रेगिस्तान में 80 न्यूक्लियर लॉन्च पैड बना रहा China, किससे जंग लड़ने की कर रहा तैयारी? भारत को कितना खतरा?
China Nuclear Expansion: हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों ने चीन के न्यूक्लियर कार्यक्रम को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। इन तस्वीरों से पता चला है कि चीन अपने दूरदराज के न्यूक्लियर मिसाइल साइलो एरिया के आसपास बड़े पैमाने पर नए आर्मी स्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। इनमें लॉन्च पैड, बंकर, संचार केंद्र, सैन्य वाहन अड्डे और कई अन्य रणनीतिक सुविधाएं शामिल हैं। स्वभाविक है कि भारत से चीन सीमा साझा करता है, इसलिए सबसे बड़ा खतरा भी हमें ही है।
चीन क्यों कर रहा न्यूक्लियर की तैयारी?
डिफेंस एक्सपर्ट्स की मानें तो यह पूरा निर्माण चीन की "सेकंड स्ट्राइक" यानी जवाबी न्यूक्लियर हमला करने की क्षमता को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अगर भविष्य में किसी दुश्मन देश, खासकर अमेरिका, की ओर से पहला न्यूक्लियर हमला होता है तो भी चीन जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम रहे।

अमेरिका तक पहुंच सकती हैं चीन की मिसाइलें
चीन की अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) पहले से ही इतनी लंबी दूरी तय करने में सक्षम हैं कि वे अमेरिका के किसी भी बड़े शहर तक पहुंच सकती हैं। लेकिन नई सैटेलाइट तस्वीरें दिखाती हैं कि बीजिंग केवल मिसाइलों की संख्या नहीं बढ़ा रहा, बल्कि उनके लिए एक विशाल सुरक्षा और संचालन नेटवर्क भी विकसित कर रहा है।
रॉयटर्स द्वारा लिए गए 80 फोटो के एनालासिस से पता चलता है कि इसमें ज्यादातर संभावित लॉन्च पैड हैं। इसके अलावा मोबाइल मिसाइल लॉन्चरों के लिए विशेष क्षेत्र, एयर डिफेंस सिस्टम और संचार सुविधाओं का भी निर्माण देखा गया है।
80 से ज्यादा लॉन्च पैड क्यों हैं महत्वपूर्ण?
रॉयटर्स के लिए तस्वीरों का एनालिसिस करने वाले तीन सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल सिर्फ मिसाइल लॉन्च करने के लिए नहीं किया जाएगा। इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare), सैटेलाइट कम्युनिकेशन और कमांड एंड कंट्रोल ऑपरेशन के लिए भी किया जा सकता है।
इसका मतलब है कि चीन ऐसा सैन्य नेटवर्क तैयार कर रहा है जो युद्ध की स्थिति में उसकी न्यूक्लियर ताकत, सैन्य कमान और संचार व्यवस्था को सुरक्षित रख सके।
क्या है सेकंड स्ट्राइक क्षमता?
विश्लेषकों के मुताबिक, इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य चीन की "Second Strike Capability" को मजबूत करना है। सरल भाषा में समझें तो सेकंड स्ट्राइक क्षमता का मतलब है कि अगर किसी देश पर पहले न्यूक्लियर हमला हो जाए, तब भी वह अपने बचे हुए न्यूक्लियर हथियारों से जवाबी हमला करने में सक्षम रहे। न्यूक्लियर रणनीति में इसे सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षमता माना जाता है क्योंकि यही दुश्मन को पहले हमला करने से रोकने का काम करती है।
ताइवान को लेकर बढ़ते तनाव का असर
यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब चीन और अमेरिका के बीच ताइवान को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान की सरकार इस दावे को पूरी तरह खारिज करती है।
इसी महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी दी थी कि ताइवान से जुड़े मतभेदों को गलत तरीके से संभालना दोनों देशों को "खतरनाक स्थिति" में पहुंचा सकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा सैन्य विस्तार इसी क्षेत्रीय तनाव से भी जुड़ा हुआ है।
चीन की 'नो फर्स्ट यूज' नीति पर सवाल
चीन लंबे समय से "No First Use" यानी पहले न्यूक्लियर हमला न करने की नीति का दावा करता रहा है। इस नीति के तहत चीन कहता है कि वह किसी भी संघर्ष में न्यूक्लियर हथियारों का पहला इस्तेमाल नहीं करेगा। हालांकि कई पश्चिमी विशेषज्ञ और राजनयिक मानते हैं कि भविष्य में ताइवान को लेकर किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में चीन न्यूक्लियर दबाव का इस्तेमाल कर सकता है ताकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के दखल को सीमित किया जा सके।
रेगिस्तान में बनी रहस्यमयी ओक्टागोन संरचनाएं
नई सैन्य गतिविधियों का केंद्र पूर्वी शिनजियांग में बनी दो विशाल अष्टकोणीय (Octagon-Shaped) इन्फ्रास्ट्रक्चर हैं। इनमें से एक हामि न्यूक्लियर साइलो क्षेत्र से लगभग 140 किलोमीटर और दूसरी करीब 230 किलोमीटर दूर स्थित है। सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार इन परिसरों में सैनिकों के लिए आवास, बड़े सैन्य वाहनों की पार्किंग, बख्तरबंद बंकर, हथियार भंडारण क्षेत्र, रेलवे कनेक्शन और हवाई पट्टियां मौजूद हैं।
लॉन्च पैड के आसपास बढ़ी गतिविधियां
अप्रैल और मई में ली गई तस्वीरों में उत्तरी अष्टकोणीय संरचना के आसपास बड़े सैन्य वाहनों की गतिविधियां देखी गई हैं। कुछ स्थानों पर बड़े टेंट, छिपाए गए लॉन्च पॉइंट और एयर डिफेंस मिसाइल बैटरियां भी दिखाई दी हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन स्थानों का इस्तेमाल मोबाइल मिसाइल लॉन्चरों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध अभियानों के लिए किया जा सकता है।
चीन तेजी से बढ़ा रहा है न्यूक्लियर ताकत
अमेरिकी अधिकारियों और वेपन कंट्रोल एक्सपर्ट्स के मुताबिक चीन इस समय दुनिया में सबसे तेजी से अपनी न्यूक्लियर क्षमता बढ़ाने वाला देश है। पेंटागन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन 2030 तक लगभग 1,000 न्यूक्लियर वारहेड तैनात करने का लक्ष्य रखता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन अपने तीन प्रमुख साइलो क्षेत्रों में लगभग 100 ICBM तैनात कर चुका है।
दुनिया को क्यों चिंता हो रही है?
दिलचस्प बात यह है कि चीन अपने न्यूक्लियर साइलो के आसपास जिस तरह का काफी डिफेंस नेटवर्क बना रहा है, वैसा मॉडल अमेरिका और रूस में आमतौर पर नहीं देखा जाता। अमेरिका और रूस आमतौर पर मजबूत साइलो इन्फ्रा और उनके भौगोलिक अलगाव पर भरोसा करते हैं। इसके उलट चीन एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, संचार नेटवर्क और मिसाइल डिफेंस को एक साथ जोड़कर बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा तैयार कर रहा है।
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