धौनबुरी राजभट विश्वविद्यालय में आयोजित संस्कृत और बौद्ध अध्ययन सम्मेलन में भारतीय विद्वानों ने लिया भाग

बैंकाक के धौनबुरी राजभट विश्वविद्यालय में संस्कृत और बौद्ध धर्म से जुड़े एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के विद्वानों ने हिस्सा लिया। यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली, श्री अरविंदो, योग एंड नॉलेज फाउंडेशन, सस्टेनेबल इंडिया दोनों, छत्तीसगढ़ और थाईलैंड के बैंकाक स्थित धौनबुरी विश्वविद्यालय में आयोजित हुआ। सीएसयू के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी के मार्गदर्शन में चैंलेज एंड पौसेबिलीटीज औफ पाली एंड बुद्धिस्ट स्टडीज विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी (सेमिनार) 19 से 23 फरवरी 2024 तक आयोजित की गई।

कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने इस भव्य आयोजन की सफलता पर सभी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह समय की मांग है कि संस्कृत, पाली और इनके मिश्रित हाइब्रिड मोड पर आधृत संस्कृत के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए इस तरह के आयोजनों से डैसापोरिक अध्ययन को बढावा दिया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के विद्वानों, विशेषकर छात्र-छात्राओं को भारत की ओर आकर्षित करने के लिए सीएसयू "स्टडी इन इंडिया" जैसे अकादमिक कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है। इससे विदेशी छात्र-छात्राओं को भारत आकर संस्कृत और भारतीय संस्कृति को समझने का सुअवसर मिल सकेगा।

धौनबुरी राजभट विश्वविद्यालय, थाईलैंड के वाईस प्रेजिडेंट प्रो शासिय्पा बुकौंग (Sasiapa Bookong) ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने सीएसयू के कुलपति व अन्य सहयोगी आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

डॉ. मैट्टेय वेलीयटै (Dr. Metteyya Beliatte), विभाग प्रमुख, ग्लोबल बुद्धिज्म, इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस इनोवेशन एंड कल्चर, आरएमयूटीके ने कहा कि थाईलैंड सरकार पाली को एक जीवित भाषा के रूप में बढ़ावा देने के लिए नए पाठ्यक्रम बना रही है, ताकि पाली को मृत भाषा के रूप में देखने की धारणा को गलत साबित किया जा सके।

थाईलैंड के जाने-माने विद्वान डॉ. मैट्टेय ने भारत के वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की हैं। उन्होंने थाईलैंड में पाली भाषा के सर्वेक्षण को प्रस्तुत करते हुए इसकी वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पाली, संस्कृत के बहुत करीब है। इसके लिए, उन्होंने इन दोनों भाषाओं की भाषाई निकटता पर भी प्रकाश डाला।

उद्घाटन दिन के सत्र के अध्यक्ष, प्रो. राम नन्दन सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, बौद्ध दर्शन और पाली, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) ने कहा कि आज के सत्र में जिन विविध विषयों पर शोध पत्र पढ़े गए हैं, उनसे शोध के कई आयाम खुलेंगे।

इसी प्रकार, द्वितीय दिवस के सत्र के अध्यक्ष और सीएसयू, भोपाल परिसर के सह-निदेशक, प्रो. गुरुचरण सिंह नेगी ने भी पत्र वाचकों के नए विचारों का स्वागत करते हुए भारत और थाईलैंड में पाली भाषा की स्थिति और उसकी विभिन्न संभावनाओं पर प्रकाश डाला।

सीएसयू के अंतरराष्ट्रीय मामले और सहयोग कार्यालय के समन्वयक डॉ. नितिन कुमार जैन ने बताया कि कुलपति प्रो. वरखेड़ी जी के निर्देशानुसार, इसी यात्रा के दौरान सीएसयू के एक प्रतिनिधिमंडल ने थाईलैंड में संस्कृत उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के अवसरों की संभावना तलाशने के लिए एक समिति का गठन किया था।

इस समिति ने रॉयल बौद्ध महाचुलालोंगकोर्नराजविद्यालय विश्वविद्यालय, बैंकॉक के विद्वानों और अधिकारियों के साथ बैठक की। इस बैठक में सीएसयू लखनऊ परिसर में सीएसयू के बौद्ध दर्शन और पाली के पूर्व प्रोफेसर प्रो. राम नंदन सिंह, लखनऊ परिसर के प्रोफेसर और सह-निदेशक प्रो. जी.सी.एस. नेगी, डॉ. प्रफुल्ल गडपाल, एसोसिएट प्रोफेसर, लखनऊ परिसर (दोनों) के अतिरिक्त प्रो. अमरजीव लोचन, डीन अंतरराष्ट्रीय संबंध, दिल्ली विश्वविद्यालय भी उपस्थित थे।

डॉ. प्रफुल्ल गडपाल, एसोसिएट प्रोफेसर, लखनऊ परिसर ने बताया कि वे पाली भाषा को लोकप्रिय और डिजिटल बनाने की दिशा में क्या महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मामले और सहयोग कार्यालय के समन्वयक डॉ. नितिन कुमार जैन ने धन्यवाद ज्ञापन किया और डॉ. नीति सिंह ने मंच संचालन के साथ समापन सत्र संपन्न कराया।

