गुरुवार को मनाया जाएगा केदार गौरी व्रत, जानिए इसका महत्व और महिमा
नई दिल्ली, 3 नवंबर: केदार गौरी व्रत को दिवाली के दिन यानी कल (4 नवंबर) को मनाया जाता है। उत्तर भारत समेत पूरे देश में इसको मनाया जाता है लेकिन मुख्य रूप से दक्षिणी भारतीय राज्यों विशेषकर तमिलनाडु में मनाया जाता है। यह एक 21 दिन का उपवास अनुष्ठान है। ये तमिल महीने पुर्ततासी में शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर दीपावली पर समाप्त होता है।

केदार गौरी व्रत का महत्व
केदार गौरी व्रत को लेकर मान्यता है कि केइस व्रत के रखने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। मान्यताओं के अनुसार कई देवताओं ने भी अपनी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए केदार गौरी का व्रत किया था।
केदार गौरी व्रत की खास बातें
केदार गौरी व्रत मुख्य रूप से दक्षिण भारत मैं मनाया जाता है. यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है। भक्त विशेष रूप से इस व्रत के अंतिम दिन यानी अमावस्या को उपवास करते हैं। केदार गौरी पूजन विधि-दार गौरी व्रत के दिन भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की पूजा की जाती है।
केदार गौरी व्रत की पूजा लगातार 21 दिनों तक चलती है। पवित्र स्थान पर कलश स्थापित करके नियमित रूप से उसकी पूजा करते हैं। कलश को एक रेशमी कपड़े से ढका जाता है. जिसके ऊपर चावल का एक ढेर रखा जाता है। पूजा में स्थापित कलश को भगवान केदारेश्वर का प्रतिबिंब माना जाता है।
व्रत को लेकर धारणा
केदार गौरी व्रत को लेकर सबसे लोकप्रिय धारणा यह है कि भगवान शिव के एक अनुयायी ने पार्वती को छोड़कर उनपर भरोसा किया और प्रार्थना की। उसने देवी को क्रोध दिला दिया और उसने शिव के शरीर का एक अभिन्न हिस्सा बनने के लिए एक समाधान के लिए ऋषि गौतम से प्रार्थना की। ऋषि गौतम ने उन्हें पूर्ण भक्ति के साथ 21 दिनों के लिए सख्त केदार व्रत का पालन करने की सलाह दी। इससे खुश होकर भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपने बाएं हिस्से को दे दिया और उनके इस रूप को 'अर्धनारीश्वर' के नाम से जाना जाने लगा। ऐसे में इस दिन को केदार गौरी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा।












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