महर्षि वाल्मीकि: नर्क के भय से एक डाकू का बदला था हृदय

नई दिल्ली। भारतीय पौराणिक कहानियों में रुचि रखने वाले व्यक्तियों में शायद ही कोई ऐसा हो, जो महर्षि वाल्मीकि के नाम से परिचित ना हो। भारत के कण- कण और जन-जन के मन में बसने वाले भगवान राम की महागाथा रामायण लिखकर अमर हुए महर्षि वाल्मीकि भारतीय ज्ञान गंगा के अनमोल रत्नों में से एक हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये महाकवि अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में एक डाकू हुआ करते थे। लोगों को लूटना और मार डालना उनका दैनिक कार्य हुआ करता था। ऐसा हिंसक व्यक्ति कैसे धर्म की राह पर प्रवृत्त होकर स्वयं पूजनीय हो गया, यह एक स्वाभाविक जिज्ञासा का विषय है।

आइए, आज इसी रोचक कथा का रस लेते हैं...

 रत्ना नाम के डाकू ने आतंक मचा रखा था

रत्ना नाम के डाकू ने आतंक मचा रखा था

बहुत समय पहले की बात है। रत्ना नाम के एक डाकू ने हर तरफ आतंक मचा रखा था। वह एक जंगल में अपने परिवार समेत रहता था। जंगल से निकलने वाले हर व्यक्ति को वह लूट लेता था और जरा भी विरोध करने पर वह उसकी हत्या करने से भी नहीं चूकता था। डाकू रत्ना के भय से लोगों ने उस जंगल से निकलना ही छोड़ दिया था। इसके बावजूद कभी ना कभी उस जंगल से निकलने का काम पड़ ही जाता था। ऐसे ही एक बार महर्षि नारद को देशाटन के दौरान उस जंगल से निकलने का काम पड़ा। लोगों ने नारद मुनि को रत्ना के बारे में बताया और आगे जाने से मना किया। नारद मुनि का जाना जरूरी जान कुछ लोग उन्हें जंगल से सुरक्षित बाहर निकालने साथ आए, किंतु रत्ना से सामना होते ही वे भाग खड़े हुए। रत्ना ने नारद मुनि को पकड़ लिया।

 नारद मुनि को एक पेड़ से बांध दिया

नारद मुनि को एक पेड़ से बांध दिया

रत्ना ने महर्षि से उनका समस्त धन देने को कहा और कुछ ना पाकर गुस्से से भर उठा। उसने नारद मुनि को एक पेड़ से बांध दिया और अगले शिकार का इंतजार करने लगा। खाली समय पाकर नारद मुनि उससे बात करने लगे। उन्होंने पूछा कि लूटकर्म और हत्या तो महापाप कर्म हैं। आखिर वह क्यों नर्क की आग में जलने की तैयारी कर रहा है। रत्ना ने कहा कि उसके परिवार में माता-पिता, पत्नी और दो बच्चे हैं। उनके लालन- पालन के लिए ही वह सब कर्म कर रहा है। नारद ने कहा कि जिनके लिए तुम ये पापकर्म कर रहे हो, क्या वे तुम्हारे साथ इस पाप का परिणाम भुगतने को तैयार हैं? जरा पूछ कर तो आओ कि क्या वे सब तुम्हारे साथ नरक की आग में जलने को खुशी से राजी हैं। नारद जी की बात सुन रत्ना सन्न रह गया और तुरंत अपने परिवार के पास प्रश्न करने चला गया।

क्या तुम मेरे साथ मेरे कर्मों का फल भुगतने के लिए तैयार हो?

क्या तुम मेरे साथ मेरे कर्मों का फल भुगतने के लिए तैयार हो?

घर पहुंचकर रत्ना ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को बारी-बारी से बुलाकर कहा कि मैं तुम्हारा पालन-पोषण करने के लिए पापकर्म करता हूं। क्या तुम मेरे साथ मेरे कर्मों का फल भुगतने के लिए तैयार हो? क्या तुम मेरा साथ नर्क में भी निभाओगे? रत्ना की बात सुनकर परिवार के सभी सदस्यों ने एक सिरे से साथ देने की बात नकार दी। घर के प्रत्येक सदस्य का यही कहना था कि हमारा पालन-पोषण करना आपका कर्तव्य है।

पाप के परिणाम भुगतने को तैयार नहीं हैं?

पाप के परिणाम भुगतने को तैयार नहीं हैं?

हम आपके साथ पाप के परिणाम भुगतने को तैयार नहीं हैं। अपने पापकर्मों का फल आपको अकेले ही भुगतना है। उसमें हमारी कोई भागीदारी नहीं होगी। अपनों से ऐसे उत्तर पाकर रत्ना का दिल टूट गया। वह सीधा नारद मुनि के पास आया और उनके चरणों में गिर पड़ा। नारद मुनि ने उसे धर्म की राह पर चलने और तपस्या कर पापों का प्रायश्चित करने की सलाह दी। नारद जी की सलाह पर रत्ना ने तपस्या कर ज्ञान प्राप्त किया।

रत्ना आगे चलकर वाल्मीकि कहलाए

रत्ना आगे चलकर वाल्मीकि कहलाए

कहा जाता है कि रत्ना ने लगन से बिना हिले-डुले कई वर्षों तक घोर तपस्या की कि उनके उपर दीमक ने अपनी बांबी बना ली। इस बांबी, जिसे संस्कृत में वाल्मी कहा जाता है, के कारण ही रत्ना आगे चलकर वाल्मीकि कहलाए। इस तरह अपने आतंक से लोगों को डराने वाला रत्ना तप और ज्ञान की राह पर चलकर वाल्मीकि बन जन मानस के मन में अमर हो गया।

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