Ram Navami: महानवमी पर आदिशक्ति की उपासना, औषधियों में जगदंबा के नौ स्वरूपों के दर्शन! जानिए
भारत की धरती कई मायनों में विशिष्ट है। अलग-अलग ऋतुओं में फलों के बारे में तो अक्सर बातें होती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि नवरात्र के नौ दिन 9 औषधियों से भी जुड़े हैं। जानिए कुछ रोचक बातें
Navratri Devi Durga in Medicine: धर्म-आध्यात्म और मोक्ष की नगरी काशी के साथ-साथ भारत की धरती का अधिकांश भाग धर्म और आध्यात्म के दृष्टिकोण से खास है। लगभग हर महीने में व्रत और त्योहार सेलिब्रेट करने वाले भारतीय लोग नवरात्र में आदिशक्ति भगवती दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना करते हैं। पूजा-उपासना के अलावा इन नौ दिनों को औषधि से भी जोड़ा जाता है। क्या आप जानते हैं कि मां दुर्गा के नौ स्वरूप नौ औषधियों में भी पाए जाते हैं। पॉपुलर नैरेटिव और सामान्य आस्था-मान्यता से इतर इस सोच में औषधि रूपी भगवती के दर्शन किए जा सकते हैं।
भगवती के नौ स्वरूपों के नाम
दरअसल, देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों को देववाणी संस्कृत में श्लोकबद्ध भी किया गया है। इस श्लोक में आदिशक्ति के नौ स्वरूपों का वर्णन मिलता है।
नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना करने वाले धर्मावलंबी और नवरात्र व्रत करने वाले लोग इनकी महिमा से अच्छे से परिचित हैं। हालांकि, हम इस आलेख में भगवती के औषधीय स्वरूपों की बात कर रहे हैं। देवी की पूजा-उपासना करने वाले श्रद्धालु दुर्गासप्तशती का पाठ करते हैं। इसमें भी औषधि और भगवती के संबंध की चर्चा है। संसार के सृजन का देवता ब्रह्मा जी को माना जाता है। इन्होंने सप्तशती के 'दुर्गाकवच' में औषधियों से चिकित्सा और भगवती दुर्गा से जुड़े के रहस्यों का वर्णन 56 श्लोकों में विस्तार से किया है।
देवी के नौ स्वरूप और नौ औषधि
पौराणिक आख्यानों के अनुसार आदिशक्ति भगवती के सभी नौ स्वरूप विशेष औषधियों से भी जुड़े हैं। यानी एक प्रकार से मां दुर्गा का एक स्वरूप नौ औषधियां भी हैं। इनकी जानकारी और औषधियों के इस्तेमाल का तरीका सीखना काफी रोचक है। जानिए मां दुर्गा के नौ स्वरूप और इनसे जुड़ी औषधियां कौन सी हैं? किन बीमारियों में इनका सेवन आपको तंदुरुस्त रखे सकता है? इसके बारे में भी जानिए।
मां शैलपुत्री
पर्वतराज हिमालय की बेटी मां पार्वती यानी आदिशक्ति दुर्गा के प्रथम स्वरूप को को हिमावती नाम से भी जाना जाता है। देवी दुर्गा का यह स्वरूप औषधि में वनस्पति स्वरूप में पाया जाने वाला हरड़ (Terminalia chebula) या हरीतकी (Myrobalan) से जुड़ा है। आयुर्वेद के जानकार इसे प्रधान औषधि भी मानते हैं। पेट से जुड़े रोगों में खास तौर पर इस्तेमाल किया जाने वाली इस औषधि के भी कई प्रकार होते हैं, जिसमें एक का नाम चेतकी है। जरूरत और आयुर्वेदाचार्यके परामर्श से इस औषधि का इस्तेमाल कई तरीके से निरोगी काया पाने में मदद कर सकता है।
ब्रह्मचारिणी
आपाधापी के इस दौर में इंसान कमजोर मेमोरी पावर से भी जूझ रहा है। याददाश्त बढ़ाने में देवी दुर्गा का स्वरूप- ब्राह्मी (Waterhyssop) बेहद कारगर है। खून के विकारों को नष्ट करने में भी इसका इस्तेमाल होता है। ब्राह्मी को सरस्वती नाम से भी जाना जाता है। किसी विशेषज्ञ से परामरश के बाद अगर पीड़ित लोग इस औषधि का सेवन करें तो ब्राह्मी (Bacopa monnieri) स्मरण शक्ति और आयु बढ़ाने के साथ-साथ आवाज भी मधुर करने में मददगार होती है।
चंद्रघंटा
देवी दुर्गा का तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा से सुडौल काया का आशीर्वाद पाया जा सकता है। आसान शब्दों में कहें तो मोटापा कम करने के लिए पसीना बहाने वाले लोग आयुर्वेद के जानकारों की निगरानी में चंदूसूर (Chandrashur) नाम की औषधि का इस्तेमाल कर सकते हैं। लता और पत्ते के आकार की औषधि चंद्रशूर का वैज्ञानिक नाम- Lepidium sativum Linn है। चर्बी घटाने के साथ-साथ हार्ट से जुड़ी समस्याओं के अलावा बच्चे को जन्म देने के बाद दूध में कमी होने पर भी इसका इस्तेमाल बेहद कारगर है।
