Must Read: ईद-उल-जुहा (बकरीद) से जुड़ी खास बातें

नई दिल्ली। कुर्बानी का पर्व ईद-उल-जुहा (बकरीद) 12 सितंबर को है, जिसके लिए पूरे देश में जोर-शोर से तैयारी चल रही है। त्याग और बलिदान का यह त्योहार कई मायनों में खास है और एक विशेष संदेश देता है।

  • ईद-उल-जुहा (बकरीद) को अरबी में ईद-उल-जुहा कहते हैं।
  • इस त्योहार को रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग 70 दिनों बाद मनाया जाता है।
  • हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तत्पर हो जाने की याद में इस त्योहार को मनाया जाता है।
  • इस्लाम के विश्वास के मुताबिक अल्लाह हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने उनसे अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए कहा।

आगे की बात तस्वीरों में...

आंखों पर पट्टी बांध ली

आंखों पर पट्टी बांध ली

हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी।

 बेटा नहीं, बल्कि दुंबा था

बेटा नहीं, बल्कि दुंबा था

जब उन्होंने पट्टी खोली तो देखा कि मक्का के करीब मिना पर्वत की उस बलि वेदी पर उनका बेटा नहीं, बल्कि दुंबा था और उनका बेटा उनके सामने खड़ा था।

जानवरों की कुर्बानी

जानवरों की कुर्बानी

विश्वास की इस परीक्षा के सम्मान में दुनियाभर के मुसलमान इस अवसर पर अल्लाह में अपनी आस्था दिखाने के लिए जानवरों की कुर्बानी देते हैं।

'बकरा ईद'

'बकरा ईद'

अरबी में 'बक़र' का अर्थ है बड़ा जानवर जो जि़बह किया (काटा) जाता है। इसलिए आज भारत, पाकिस्तान व बांग्ला देश में इसे 'बकरा ईद' बोलते हैं।

 बलिदान की भावना

बलिदान की भावना

ईद-ए-कुर्बां का मतलब है बलिदान की भावना, अरबी में 'क़र्ब' नजदीकी या बहुत पास रहने को कहते हैं मतलब इस मौके पर भगवान इंसान के बहुत करीब हो जाता है।

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