा लेखक नब्वेंदु नहीं रहे
जिन्होंने बिमल राय की क्लासिक का दर्जा पा चुकी देवदास का क्लाइमेक्स देखा होगा उन्हें शायद ही फिल्म का वह अंतिम दृश्य भूलेगा, जब देवदास बने दिलीप कुमार पल-पल मौत की तरफ बढ़ते नजर आते हैं. शनिवार, 15 दिसंबर 2007 का दिन भी जैसे फिल्म के अंत में देवदास की खामोश मौत से जुड़ गया. शरतचंद्र के क्लासिक नॉवेल को सिनेमा में बदलने वाले नब्वेंदु घोष नहीं रहे.
हर शनिवार की तरह वह भी सिनेमा जगत से जुड़े वितरकों, निर्माताओं, निर्देशकों के लिए बेहद तनाव और गहमागहमी से भरा एक आम दिन था. मगर इस तमाम अफरातफरी और उठापटक से परे कहीं कुछ था जो मंद रफ्तार से अपने नियत गंतव्य की ओर बढ़ रहा था. लेकिन शायद शोर इतना बढ़ चुका है कि उस जुम्बिश की आहटें किसी का ध्यान नहीं खींच पाईं - न हमारे मीडिया का, न हमारे प्रगतिशील व ऑफबीट सिनेमा के किसी पैरोकार का.
यह अंतिम सफर था भारत के सर्वकालीन महान पटकथा लेखकों में एक गिने जाने वाले नब्यंदु घोष का. वही नब्येंदु घोष, जिन्होंने बिमल रॉय जैसे अज़ीम फिल्मकार के लिए देवदास और बंदिनी जैसी बेमिसाल फिल्में लिखीं. वही नब्यंदु घोष इतनी खामोशी से, बिना किसी भी तरह की खबर बने, चुपचाप बीते शनिवार यानि 15 दिसंबर को इस दुनिया को अलविदा कह गए, कि उनके जाने से ज्यादा उनका इस तरह उपेक्षित होकर जाना दु:ख देता है.
उपन्यास के चलते नौकरी गंवाई
आज के बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 27 मार्च, 1917 को जन्मे घोष बाबू ने सन् 1937 में पटना से अंग्रेजी में एम.ए. किया था, तथा तब तक उनका नाम संभावनाशील लेखकों में लिया जाने लगा था. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन पर उन्होंने 'डाक दिये जाए' नाम से एक उपन्यास लिखा तथा इसके कारण उन्हें 1943 में बिहार सचिवालय की अपनी नौकरी गंवानी पड़ी. इसी उपन्यास ने उन्हें साहित्य जगत में अत्यधिक ख्याति प्रदान की तथा उन्हें उस समय के अग्रणी युवा तथा प्रगतिशील लेखकों में गिना जाने लगा.
साहित्य, नाटक तथा विशेषकर सिनेमा के बारे में उनकी समझ से प्रभावित होकर हॉलीवुड में प्रशिक्षित फिल्म निर्देशक असित घोष ने उन्हें अपने सहायक के रूप में काम करने के लिए राजी कर लिया.उसके बाद से ही उनके द्वारा साहित्य तथा सिनेमा को अनवरत् अपनी सेवाऍं देते रहने का लम्बा सिलसिला चल निकला, जो अब जाकर थमा है.
मानवीय संवेदनाओं की गहरी समझ
महान फिल्म सिनेमैटोग्राफर-निर्देशक बिमल रॉय से नबेंदु घोष सन् 1951 में एक पटकथा लेखक के रूप में जुड़े, तथा उसके बाद उन्होंने लगभग 50 फिल्मों की पटकथा तथा संवाद लिखे. उनके लेखन में अंतर्निहित मानवीय संवेदनाओं तथा दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित कर लेने वाले उनके सजीव पात्रों के कारण शीघ्र ही वे उस समय के प्रख्यात निर्देशकों की पहली पसंद बन गए जिनमें गुरु दत्त, सत्येन बोस, सुशील मजूमदार, हृषिकेश मुखर्जी, राज खोसला, असित सेन, बासु भट्टाचार्य तथा शक्ति सामंत प्रमुख नाम थे.
बाद में सन् 1989 में उन्होंने तृषाग्नि फिल्म का निर्माण तथा निर्देशन किया, जिसे किसी निर्देशक की पहली सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला. सन् 1967 से सन् 1994 तक वे भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से बतौर अतिथि व्याख्याता जुड़े रहे. भारतीय सिनेमा तथा संस्थान को दिए गए उनके अप्रतिम योगदान को सम्मानित करते हुए भारतीय फिल्म तथा टेलीविजन संस्थान ने 1997 में उन्हें मानद डिप्लोमा से विभूषित किया.












Click it and Unblock the Notifications