कृष्णनगरी में सोने के झूले में झूलेंगे बांके बिहारी

सोने चांदी के साथ-साथ जरी, फल-फूल, पत्ती आदि के हिंडोले बदल-बदल कर डाले जाते हैं और भाव यह रहता है कि राधा और गोपियां श्रीकृष्ण को झुलायेंगी, यदि वह प्रसन्न होंगे तो कल्याण निश्चित है। वैसे तो श्रावण मास की शुरुआत से ही वैष्णव देवालयों में हिंडोले डाल दिए जाते हैं। भारत विख्यात द्वारकाधीश मंदिर में तो दो चांदी के और एक सोने का विशालकाय हिंडोला, नन्दबाबा मंदिर नंदगांव में चांदी का हिंडोला एवं मुखारबिन्द मंदिर में दर्पण का हिंडोला लगाया जाता है।
मंदिरों का वातावरण ''राधे झूलन पधारौ जुरि आई सखियां, संघन कुंज पर परयों हिहडोरो सब सखि मिलि जुरि गाई, जैसी मल्हारों से गूंजने लगता है। मंदिरों में तरह-तरह के हिंडोलों में श्रीकृष्ण राधा साथ साथ झूलते हैं। वृन्दावन का शायद ही कोई ऐसा मंदिर हो जिसमें हिंडोले नहीं डाल दिए जाते हों। बांके बिहारी वर्ष में केवल एक ही बार सोने चांदी के विशालकाय कलात्मकता में बेजोड़ हिंडोले में झूलते हैं।
हिंडोले के आसपास मानव आकार की सोने चांदी की सखियां होती हैं तथा वातावरण को हरीतिमा से भरते हुए पिचकारी से कम समय के अंतराल में भक्तों पर गुलाल डाला जाता है। इसे देखने के लिए लाखों तीर्थयात्री वृन्दावन पहुंचते हैं। इस झूले को लगाने का कार्य पूरा हो गया है।
वहीं राधा बल्लभ मंदिर में हिंडोला उत्सव के एक दिन पहले सिंधारा होता है जिसमें सौभाग्य सूचक भोग, अमनियां, सुहाग पिटारी, साड़ी व मेंहदी रखी जाती है। मंदिर में हरियाली तीज से पूर्णिमा तक नित्य बदल करजरी, केले के डंठल, मोरपंख,पत्ती आदि के हिंडोले डाले जाते हैं। देवालयों में मशहूर राधारमण मंदिर में हरियाली तीज से पंचमी तक स्वर्ण हिंडोला और उसके बाद चांदी फूल-पत्ती, जडाऊ आदि का हिंडोला डाला जाता है।












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