Janmashtami VIDEO: यहां कृष्ण और गोपियों का रास देखने के लिए कोयल बनकर आ छिपे थे शनि

मथुरा, ब्रजभूमि 30 अगस्त: श्रीकृष्ण की लीलाओं के लिए विख्यात ब्रजभूमि की रज-रज में उन्हीं के नाम की रट लगी रहती है। यहां 84 कोस के परिक्रमा मार्ग में बहुत-सी ऐसी जगहें हैं, जहां आपको कृष्ण के युग से जुड़े स्पष्ट साक्ष्य देखने को मिलेंगे। आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर यहां हम आपको ले चल रहे हैं कोकिलावन की सैर पर...

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    Krishna Janmashtami: यहां कृष्ण और गोपियों का रास देखने के लिए कोयल बनकर आ छिपे थे शनि

    ब्रजभूमि में कोकिलावन वो जगह है, जहां सदियों से सवा कोस की परिक्रमा देने और घास के तिनके बांधने से शनि को प्रसन्न करने की परंपरा रही है। यह वो जगह भी है, जहां शनि ने छुपकर कृष्ण की रासलीला देखी थी। रास देखने के लिए शनिदेव ने कोयल का रूप धारण कर लिया था, मगर कृष्ण ने उन्हें पहचान लिया। बाद में शनि ने कृष्ण के प्रियजनों को न सताने का वचन दिया था। तब से यहां हर शनिवार को बड़ी संख्या में दूर-दूर के लोग परिक्रमा करने पहुंचते हैं। कोकिलावन में शनि की प्राचीन प्रतिमाएं मौजूद हैं और यहां वनों में कोयलों की ही संख्या ज्यादा है।

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    • आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर Hindi.oneindia.Com ने ब्रजभूमि के कई ऐतिहासिक स्थलों को घूमा है। यहां हम कोकिलावन के बारे में बता रहे हैं।

    यहां डाल पर कोयल बनकर बैठ गए थे शनि:

    यहां डाल पर कोयल बनकर बैठ गए थे शनि:

    'कोकिलावन' में शनिदेव की परिक्रमा की जाती है। यह राधा की नगरी बरसाना से कुछ ही किलोमीटर है। उत्तरप्रदेश में यह जगह मथुरा से 54 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए आपको कोसीकलां आना होगा।
    इस जगह के बारे में पौराणिक मान्यता हैं कि जब बाल्यावस्था में श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रास रचाते थे तो, देवता छुपकर देखने आते थे। इसी तरह शनिदेव भी एक रात यहां पहुंचे।
    भगवान् के दर्शन करना बड़ा दुर्लभ था, इसलिए शनिदेव ने एक कोयल का रूप धर पेडों के झुरमुट से निगाह डालनी शुरू कर दीं, तभी कृष्ण को शनि की उपस्थिति का पता लग गया। उन्होंने शनि से कहा कि, हमारे बीच कोई हरकतें न करें। शनिदेव ने बात मान ली। बाद में एक सिद्घ पीठ इस स्थान पर स्थापित हुआ।

    शनि के कारण ही नाम पड़ा कोकिलावन:

    शनि के कारण ही नाम पड़ा कोकिलावन:

    श्रीमद्भागवत पुराण का ढाई दशक से सत्संग-कीर्तन करा रहे आ. भगवानसिंह दास बताते हैं कि, द्वापर युग शनिदेव के कोयल का रूप धरने के समय से ही इस स्थान को कोकिलावन कहा जाता है। चूंकि यह ब्रजभूमि है, अत: श्रीकृष्ण को वादे के मुताबिक शनिदेव का कोप यहां शांत हो जाता है। माना जाता है कि यह सिद्घ पीठ दुनिया के सबसे प्राचीन शनि मंदिरों में से एक है। हर शनिवार को सवा कोस की परिक्रमा लगाई जाती है, जो कि कोकिलावन के चारों ओर घूमते हुए पूरी होती है। परिक्रमा के दौरान कई तरह के पक्षी, बंदर और झाडियां देखने को मिलती हैं। भिक्षुक, शरीर से लाचार व्यक्ति और अंधे शनि-कीर्तन से खासा ध्यान आर्कषित करते हैं।

