जानिए मां काली ने क्यों धरा था रौद्र रूप, क्या था इसका मतलब?

नई दिल्ली। भारत में शक्ति की उपासना का महापर्व है नवरात्र। मां दुर्गा के नवरूपों की साधना, आराधना के ये नौ दिन विशेष पूजनीय स्थान रखते हैं। माना जाता है कि नवरात्र में दैवीय शक्ति अपने जागृत रूप में धरती पर भ्रमण करती हैं।नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक महाअनुष्ठान में हर दिन देवी के एक अलग रूप की आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार जब स्वयं भगवान परास्त होने लगते हैं, तब देवी साक्षात प्रकट होकर उनकी रक्षा करती हैं।

आइए, विस्तार से सुनते हैं देवी के पहले रूप महाकाली के प्राकट़य की कथा

मधु एवं कैटभ नाम के दैत्य

मधु एवं कैटभ नाम के दैत्य

एक समय की बात है। धरती पर प्रलय आ चुकी थी और वह पानी में समा चुकी थी। सृष्टि के पुनर्निर्माण के प्रारंभ में शेषशायी भगवान विष्णु की नाभि से एक कमल की उत्पत्ति हुई। इसी कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। उत्पत्ति की इस बेला में विष्णु भगवान के दोनों कानों से कुछ मैल निकला और उससे मधु एवं कैटभ नाम के दैत्य उत्पन्न हुए।

भगवान विष्णु को पुकारा

भगवान विष्णु को पुकारा

दोनों दैत्यों ने अपने आस-पास चारों तरफ सिवा ब्रह्मा जी के कुछ ना पाया, तो वे अपनी भूख मिटाने के लिए ब्रह्मा जी को खाने दौड़े। ब्रह्मा जी ने भयभीत होकर भगवान विष्णु को पुकारा। भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में थे। ब्रह्मा जी की पुकार से उनकी नींद एकदम से टूट गई और उनके नेत्रों में निवास करने वाली महामाया लुप्त हो गई। भगवान विष्णु के जागते ही मधु-कैटभ उनसे युद्ध करने लगे। पुराणों के अनुसार यह महाभयंकर युद्ध पूरे पांच हजार साल तक चला, लेकिन कोई परिणाम ना निकला।

 हार-जीत का निर्णय

हार-जीत का निर्णय

जब इतने लंबे समय तक हार-जीत का निर्णय ना हो सका, तब विष्णु जी के नेत्रों में बसने वाली महामाया महाकाली के रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने अपने मायाजाल से दैत्यों की बुद्धि पलट दी। दोनों असुर भगवान विष्णु से कहने लगे कि हम तुम्हारे युद्ध कौशल से अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम जो चाहो, वो वर मांग लो। भगवान विष्णु ने कहा कि यदि देना ही चाहते हो, तो वरदान दो कि सारे दैत्यों का तुरंत नाश हो जाए।

वरदान के संकल्प

वरदान के संकल्प

हामाया के प्रभाव में बिना परिणाम सोचे मधु-कैटभ वरदान के संकल्प में बंधे हुए थे इसलिए अपने वचन से पलट भी नहीं सकते थे, किंतु स्वयं को बचाने के लिए उन्होंने अपने चारों ओर देखा। उन्हें जल ही जल दिखाई दिया, उन्होंने श्रीहरि विष्णु से कहा कि जहां पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहां सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो। तब तथास्तु कहकर भगवान विष्णु ने दोनों के मस्तक अपनी जंघा पर रखकर चक्र से काट डाले।इस प्रकार देवी महामाया ने प्रकट होकर देवताओं की रक्षा की और सृष्टि को देवताओं के आतंक से मुक्त किया।

सीख

सीख

देवी का यह महामाया महाकाली रूप हमें सीख देता है कि परिस्थिति चाहे कितनी भी विकट क्यों ना हो, संयम, धैर्य, सूझबूझ और संकल्प शक्ति से उस पर जीत हासिल की जा सकती है। चाहे आपके भीतर कितनी ही शक्तियां हों, लेकिन मानसिक संतुलन और परिस्थितियों से पार पाने का गुण भी होना चाहिए। बिना घबराए, बिना डरे साहस के साथ कष्टों से लड़ेंगे तो वे दूर भाग जाएंगे।

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