महात्मा गांधी के ब्रह्मचर्य प्रयोगों पर सवाल

महात्मा गांधी ने तब आहत होकर इसका जोरदार खंडन किया था और "हरिजन" में इसके जवाब में एक लंबा लेख भी लिखा था. गांधी जी अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोग के कारण हमेशा विवाद के केन्द्र में रहे. लखनऊ के पत्रकार रमाशंकर शुक्ल की नयी पुस्तक "महात्मा गांधी, ब्रह्मचर्य के प्रयोग" में यह जानकारी दी गयी है.
आज विश्व पुस्तक मेले में इस पुस्तक का लोकार्पण किया गया. पुस्तक के अनुसार कुछ मराठी अखबारों ने यह खबर छापी की कि गांधी जी कामी पुरुष हैं और उनका ब्रहा्मचर्य उनकी वासना को छिपाने का साधन मात्र है. यह खबर ब्रिटेन की लोकसभा तक में चर्चा का कारण बन गयी. इलाहाबाद आये अंग्रेज इतिहासकार मि. एडवर्ड टामसन ने इसे और हवा दी. उन्होंने इस बारे में पंडित जवाहर लाल नेहरु, सर तेज बहादुर सप्रू और पी.एन.सत्रू से भी चर्चा की. सब ने एक स्वर में खंडन किया.
पुस्तक के अनुसार 1939 में बांबे क्रोनिकल में गांधीजी के ब्रह्मचर्य के बारे में रपट छपी. इस रपट के जवाब में गांधी जी ने चार नवम्बर 1939 हरिजन सेवक में एक लेख "मेरा जीवन" शीर्षक से लिखा कि मेरे खिलाफ जो आरोप लगाये गये हैं, वे अधिकतर मेरी आत्म स्वीकृतियों पर आधारित हैं जिन्हें संदर्भ से लग करके पेश किया गया है. कहा गया है कि मेरा ब्रह्मचर्य अपनी वासना को छिपाने का साधन है.
उन्होंने लिखाः अगर स्त्रियों के प्रति मेरा झुकाव वासनापूर्ण होता तो अपने जीवन के इस काल में भी मुझे इतना साहस है कि मैंने कई शादियां कर ली होती. गुप्त या खुले स्वच्छंद प्रेम में मेरा विश्वास नहीं है.
अंतिम दिनों में हताशा और ऊहापोह में थे बापू
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने जीवन के अंतिम दिनों में बेहद दुखी हताश और ऊहापोह में थे. देशभर में हो रहे सांप्रदायिक फसाद ने बापू को अंदर से तोड़ दिया था. निराशा उनके मन को बहुत गहरे तक बेध चुकी थी. वर्ष 1943 से हत्यापर्यंत गांधीजी के निजी सहायक रहे 85 वर्षीय कल्याणम कटरामन ने यह रहस्योद्घाटन किया. वेंकटरामन ने बताया दुख हताशा और ऊहापोह की अवस्था में उनका निधन हुआ.
अपनी हत्या के चार दिन पहले गांधीजी ने एक पत्र लिखकर अपनी मनोदशा को व्यक्त भी किया था. वेंकटरामन के मुताबिक पत्र में गांधीजी ने लिखा थाः आजादी का असली जश्न तब होता जब हम स्वतंत्रता के लिए लड़ते लेकिन स्वतंत्रता के लिए लड़ाई कहीं नजर नहीं आती. मुझे सब कुछ दिशाहीन सा प्रतीत होता है. आप लोग भले ही भ्रमित न हों किन कम से कम मैं तो ऊहापोह में हूं. हम किसका जश्न मना रहे हैं. गांधीजी के लिखे यह वे शब्द हैं जिन्हें वेंकटरामन ने अपने घर में सहेज कर रखा है.
वेंकटरामन ने दावा किया कि गोडसे द्वारा गोली मारे जाने के बाद गांधीजी के मुख से "हे राम" या "राम राम" जैसे कोई शब्द नहीं निकले थे. उन दुखद क्षणों को याद करते करते हुए उन्होंने कहा जब गोडसे ने गांधीजी पर पांच गोलियां दागीं मैं उनसे बमुश्किल आधे मीटर की दूरी पर खड़ा था. वे तत्काल नीचे गिर पड़े और उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला.












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