Mahashivratri 2021 : ऐसे करें व्रत और पूजा, शिव आराधना के नियम और पूजन विधि
नई दिल्ली। महाशिवरात्रि का व्रत समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला और समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्रदान करने वाला है। 11 मार्च 2021 को आ रही महाशिवरात्रि पर कैसे करें व्रत और पूजा, आइए जानते हैं।महाशिवरात्रि पर शिवजी की पूजा अनेक प्रकारों से की जाती है। यह भक्त की श्रद्धा, सामर्थ्य और उनके ज्ञान के अनुसार सूक्ष्म पूजा से लेकर दीर्घ पूजा तक हो सकती है। इस दिन हिंदू परिवारों में घरों से लेकर मंदिरों तक में पूजा की जाती है।

पूजा के प्रकार
- पंचोपचार पूजा : गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य।
- दशोपचार पूजा : पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र निवेदन, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य।
- षोडशोपचार पूजा : पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, तांबूल, स्तवपाठ, तर्पण और नमस्कार।
- मानस पूजा : इसमें किसी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। मानस मंत्रों का उच्चारण करते हुए पूर्ण मन और हृदय से उन वस्तुओं का ध्यान करते हुए शिवजी को अर्पित करें। मानस पूजा का निर्देश केवल शिवजी के लिए है, अन्य देवताओं के लिए नहीं।
महाशिवरात्रि के दिन क्या करें
प्रात: सूर्योदय से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने घर के पूजा स्थान को साफ-स्वच्छ कर लें। नित्य पूजा के बाद महाशिवरात्रि व्रत का संकल्प लेकर शिवजी का ध्यान करें और उपरोक्त बताई पूजा पद्धति में से अपनी श्रद्धानुसार पद्धति चुनकर शिवजी का पूजन संपन्न करें। संपूर्ण पूजा विधि की अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं। यहां विधि अत्यंत लंबी हो जाने के कारण नहीं दी जा रही है। शिवजी का पूर्व पूजन, अभिषेक और उत्तर पूजन करें। पूर्व पूजन में अभिषेक से पूर्व की जाने वाली पूजा है। इसके बाद रूद्राभिषेक, रूद्राष्टक, महिम्नस्तोत्र आदि से शिवजी का पंचामृत, दूध और अन्य वस्तुओं से अभिषेक करें। इसके बाद शिवजी को स्वच्छ जल से स्नान करवाकर उत्तर पूजन संपन्न करें। पांच प्रकार के फल, मिष्ठान्न, सूखे मेवे और शुद्ध बनाए हुए भोजन का नैवेद्य शिवजी को लगाएं। कर्पूर से आरती करें, प्रसाद बांटें।
रात्रि जागरण और आरती
शिवरात्रि में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। सूर्यास्त के बाद से दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व तक रात्रि जागरण करते हुए शिवजी के भजन, पूजन करना चाहिए। इसमें रात्रि में पांच बार आरती करने का विधान भी है। अगले दिन सूर्योदय के बाद समस्त निर्माल्य का विसर्जन किया जाता है। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत पूर्ण किया जाता है।












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