Muharram 2021: जानिए आशूरा' का महत्व और इसके बारे में सबकुछ
नई दिल्ली, 19 अगस्त। इस बार बार 'मुहर्रम' का चांद नजर नहीं आया था, इसलिए देश के कुछ स्थानों पर 9 अगस्त की शाम से 1443 हिजरी साल की शुरुआत मानी गई है तो कुछ जगहों पर लोगों ने 10 अगस्त से हिजरी साल का प्रारंभ माना है। जहां लोग 9 तारीख को मान रहे हैं, वहां लोग आज 'आशूरा' मना रहे हैं और जहां 10 तारीख को मान रहे हैं , वहां 'आशूरा' कल होगा। इसलिए 'मुहर्रम' कहीं आज और कहीं कल मनाया जा रहा है।

गौरतलब है कि मुहर्रम हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है। शिया समुदाय के लिए ये मातम का माह होता है, जिसे कि वो इमाम हुसैन की शहादत के शोक में मनाते हैं। हिजरी महीने के 10वें दिन को 'मुहर्रम' का सबसे पावन दिन माना जाता हैं क्योंकि इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत इमाम हुसैन ने इसी दिन अपने प्राण त्याग दिए थे, इसी वजह से 10वें 'मुहर्रम' का सबसे ज्यादा महत्व है, जिसे कि 'आशूरा' कहते हैं ।
ताजिया जुलूस निकालते हैं शिया मुसलमान
इमाम हुसैन की याद में शिया मुसलमान इस दिन पहले ताजिया जुलूस निकालते हैं और फिर उसको कर्बला में दफन करते हैं। 'मुहर्रम' में 'मरसिया गाया' जाता है । इस दौरान महिलाएं छाती पीट-पीटकर विलाप करती हैं और पुरुष लोग खुद को तलवार से पीटते हैं। इस दिन घरों में खीचड़ा या हलीम बनता है, जो कई क़िस्म के अनाज और मांस के मिश्रण से बनाया जाता है, ऐसा माना जाता है कि कर्बला के शहीदों ने अपने आखिरी भोजन के रूप में हलीम ही खाया था।

मालूम हो कि मुस्लिम देश के लोग 'हिजरी कैलेंडर' को ही मानते हैं। 'मुहर्रम' को चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। 'मुहर्रम' का अर्थ होता है 'हराम' यानी 'निषिद्ध'। इस पूरे महीने को अल्लाह का महीना कहा जाता है।
इतिहास
माना जाता है कि इसी महीने में कर्बला नामक स्थान में एक धर्म युद्ध हुआ था, जो पैंगबर हजरत मुहम्म्द साहब के नाती और यजीद के बीच हुआ था। इस धर्म युद्ध में जीत हजरत साहब की हुई थी लेकिन यजीद के कमांडर ने धोखे से हजरत इमाम हुसैन और उनके सभी 72 साथियो को शहीद कर दिया था। जिसमें उनके छः महीने का पुत्र हजरत अली असगर भी शामिल थे। तभी से ये महीना गम, मातम और शहादत का माह कहलाता है।
'मुहर्रम' पर भेजें ये संदेश
कर्बला की शहादत इस्लाम बना गयी,
खून तो बहा था लेकिन कुर्बानी हौसलों की उड़ान दिखा गयी।
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कर्बला की कहानी में कत्लेआम था लेकिन हौसलों के आगे हर कोई गुलाम था,
खुदा के बन्दे ने शहीद की कुर्बानी दी इसलिए उसका नाम पैगाम बना।

क्या हक अदा करेगा ज़माना हुसैन का
अब तक ज़मीन पर कर्ज़ है सजदा हुसैन का
झोली फैलाकर मांग लो मुमीनो
हर दुआ कबूल करेगा दिल हुसैन का।
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जन्नत की आरज़ू में
कहां जा रहे हैं लोग
जन्नत तो करबला में
खरीदी हुसैन ने
दुनिया-ओ-आखरात में
जो रहना हो चैन से
जीना अली से सीखो
मरना हुसैन से।












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