रामनगर की रामलीला का अलग ही अंदाज

रामनगर में राजा-महाराजाओं के काल से रामलीला का मंचन होता आया है। बनारस स्टेट के सत्तासीन रहे महाराजाओं व उनकी विरासत संभाल रहे उत्तराधिकारियों ने रामलीला का प्राचीन स्वरुप बनाए रखा है। यही कारण है कि तामझाम ग्लैमर की दुनिया से अछूती इस रामलीला को विश्व भर में एक अलग पहचान मिली है। लीला के दर्शक और रामनगर कस्बे का स्वरुप एवं माहौल भले ही बदला हो लेकिन रामलीला बिल्कुल नही बदली है।
पात्रों की सज्जा, वेशभूषा, संवाद, मंच, सभी स्थलों पर गैस व तीसी के तेल की रोशनी पात्रों की मुख सज्जा का विशिष्ट रुप, संवाद प्रस्तुति के ढंग और लीला का अनुशासन ज्यों का त्यों बरकरार है। रामलीला में आज भी बिजली की रोशनी एवं लाउड स्पीकर का प्रयोग नही होता न ही भड़कीले व व आभूषण का प्रयोग होता है। पार परिक नक्कासी वाले हौदे पर सवार होकर काशी नरेश रामलीला देखने यहां आते हैं। लगभग चार किलोमीटर की परिधि में अयोध्या, जनकपुर, लंका, अशोक वाटिका, पंचवटी आदि स्थान है जो रामचरित मानस में वर्णित है।
लीला के पांच स्वरुपों राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता समेत प्रमुख पात्र आज भी ब्राह्मण जाति के होते हैं। इनकी उम्र 16 साल से कम होनी चाहिए। चेहरे की सुन्दरता, आवाज की सुस्पष्टता और गले की मधुरता का संगम जिस किशोर में होता है वही मु य पात्र के लिए योग्य माना जाता है। चूंकि यहां लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं होता इसलिए तेज बोलने की क्षमता जांचने के लिए संस्कृत श्लोक का उच्चारण कराया जाता है। मु य पात्र तैयारी के बाद सन्यासी जैसा जीवन व्यतीत करते हैं। घर परिवार से मिलने की मनाही होती है।
यहां प्रशिक्षण का काम दो व्यास कराते हैं। रामलीला के पात्रों के वस्त्र तो कई प्रकार के होते हैं लेकिन राजसी वस्त्रों पर तो आंखें नही टिकतीं। सोने चांदी के काम वाले वस्त्र राज परिवार की सुरक्षा में रखे जाते हैं। लीला में प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र भी रामनगर किले में रखे जाते हैं। राजसी वस्त्रों और अस्त्र-शस्त्र से सज्जित स्वरुपों के मेकअप में कोई रसायन युक्त सामान प्रयोग नहीं होता।












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