कूष्मांडा
देवी दुर्गा के चौथे स्वरूप को मां कूष्माण्डा के रूप में पूजा जाता है। औषधी की दृष्टि से देखें तो इसका एक स्वरूप कुम्हड़ा या भतुआ (Ash Gourd) भी होता है। इसे कई इलाकों में पेठा (Benincasa hispida) भी कहते हैं। औषधीय रूप में इसका जूस भी पीते हैं। सामान्य रूप से इसका इस्तेमाल ब्लड में किसी तरह के विकार को दूर करने में किया जाता है। मानसिक विकार से जूझ रहे मरीजों के लिए पेठा (कूष्मांडा) अमृत माना गया है।
स्कंदमाता
मां दुर्गा का पांचवां स्वरूप अलसी (Flax) में विद्यमान माना गया है। इसमें फाइबर की प्रचूर मात्रा होती है। माता के इस स्वरूप के शाब्दिक अर्थ को समझें तो महादेव के साथ मौजूद मां पार्वती यानी उमा के पुत्र कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है। स्कंदमाता यानी कार्तिकेय की माता। आयुर्वेद के जानकारों की नजर में अलसी (linseed) के इस्तेमाल से खून साफ होता है। कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है। साथ ही वात-पित्त और कफ के रोग का नाश करने में अलसी (Linum usitatissimum) काफी कारगर है।
कात्यायनी
मां दुर्गा के छठे स्वरूप को मां कात्यायनी नाम से पूजा जाता है। माता के इस स्वरूप को अंबा और अंबालिका नाम से भी जाना जाता है। औषधीय नजरिए ये इस स्वरूप का दर्शन मोइया (French tamarisk) में होता है। इसका इस्तेमाल लीवर से जुड़ी बीमारी के साथ-साथ कफ-पित और कंठ रोग के इलाज में किया जाता है। आयुर्वेद में इसका नाम माचिका (Tamarix Gallica) भी है।
Recommended Video
Navratri 2023: महाअष्टमी और महानवमी कब है? क्या है कन्या-पूजन का मुहूर्त | वनइंडिया हिंदी
कालरात्रि
आदिशक्ति, जगतजननी मां दुर्गा का ये स्वरूप बेहद रौद्र है। मां दुर्गा के इस रौद्र स्वरूप का दर्शन औषधी की नजर से नागदौन (Common wormwood) में किया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे दूधी भी कहा जाता है। आयुर्वेद में इस औषधि को मन और मस्तिष्क दोनों के विकारों को दूर करने वाला माना गया है। पाइल्स के इलाज में भी नागदौन (Artemisia absinthium) औषधी को काफी मददगार माना जाता है।
महागौरी
आस्था-मान्यता के अनुसार नवदुर्गा के आठवें स्वरूप का दर्शन तुलसी (Holy Basil) में होता है। कोरोना महामारी के दौरान इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर भी तुलसी (Ocimum tenuiflorum) की काफी चर्चा हुई। अधिकांश घरों के आंगन में तुलसी के पौधे पाए जाते हैं। तुलसी पत्ते के सेवन से सबसे कॉमन लाभ खांसी का ठीक होना है। वनस्पति और औषधी की नजर से देखें तो तुलसी सात प्रकार की होती है।
आयुर्वेद और वनस्पति की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार सात स्वरूपों में सफेद और काली तुलसी के अलावा पांच अन्य प्रकार- षटपत्र, मरुता, अर्जक, कुढेकर और दवना नाम से जाने जाते हैं। विशेषज्ञ के परामर्श से इसका सेवन करने से रक्त साफ होता है। हृदय रोग के नाश में भी मदद मिलती है। आस्था-मान्यता है कि एकादशी के अलावा सभी दिन तुलसी का सेवन किया जा सकता है।
सिद्धिदात्री
मां दुर्गा का नवां स्वरूप मां सिद्धिदात्री के रूप में पूजा जाता है। इनका एक नाम नारायणी भी है। औषधी की नजर से देखें तो शतावरी (Asparagus racemosus) मां सिद्धि दात्री का स्वरूप है। इसका इस्तेमाल करने से प्रसूताओं को खास लाभ होता है। महाऔषधी कही जाने वाली शतावरी रक्त विकार दूर करती है। इसके सेवन से रोगी के सभी शारीरिक कष्ट दूर होते हैं।