जया और विजया एकादशी, दोनों से मिलता है एकादशियों का पुण्य
नई दिल्ली, 10 फरवरी। शास्त्रों में एकादशी व्रत को सबसे बड़ा व्रत बताया गया है। भगवान विष्णु की कृपा पाने का इससे बड़ा कोई दूसरा व्रत नहीं। इसीलिए लोग पूरे वर्ष में आने वाली समस्त 24 एकादशियों का व्रत पूर्ण भक्ति भाव और श्रद्धा से रखते हैं। लेकिन सभी लोग पूरे वर्ष की एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते उनके लिए शास्त्रों में दो एकादशियां महत्वपूर्ण बताई गई हैं। ये दो एकादशियां हैं जया एकादशी और विजया एकादशी। ये दोनों एकादशियां लगातार आती हैं और इन दोनों को करना आवश्यक होता है। किसी एक को करने का आधा लाभ ही मिलता है। इसलिए इन दोनों को ही करना होता है।

जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इस बार यह 12 फरवरी को आ रही है और विजया एकादशी फाल्गुन कृष्ण पक्ष में आती है। इस बार विजया एकादशी 27 फरवरी को आ रही है।
एकादशी व्रत विधि
जया-विजया एकादशी का व्रत करने के लिए सूर्योदय से पूर्व उठकर नहाने के पानी में गंगाजल डालकर स्नान कर लें। सूर्यदेव को शुद्ध जल का अर्घ्य दें और भगवान विष्णु-लक्ष्मी का पूजन करें। अब मन-वचन और कर्म की पवित्रता रखते हुए दोनों एकादशियों के व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूर्ण श्रद्धा-भक्ति के साथ दोनों एकादशियों का व्रत करें। एकादशी का व्रत पूर्ण निराहार रहते हुए किया जाता है। दिनभर पवित्रता से केवल भगवान के नाम का स्मरण करें। रात्रि जागरण कर भगवान के भजन भक्ति करें।
दोनों एकादशी का व्रत करने के बाद क्या करें
जया और विजया दोनों एकादशी का व्रत पूर्ण कर लेने के बाद विजया एकादशी के अगले दिन अर्थात् फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी (28 फरवरी) के दिन प्रात:काल किसी पंडित को पत्नी सहित बुलवाकर एकादशी व्रत का पारणा करवाएं। इसके लिए व्रत पूर्ण होने का पूरा विधान पंडित से करवाएं। पंडित को पत्नी सहित भोजन करवाएं और यथाशक्ति उन्हें दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें और उन्हें विदा करें।












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