Jupiter: बृहस्पति कैसे बने देवताओं के गुरु, किसने दिया था वरदान
नई दिल्ली, 11 मार्च। नवग्रहों के श्रेष्ठ बृहस्पति मात्र एक ग्रह नहीं हैं वरन वे देवताओं के गुरु भी हैं। आखिर बृहस्पति देवताओं के गुरु कैसे बनें, किसकी कृपा और आशीर्वाद से उन्हें यह सर्वोत्तम पद प्राप्त हुआ और किसने उन्हें ग्रहमंडल में प्रमुख स्थान में प्रतिष्ठित किया। आइए जानते हैं इस कथा के माध्यम से।

कौन हैं बृहस्पति
ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि अंगिरा के तीन पुत्र हुए- बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त। इनमें बृहस्पति सबसे ज्येष्ठ हैं। बृहस्पति अत्यंत सत्वगुणों से युक्त, वाणी-बुद्धि और ज्ञान के अधिष्ठाता तथा महान परोपकारी हैं। बृहस्पति अपने एक रूप से देव पुरोहित के रूप में इंद्रसभा-ब्रह्मसभा में विराजमान रहते हैं और दूसरे रूप से ग्रह के रूप में प्रतिष्ठित होकर नक्षत्रमंडल में विराजमान रहते हैं।
बृहस्पति कैसे बने देवगुरु, किसने दिन बृहस्पति नाम
बृहस्पति के देवताओं के गुरु बनने के पीछे एक अत्यंत सुंदर कथा स्कंदपुराण में आई है। इसके अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने एक समय काशी में शिवलिंग की स्थापना कर घोर तपस्या की। तपस्या करते हुए दस हजार वर्ष बीत गए, तब महादेव प्रसन्न होकर उस शिवलिंग से प्रकट हुए और बृहस्पति से कहा- मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, अपना अभीष्ट वर मांगो। अपने सामने उन अत्यंत प्रकाशवान, तेजोमय शिव को देखकर बृहस्पति उनकी स्तुति करने लगे। हे जगन्नाथ! आप त्रिगुणातीत, जरा-मरण से रहित, त्रिजगन्मय, भक्तों का उद्धार करने वाले और शरणागत वत्सल हैं। आपके दर्शनों से ही मैं कृतकृत्य हो गया हूं। मेरी समस्त कामनाएं पूरी हो गई हैं। अत: अब कुछ भी अप्राप्त नहीं रह गया है। बृहस्पति की ऐसी स्तुति सुनकर महादेव ने और भी अधिक प्रसन्न होकर अनेक वर दिए और कहा हे आंगिरस! तुमने बृहत अर्थात् बड़ा तप किया है इसलिए तुम इंद्रादि देवों के पालक तथा ग्रहों में पूज्य हो जाओगे और तुम्हारा नाम बृहस्पति होगा।
बृहस्पतीश्वर लिंग की आराधना करेगा
महादेव ने आगे कहा- हे ग्रहाधीश! तुम बड़े वक्ता और विद्वान हो, इसलिए तुम्हारा नाम वाचस्पति भी होगा। जो प्राणी तुम्हारे द्वारा स्थापित इस बृहस्पतीश्वर लिंग की आराधना करेगा और तुम्हारे द्वारा की गई स्तुति का पाठ करेगा उसे मनोवांछित फल प्राप्त होगा तथा ग्रहजन्य कोई भी बाधा उसे पीड़ित नहीं करेगी। इतना कहकर महादेव ने सभी देवताओं को बुलाकर बृहस्पति को देवाचार्य तथा देवगुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।












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