गणेश चतुर्थी 2017: जानिए गणपति बप्पा की अनोखी कथा
नई दिल्ली। प्रथम पूज्य भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है गणेश चतुर्थी। हमारे गणपति बप्पा जितने अनूठे हैं, उतनी ही अद्भुत उनके जन्म की कथा भी है। पुराणों के अनुसार गणपति का जन्म भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुआ था। इसी तिथि पर सभी श्रद्धालुजन अपने प्रिय विघ्नहर्ता भगवान के जन्म का उत्सव बड़े धूम से मनाते हैं।
क्यों अनूठे हैं गणेश और कैसे अद्भुत है उनके जन्म की कथा, आइए जानते हैं-
कथा
एक बार की बात है। भगवान शंकर स्नान करने के लिए भोगवती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद माता पार्वती स्नान करने चलीं। स्नान से पहले उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक पुतला बनाया और उसका नाम गणेश रखा। अपने इस पुत्र को मुद्गल देकर, द्वार पर पहरा देने का काम देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक मैं स्नान करूं, तुम किसी भी पुरुष को अंदर मत आने देना। इतना कहकर पार्वती जी स्नान करने चली गईं और गणेश पहरा देने लगे।

गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया
इसी बीच भगवान शिव स्नान कर लौट आए और पार्वती के कक्ष में जाने लगे। द्वार पर बैठे एक नन्हें बालक ने उन्हें रोक दिया और युद्ध के लिए ललकारा। शंकर जी ने उसका परिचय मांगा तो उसने स्वयं को पार्वती का पुत्र बताया। इस बात को असत्य जान शिवजी क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।

मैंने तो उसका सिर काट दिया
ऐसे अनिष्ट से अनभिज्ञ पार्वती ने शंकर जी को क्रुद्ध देखकर सोचा कि भोजन में विलंब से वे नाराज हैं। वे दो थालियों में भोजन परोसकर ले आईं। शंकर जी ने पूछा कि ये दूसरी थाली किसके लिए लगाई है। पार्वती जी ने उत्तर दिया कि यह पुत्र गणेश के लिए है। मैंने अभी उसे अपने शरीर के उबटन से बनाया और नहाने जाने से पहले पहरे पर खड़ा किया है। पार्वती की बात सुन कर शिवजी ने कहा कि मैंने तो उसका सिर काट दिया है।

यह घटना भाद्रपद की चतुर्थी को हुई
शिव जी की बात सुन माता पार्वती सन्न रह गईं। शोकाकुल होकर वे विलाप करने लगीं और शिवजी से प्रार्थना करने लगीं कि उनके पुत्र को किसी भी तरह जीवित करें। शिवजी ने अपने गणों से कहा कि जो भी जीव अभी तुरंत ही जन्मा हो और मार्ग में जो सबसे पहले मिले उसका सिर काट लाओ। गणों को एक हाथी का नवजात शिशु मिला और वे उसका सिर काट लाए। शिवजी ने उस सिर को गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें फिर से जीवित कर दिया। अपने पुत्र को वापस पाकर पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति और पुत्र को साथ बैठाकर भोजन कराया और फिर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद की चतुर्थी को हुई थी, इसीलिए इसका नाम गणेश चतुर्थी पड़ गया।

पूजा विधि
भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए। शुद्धि के बाद सोना, चांदी, तांबा या मिट्टी के गणपति बनाकर विधि विधान के अनुसार शुभ मुहूर्त में उनकी स्थापना करनी चाहिए। गणपति जी को मोदक अत्यंत प्रिय हैं अतः पूजा के समय 21 मोदकों का भोग लगाया जाना चाहिए। इसी तरह गणेश जी को दूर्वा भी बहुत पसंद है अतः पूजा में हरी दूर्वा अवश्य रखना चाहिए।

जन्म का उत्सव
पूजा करते समय हरी दूर्वा के 21 अंकुर ले, गणेश जी के निम्न 10 नाम लेते हुए अर्पित करना चाहिए- गतापि, गौरी सुमन, अघनाशक, एकदंत, ईशपुत्र, सर्वसिद्धिप्रद, विनायक, कुमार गुरु, इंभवक्त्राय और मूषक वाहन संत। पूजा के बाद 10 लड्डू ब्राह्मणों को दान देने चाहिए और 11 लड्डू स्वयं खाने चाहिए। इस प्रकार विधि विधान से पूरे 10 दिन तक गणपति जी की पूजा के साथ उनके जन्म का उत्सव मनाया जाता है। ऐसा करने वाले भक्तों पर विघ्नहर्ता की पूर्ण कृपा बरसती है।
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