Kanya Pujan: भूलकर भी ना करें कन्या पूजन के वक्त ये काम, देवी मां हो जाएंगी नाराज
Kanya Pujan:आज चैत्र नवरात्रि का आठवां दिन है, आज के दिन लोग घरों में कन्या पूजन करने के बाद हवन करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, नौ कन्याओं को मां दुर्गा का प्रतीक मानकर पूजन किया जाता है। यह पर्व श्रद्धा और शुद्धता से किया जाए तो विशेष फलदायी होता है।
अक्सर लोग अज्ञानतवाश कुछ ऐसा कर जाते हैं कि जिससे उन्हें पूजा का सही फल नहीं मिल पाता है। आपके साथ ऐसा ना हो इसलिए आपको हम यहां ये बताते हैं कि कन्यापूजन कैसे करें और क्या ना करें।

अष्टमी पूजन में क्या करें (Kanya Pujan Do's)
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और घर की साफ-सफाई करें।
- पूजा स्थल को पवित्र करें।
- कन्याओं को आमंत्रित करें
- एक बालक (लांगूर) को साथ में रखें (इसे श्री हनुमानजी का प्रतीक माना जाता है)
- कन्याओं के चरण धोकर उन्हें आसन पर बैठाएं।
- तिलक लगाकर फूल, चावल, वस्त्र, अक्षत, फल आदि अर्पित करें।
- हलवा, चने और पूड़ी का पारंपरिक भोजन बनाएं और उन्हें प्रेमपूर्वक परोसें।
- कन्याओं को दक्षिणा, कपड़े, फल या अन्य उपहार दें।
- मां दुर्गा की और कन्याओं की आरती करें।
- कन्याओं को भोजन करवाकर व्रत खोलें।
अष्टमी पूजन में क्या न करें (Kanya Pujan Don'ts)
- पूजा से पहले स्नान जरूर करें।
- कन्याओं को खाली हाथ न भेजें ।
- भोजन में लहसुन-प्याज का प्रयोग न करें।
- कन्याओं के साथ रूखा व्यवहार न करें।
- कन्याओं को बुलाकर समय पर भोजन कराना जरूरी है।
- सभी कन्याओं को समान रूप से मान-सम्मान दें।
अष्टमी पूजा की आरती ( Durga Puja Aarti)
- जगजननी जय जय माँ जगजननी जय जय ॥
- भयहारिणि भवतारिणि भवभामिनि जय जय ॥
- तू ही सत चित सुखमय शुद्ध ब्रह्मरूपा ।
- सत्य सनातन सुंदर परशिव सुर भूपा ॥1॥
- आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी ।
- अमल अनंत अगोचर अज आनंदराशी ॥2॥
- अविकारी अघहारी अकल कलाधारी ।
- कर्ता विधि भर्ता हरि हर संहारकारी ॥3॥
- तू विधिवधू रमा तू उमा महामाया ।
- मूल प्रकृति विद्या तू तू जननी जाया ॥4॥
- राम कृष्ण तू सीता वृजरानी राधा ।
- तू वाञ्छाकल्पद्रुम हारिणि सब बाधा ॥5॥
- दशविद्या नवदुर्गा नाना शस्त्र करा ।
- अष्ट मातृका योगिनि नव नव रूप धरा ॥6॥
- तू परधामनिवासिनि महाविलासिनि तू।
- तू ही श्मशान विहारिणि ताण्डवलासिनि तू ॥7॥
- सुर मुनि मोहिनि सौम्या तू शोभाआ्धारा।
- विवसन विकट सरूपा प्रलयमयी धारा ॥8॥
- तू ही स्नेह सुधामयि तू अति गरलमना ।
- रत्नविभूषित तू ही तू ही अस्थितना ॥9॥
- मूलाधार निवासिनि इह पर सिद्धिप्रदे ।
- कालातीता काली कमला तू वरदे ॥10॥
- शक्ति शक्तिधर तू ही नित्य अभेदमयी ।
- भेद प्रदर्शनी वाणी विमले वेदत्रयी ॥11॥
- हम अति दीन दुखी मां विपत जाल घेरे ।
- हैं कपूत अति कपटी पर बालक तेरे ॥12॥
- निज स्वभाव वश जननी दया दृष्टि कीजे ।
- करुणा कर करुणामयी चरण शरण दीजे ॥13॥
DISCLAIMER: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी बात को अमल में लाने से पहले किसी पंडित या ज्योतिषी से जरूर बात करें।












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