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शुभ कर्म का मिलता है श्रेष्ठ फल, राजा का सत्कार करके भील को मिला नगर सेठ के घर जन्म

नई दिल्ली, 28 फरवरी। सभी धर्म शास्त्र एक बात एकमत से कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा शुभ कर्म करना चाहिए, उसका कभी न कभी श्रेष्ठ फल प्राप्त होता ही है। इसी प्रकार बुरे कर्मो का फल भी बुरा ही प्राप्त होता है।

आइए इसको एक सुंदर कथा के माध्यम से जानते हैं...

शुभ कर्म का मिलता है श्रेष्ठ फल, राजा का सत्कार करके भील को मिला नगर सेठ के घर जन्म

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    एक कथा के अनुसार प्रतिष्ठानपुर के राजा सातवाहन आखेट के लिए वन में गए। सायंकाल अंधेरा होने के कारण वे अपने सैनिकों से अलग रह गए और मार्ग भटक गए। वन में भटकते समय उन्हें एक भील की झोपड़ी दिखाई दी। भूख प्यास से बेहाल राजा उस झोपड़ी पर पहुंचे। वह वनवासी राजा को पहचान तो नहीं सका, लेकिन उसने अपने साम‌र्थ्य के अनुसार राजा का सत्कार किया। उसके पास राजा को खिलाने के लिए ज्यादा कुछ तो था नहीं तो उसने थोड़ा सा बचा हुआ जल और सत्तू राजा को खाने के लिए दे दिया। राजा से उस सत्तू को खाकर अपनी भूख मिटाई।

    भील की मौत हो गई

    भील की झोपड़ी छोटी थी और शीतकाल की रात्रि भी थी। उसी रात वर्षा भी प्रारंभ हो गई। भील ने राजा को झोपड़ी में सुला दिया और स्वयं बाहर वर्षा में भीगता रहा। शीत और वर्षा के कारण रात्रि में ही उसकी मृत्यु हो गई।

    राजा को मन को शांति नहीं मिल रही थी

    प्रात:काल सैनिक अपने राजा को ढूंढते हुए वहां पहुंच गए। राजा ने पूरा हाल सुनाया और फिर भील का अंतिम संस्कार पूर्ण सम्मान के साथ किया। इसके बाद राजा अपने नगर लौट तो आए लेकिन उनके मन को शांति नहीं मिल रही थी। वे स्वयं को उस भील की मृत्यु का दोषी समझ रहे थे।

    मैं यहां नगर सेठ का पुत्र बना

    राजा को इस प्रकार चिंता से दुर्बल होते देख महापंडित ज्योतिर्विद वररुचि उन्हें लेकर नगर सेठ के घर गए। नगर सेठ का नवजात पुत्र राजा के सामने लाया गया तो पंडितजी के आदेश पर वह बोल पड़ा। नवजात बालक को बोलते देख सभी आश्चर्य में थे। बालक ने राजा से कहा- राजन! मैं आपका बहुत कृतज्ञ हूं। उस रात आपको सत्तू देने के कारण मैं यहां नगर सेठ का पुत्र बना और उसी पुण्य के प्रभाव से मुझे पूर्व जन्म का स्मरण भी है।

    यह होती है कर्मो की महिमा

    तो देखा आपने यह होती है कर्मो की महिमा। भील ने पूर्ण शुद्ध मन से अतिथि का सत्कार किया। स्वयं कष्ट झेलकर अतिथि को सम्मान दिया। भूखे-प्यासे राजा को जो कुछ उपलब्ध था वह प्रदान किया। इस शुभ कर्म का फल निर्धन भील को नगर सेठ के घर जन्म लेकर उसका पुत्र बनने के रूप में मिला। तो हमेशा सत्कर्म करते रहिए, क्या पता आपका कौन सा शुभ कर्म आपको किस रूप में लौटकर मिले।

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