90 के हुए सुर सम्राट मन्ना डे

Manna Day
बंगलूरुः फिल्म 'तमन्ना" (1943) से हिंदी फिल्मों में अपनी गायकी का सफर शुरु करने वाले मन्ना डे एक मई को 90 वर्ष के हो गए। हिन्दी सिनेमा जगत में मन्ना डे का योगदान बहुमूल्य है। उनके गए हुए गाने मील का पत्थर साबित हुए जो आज भी लोगों के दिलों को छू जाते हैं।

अपने जीवन के 90 वर्षों मे मन्ना डे ने कई उतार चढाव देखें लेकिन सच तो यह है प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्हें वो मान-सम्मान या श्रेय कभी नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं। 1 मई 1919 को कलकता में जन्मे प्रबोधचन्द्र डे "जो बाद में मन्ना डे के नाम से मशहूर हुए" को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा उनके चाचा केसी डे से मिली। बाद में उन्होंने उस्ताद अब्दुल रहमान खान और उस्ताद अमन अली खान से शास्त्रीय संगीत भी सीखा।

23 वर्ष की उम्र में मन्ना डे अपने चाचा के साथ मुंबई आए और उनके सहायक बन गए। बाद में सचिन देव बर्मन के सहायक के रूप में भी उन्होंने काम किया। फिल्न 'तमन्ना" (1943) के लिए गाने के बाद डे संगीतकारों के चहेते गायक बन गए लेकिन उन्होंने कभी किसी खास संगीतकार के साथ जुड़कर रहना पसंद नही किया।

मन्ना डे ने यों तो लगभग दो सौ से अधिक फिल्मों में पार्श्व गायन किया मगर उनके कुछ सदाबहार गाने जैसे- ये रात भीगी-भीगी (श्री 420), कस्मे वादे प्यार वफा सब (उपकार), लागा चुनरी में दाग (दिल ही तो है), जिंदगी कैसी है पहली हाय (आनंद), प्यार हुआ इकरार हुआ (श्री 420), ऐ मेरी जोहरां जबी (वक्त), ऐ मेरे प्यारे वतन (काबुलीवाला), पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई (मेरी सूरत तेरी आँखें), इक चतुर नार करके सिंगार (पड़ोसन), तू प्यार का सागर है (सीमा)। आज भी लोगों की जबां पर हैं। उन्होंने कई फिल्मों में संगीत भी दिया है।

मन्ना डे को पद्मश्री, श्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार और लता मंगेशकर पुरस्कार जैसे कई सम्मान मिल चुके हैं।

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