• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

गुलेरी का समय लौट रहा हैः कालिया

By <b>रवींद्र कालिया</b> से साक्षात्कार
|
A talk with Ravindra Kalia
उन्होंने साठ के दशक में नौ साल छोटी पत्नी और काला रजिस्टर जैसी कहानियों से जिस तरह लोगों को चौंकाया, ठीक उसी तरह नई सदी के आरंभिक दौर में उन्होंने बतौर संपादक लोगों को हैरत में डाल दिया। वरिष्ठों ने भुकुटियां तान लीं, लोगों ने जमकर आलोचना की, मगर वे बिना किसी परवाह के युवा प्रतिभाओं को सामने लाने का काम करते रहे और मौजूदा समय में साहित्यिक हिन्दी पत्रकारिता का सबसे बेहतर संपादक बनकर दिखा दिया। पहले वागर्थ और बाद में नया ज्ञानोदय के संपादन में उन्होंने जिस दृष्ठि और सूझबूझ का परिचय दिया वह हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य में बिरले ही दिखती है। दिनेश श्रीनेत की उनसे हुई बातचीत में उनके इस नए तेवर को टटोलने की कोशिश की गई। प्रस्तुत है उसी साक्षात्कार के कुछ अंश-

क्या आपको उम्मीद थी कि वागर्थ और फिर उसके बाद नया ज्ञानोदय को इतनी सफलता मिलेगी?

उम्मीद नहीं थी, मेरे लिए तो यह एक कोशिश भर थी। हिन्दी में जो माहौल है उसने पाठकों की नाउम्मीदी ही बढ़ाई है। पहले अंक के बाद नया ज्ञानोदय की केवल दिल्ली में 50 प्रतिशत प्रतियां बढ़ गईं। हर शहर से इसी प्रकार की खबर मिली। हालांकि बिकना कोई मापदंड नहीं है मगर मेरे लिए यह प्रतिक्रिया काफी उत्साहवर्धक रही। मुझे बतौर संपादक हर पीढ़ी के रचनाकारों का सहयोग भी मिला।

बतौर संपादक अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं?

दरअसल मेरी प्रारंभिक ट्रेनिंग धर्मवीर भारती के स्कूल में हुई। मैंने धर्मयुग में उनके साथ काम किया। वह पत्रिका की गुणवत्ता का ध्यान तो रखते ही थे साथ ही प्रसार संख्या पर भी उनकी कड़ी नजर रहती थी। किसी शहर में कापियां कम होने लगती थीं तो उस शहर पर फीचर या शिवानी का कोई नया उपन्यास धारावाहिक छापना शुरू कर देते थे। वे लेखकों का चुनाव बड़ी निर्दयता से करते थे।

मैंने उनसे जो सबसे अहम बात सीखी वह रचना लौटाने में संकोच न करना था। मुरौव्वत में कई बार घटिया सामग्री भी छप जाती है। एक बार हिन्दी के एक जानेमाने रचनाकार मेरे पास आए। अपने तीन प्रस्ताव लेकर। तीनों ही मेरे काम के नहीं थे सो मैंने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि बुरा तो लग रहा है पर तुम अपनी जगह सही हो।

यह तो हुई बात कि भारती जी से आपने क्या सीखा, खुद बतौर संपादक आप किन बातों का सबसे ज्यादा ख्याल रखते हैं?

मेरा मानना है कि एक साहित्यिक पत्रिका को भी समकालीन होना चाहिए। उसमें वह लेखक दिखें जो करेंसी में हैं। मैं रिटायरमेंट के मूड वाले लेखकों को छापना पसंद नहीं करता।

युवा रचनाकारों के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

इसमें कोई शक नहीं कि जो लोग सामने आ रहे हैं उनकी प्रतिभा आश्चचर्यचकित कर देने वाली है। चंदन पांडेय और कुणाल सिंह जैसे रचनाकार एक ही कहानी से चर्चा में आ गए। देखें तो हिन्दी संसार में गुलेरी का समय वापस आ रहा है। ऐसे कई युवा रचनाकार हैं जिन्होंने एक ही कहानी के दम पर अपनी पहचान बना ली। हमारे समय में ऐसा नहीं होता था।

छोटे शहरों से युवा लेखक ज्यादा सामने आ रहे हैं।

महानगरों के युवाओं का झुकाव अब अंग्रेजी लेखन की ओर ज्यादा है। युवा लेखकों की उम्र घट गई है और उनमे मैच्योरिटी का लेवेल बढ़ गया है। वे ओरहान पामुक और मिलान कुंदेरा की बाते करते हैं। ऐसा नहीं कि उन्हें सिर्फ विदेशी साहित्य का ज्ञान है वे अपनी साहित्यिक परंपराओं के बारे में भी पूरा जानते हैं। मेरा मानना है कि इसमे इंटरनेट का भी बड़ा योगदान है।

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more