डॉ. इन्द्राणी घोष, श्रीअरविंदो फाउंडेशन, फाउंडर ट्रस्टी ने "इवोल्यूशन एंड इंटीग्रल योग" पर महर्षि अरविंद की दृष्टि से प्रकाश डाला। सॉफ्टवेयर इंजीनियर डॉ. समरेन्द्र मोहन घोष, संस्थापक, श्रीअरविंदो फाउंडेशन और सस्टेनेबल इंडिया के सलाहकार ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार और वहाँ के लगभग एक सौ चार गांवों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण और क्लाइमेट जस्टिस के लिए कैसे नवाचारी पहल किए जा रहे हैं।

इस यात्रा के दौरान, पट्टाया में स्पीड बोट के माध्यम से कोरल बीच का भ्रमण किया। गाइड के सहयोग से समुद्री लहरों के बीच अविस्मरणीय गोताखोरी करना अद्भुत अनुभव रहा। साथ ही, पौराणिक लोक मान्यता के अनुसार समुद्र में स्थित भगवान विष्णु के शेषनाग के ऊपर पैराशूट के माध्यम से आकाश में उड़ान भरना किसी बाज पक्षी की तरह बहुत ही रोमांचक क्षण था।

इसके अतिरिक्त, यहां के सफारी वर्ल्ड में विविध रंग-बिरंगे पशु-पक्षियों को एक साथ जीवन जीते देखना ईश्वर की अपार सुंदरता को जीवंत कर रहा था। यद्यपि गज क्रीड़ा दर्शन के दौरान भगवान इंद्र के श्वेत हाथी ऐरावत के दर्शन का सौभाग्य नहीं मिल सका, लेकिन जिन हाथियों की अविस्मरणीय कला लीलाओं को देखने का अवसर मिला, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। इसके माध्यम से बाल साहित्य का एक रोचक एनीमेशन बनाया जाना चाहिए।

प्रकृति ने पशुओं और मानव के बीच कितना गहरा और समझदारी भरा संबंध जीने की सीख दी है। लेकिन आज मानव समाज अपने स्वार्थवश उसे छिन्न-भिन्न कर प्रकृति से विद्रोह कर अपना जीवन घोर संकट में डाल रहा है।

इसी क्रम में अल्काजर शो (Alcazar Show) भी थाईलैंड की सांस्कृतिक जनजीवन और रंगमंच की उत्कृष्टता से परिपूर्ण रहा, जो कहीं न कहीं भारत के भगिनी राज्यों (सेवन सिस्टर्स) और आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र के नॉस्टैल्जिया से मन को आकर्षित कर रहा था। मंदिरों और बौद्ध विहारों की स्वर्णिम आभा का अनोखा साम्य उगते सूर्य के राज्य अरुणाचल प्रदेश की यादों को ताज़ा कर रहा था। यहां लगभग सवा पांच सौ किलो सोने से जड़ा गोल्डन बुद्ध मंदिर भी अत्यंत मनमोहक था। नगरीय भवन विन्यास की भव्यता और स्वच्छता भी बहुत अच्छी थी, जिससे शहर निर्माण योजना के लिए दिशा ली जा सकती है।

महिला जनसंख्या से भरपूर और उनकी अलौकिक सुंदरता में कालिदास के मेघदूत की कांता सौंदर्य की पराकाष्ठा में भारतीय संस्कृति और बौद्ध दर्शन की करुणा और मुदिता से परिपूर्ण स्नेह को सहजता से महसूस किया जा सकता है।

आज के स्त्री विमर्श की दृष्टि से इसे पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है, ताकि इस देश से जुड़ी अनेक भ्रांतियों को दूर किया जा सके।

इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के सफल आयोजन पर कुलसचिव प्रो. आर. जी. मुरली कृष्ण ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि माननीय कुलपति जी के बहुआयामी और दूरदर्शी सोच के कारण ही आज सीएसयू देश के साथ-साथ वैश्विक पटल की ओर अग्रसर है।

प्रो. काशीनाथ न्यौपाने, निदेशक, प्रकाशन, प्रो. मदन मोहन झा, डीन, शैक्षणिक, प्रो. पवन कुमार, परीक्षा नियंत्रक, डॉ. पी. एम. गुप्त, विश्वविद्यालय पुस्तकालयाध्यक्ष, प्रो. रत्नमोहन झा, निदेशक, मुक्तस्वा, प्रो. नरसिम्हा नारायण और श्री जगन्नाथ झा (दोनों सह-डीन), प्रो. सुज्ञान कुमार मोहंती, प्रो. टी. गणेश, पवन व्यास (तीनों सह-निदेशक) के अतिरिक्त श्री कृष्ण कुमार के. टी. और शशिकांत (दोनों क्रमशः उप-निदेशक, प्रशासन और वित्त), डॉ. जितेंद्र राय गुरु, प्रोजेक्ट अधिकारी और डॉ. छोटी बाई मीना, स्नेहलता उपाध्याय, डॉ. सुनीता और अमृता कौर, श्री अनिल नौटियाल, श्री राम जी लाल मीना और श्री जितेंद्र कुमार आदि अधिकारियों ने भी प्रसन्नता व्यक्त की।

इस समापन अवसर पर सीएसयू से प्रकाशित होने वाली पाली, प्राकृत और संस्कृत भाषा से जुड़ी यूजीसी केयर लिस्टेड शोध पत्रिकाओं का भी विमोचन हुआ।

-प्रो अजय कुमार मिश्रा संयोजक मीडिया प्रकोष्ठ, आईकेएस प्रकल्प तथा पीआरओ, सीएसयू, दिल्ली।

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