    यहां की परिक्रमा में है ये खास परंपरा:

    यहां की परिक्रमा में है ये खास परंपरा:

    शनिदेव की परिक्रमा कोकिलावन में एक खास परंपरा के तहत पूरी की जाती है। परिक्रमा करने वाले लोग यहां घास-फूंस की टहनियों को एक दूसरे में गांठ मारते हैं, इसके बाद जब अगली बार परिक्रमा करने आते हैं तो उसे खोल देते हैं। माना जाता है कि जो भी हमारे पाप हैं, उनसे छुटकारा पाने के लिए शनिदेव में श्रद्घाभाव के प्रतीक के रूप में घास के तिनके बांधना अनिवार्य है। जो लोग पहली बार यहां परिक्रमा देने आते हैं, वे दूसरों की देखी-देखा इस परपंरा को समझ जाते हैं।

    विशाल शनि प्रतिमा पर चढ़ाते हैं तेल

    विशाल शनि प्रतिमा पर चढ़ाते हैं तेल

    यहां शनिदेव की विशाल प्रतिमा पर तेल का अर्घ्य दिया जाता है। यहीं पर सूर्य कुंड भी है। शनि सूर्य के पुत्र हैं। इसलिए, लोगों की यहां सूर्यदेव में भी आस्था है। 2 कुंड मंदिरों के पास ही बने हैं, जिनमें महिलाओं के अलग और पुरुषों के अलग हैं। इनकी गहराई काफी ज्यादा है और ये कभी सूखते भी नहीं हैं। रस्सियों और चेन के जरिए इनमें डुबकी लगाई जाती है। तैराकी करने वाले छलांग से नहाते हैं।

    भूखों को मिलता है भरपेट भोजन

    भूखों को मिलता है भरपेट भोजन

    यहां हर शनिवार सेठ-साहूकारों द्वारा सैकडों लोगों को भोजन कराया जाता है। जिन लोगों के पास धन पर्याप्त है और वे दान-पुन्य करना चाहते हैं तो, कोकिलावन में पूडी-सब्जी, खीर-प्रसाद वितरित करते हैं। अक्सर परिक्रमार्थी इस प्रसाद का लुत्फ उठाते हैं। आप भी प्रसाद के रूप में कुछ मिष्ठान साथ ले जा सकते हैं। यहां अन्न की बर्बादी नहीं होती।

    राजा दशरथ वाला पाठ किया जाता है

    राजा दशरथ वाला पाठ किया जाता है

    यहां भक्तजन राजा दशरथ और शनिदेव वाला पाठ भी करते हैं। इस बारे में रामायण में एक प्रसंग है कि राजा दशरथ ने मानव को शनिदेव के कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए उनकी पूजा की थी। इस बाबत शनिदेव ने उन्हें एक स्त्रोत सौंपा था, जिसका यहां सच्ची श्रद्घा से पाठ किया जाना... उनके कोप से छुटकारा दिला सकता है।

    कैसे पहुंच सकते हैं यहां?

    कैसे पहुंच सकते हैं यहां?

    दिल्ली-मथुरा-आगरा रूट पर कोसीकलां रेलवे स्टेशन पड़ता है। कोकिलावन से कोसीकलां 6 किलोमीटर दूर है। मथुरा से कोसी 21 किमी है और नेशनल हाइवे नंबर -2 इन दोनों से होकर ही दिल्ली से आगरा को जाता है। कोसीकला से एक सड़क नंदगांव और बरसाना जाती है, बस कोकिलावन बीच में पड़ता है। जयपुर से भी कोकिलावन आना आसान है, आप ट्रेन से गोवर्धन उतरें, वहां से बरसाना के लिए बसें और टैंपो चलते हैं।

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