Muharram 2023: क्या है रोज-ए-अशुरा? क्या है इतिहास और महत्व?
Muharram 2023: इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना 'मुहर्रम' रमजान माह के बाद दूसरा सबसे पाक महीना होता है, इस महीने की दसवीं तारीख यानी कि अशुरा का खास महत्व है, जिसे रोज-ए-अशुरा के नाम से जाना जाता है और इसी वजह से इस दिन दुनियाभर के मुसलमान गम मनाते है, इसी कारण 'मुहर्रम' खुशी का त्योहार नहीं बल्कि 'मातम' का पर्व है, खासतौर पर शिया समुदाय के लोगों के लिए ये दिन खासा महत्व रखता है।

इस दिन ना तो नए कपड़े पहने जाते है और ना ही कोई जश्न मनाया जाता है। बता दें कि इस बार ये महीना 19 जुलाई से शुरू हुआ है। इस्लामिक कैलेंडर मून पर आधारित है इसलिए इस बार अशुरा 28 जुलाई की शाम से शुरू होकर 29 जुलाई 2023 की शाम तक रहेगा। इस दौरान रखे जाना वाला रोजा फर्ज नहीं बल्कि सवाब यानी कि नेकी के लिए होता है।
शिया लोग पूरे महीने काले कपड़े पहनते हैं
इस पर्व को शिया और सुन्नी अलग-अलग ढंग से मनाते हैं। शिया लोग पूरे महीने काले कपड़े पहनते हैं, ये ना ही किसी के जश्न में शामिल होते हैं और ना ही खुशियां मनाते हैं। मुहर्रम में शियाओं में शादियां भी नहीं होतीं हैं और ताजिया निकाले जाते हैं। कहीं-कहीं पर लोग शरीर पर जंजीरों से वार कर खून भी निकालते हैं। हालांकि ये परंपरा सुन्नियों में नहीं होती है।
क्यों शहीद हुए थे हजरत इमाम हुसैन?
आपको बता दें कि 10वें 'मुहर्रम' के दिन ही इस्लाम की रक्षा के लिए 'हजरत इमाम हुसैन' ने अपने प्राण त्याग दिए थे, इसी कारण ये दिन उनकी शहादत का दिन है। दरअसल इराक में यजीद नाम का बेहद ही निर्दयी शासक था, वो खुद को खुदा समझता था और चाहता था कि इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के पोते इमाम हुसैन भी ऐसा करें।
गम और शोक का महीना है 'मुहर्रम'
लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और इसलिए उन्होंने यजीद के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया था। धर्मयुद्ध की इस लड़ाई में कर्बला में हुसैन साहब परिवार और दोस्तों संग शहीद हुए थे। जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था, इसलिए इस महीने में शोक जताया जाता है।












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