Dalai Lama: 'दलाई लामा ही तिब्बत को बचा सकते हैं', डॉ. अरविंद यादव की ये किताब खोलेगी अनकहे राज
Dalai Lama: बकौल दलाई लामा डॉ. अरविंद यादव ने मेरे जीवन पर पांच भागों में किताबों की एक शृंखला लिखने के लिए जो समर्पण-भाव दिखाया है, उसके लिए मैं उनकी सराहना करता हूं। उन्होंने तिब्बती इतिहास और बौद्ध दर्शन पर गहन शोध और सूक्ष्म अध्ययन किया है और मेरी जीवन-यात्रा, मेरे सिद्धांतों के बारे में जानने के इच्छुक लोगों के लिए एक मूल्यवान दस्तावेज़ तैयार किया है।
तिब्बत में मेरे जन्म और बचपन से लेकर मेरे निर्वासन तक के जीवन को किताबों के रूप में लाते हुए डॉ. यादव ने अहिंसा और संवाद के ज़रिए समस्या के निदान के सिद्धान्त के प्रति तिब्बती लोगों की प्रतिबद्धता को उजागर किया है।

उन्होंने तिब्बती धर्म, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों और सांप्रदायिक सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए की जा रही मेरी कोशिशों पर प्रकाश डाला है। इन किताबों के माध्यम से प्राचीन भारतीय ज्ञान-भंडार को बढ़ावा देने के प्रति मेरी प्रतिबद्धता को विशिष्ट रूप से दर्शाया है।
'तिब्बती लोगों के संघर्ष के बारे में लोगों को पता चलेगा'
साल 2022 में हमारी मुलाक़ात के दौरान किए गए वायदे को बखूबी निभाने और मेरे जीवन पर किताबों की शृंखला लिखने के लिए मैं उनका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। उनकी ये किताबें तिब्बत के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध धरोहर और तिब्बती लोगों के मौजूदा संघर्ष के बारे में लोगों में जागरूकता लाने में मददगार साबित होगी।"
तेलुगु पत्रकार अरविंद यादव ने हिंदी में लिखी किताब
इस पुस्तक की भूमिका विश्वविख्यात लेखक, विचारक और वरिष्ठ राजनेता डॉ. कर्ण सिंह ने लिखी है। वे लिखते हैं, "दलाई लामा के जीवन और उनकी उपलब्धियों के बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी है। एक संपूर्ण जीवनी की ज़रूरत थी, जिसे हैदराबाद में जन्मे तेलुगु पत्रकार अरविंद यादव ने हिंदी में लिखकर पूरा किया है।
दलाई लामा के जीवन के अनकहे पहलुओं पर डालेगी प्रकाश
यह पुस्तक उसी का एक संक्षिप्त अनुवाद है, जो सरल भाषा में दलाई लामा के जीवन और व्यक्तित्व को प्रस्तुत करती है। मैं इस पुस्तक के लिए अरविंद यादव की सराहना करता हूँ और मुझे विश्वास है कि यह भारत ही नहीं, विदेशों में भी पढ़ी जाएगी।"
कई महान शख़्सियतों की जीवनी लिख चुके हैं डॉ. अरविंद यादव
आपको बता दें कि डॉ. अरविंद यादव ने इससे पहले भी कई महान शख़्सियतों की जीवनी लिखी है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक 'भारतरत्न' प्रो. सी.एन.आर. राव, भारत की पहली महिला हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. पद्मावती, जानी-मानी पार्श्वगायिका हेमलता, समाज सुधारिका फूलबासन यादव, दूरदर्शी उद्यमी सरदार जोध सिंह, डॉक्टर और उद्यमी डॉ. निम्मगड्डा उपेन्द्रनाथ के अलावा डॉ. वमिरेड्डी राधिका रेड्डी, डॉ. पिगिलम श्याम प्रसाद, डॉ. पवन अड्डाला, डॉ. जॉन क्रिस्टोफर जैसे मशहूर चिकित्सकों की जीवनियाँ अरविंद यादव लिख चुके हैं।
अरविंद यादव ने उस्मानिया विश्वविद्यालय से की है पढ़ाई
हैदराबाद में जन्मे और वहीं पले-बढ़े अरविंद यादव ने उस्मानिया विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी और हिंदी, दोनों विषयों में स्नातकोत्तर डिग्रियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने विज्ञान, मनोविज्ञान और कानून जैसे विषयों का भी अध्ययन किया है। वे दक्षिण भारत की राजनीति और संस्कृति की उनकी गहरी समझ रखते हैं। गांव-गांव, शहर-शहर की यात्राओं से नए-नए अनुभाव जुटाते हैं। यही अनुभव उनकी लेखनी और पत्रकारिता को खास बनाता है।
दलाई लामा की जीवन यात्रा को समझाएगी ये किताब
दलाई लामा पर यह नई जीवनी एक बार फिर यह साबित करती है कि डॉ. अरविंद यादव गहन शोध और निरंतर अध्ययन से शख़्सियतों के जीवन से जुड़े रोचक पहलुओं को शानदार अंदाज़ में लोगों के सामने लाने की काबिलियत रखते हैं। यह पुस्तक विश्व के सबसे सम्मानित आध्यात्मिक नेता, दलाई लामा की जीवन यात्रा को समझने का सुनहरा मौका देती है।
5 जुलाई 1935 की रात को जन्मा था अनोखा बच्चा
5 जुलाई 1935 की रात को घर-परिवार के सारे काम पूरे कर डिकी त्सेरिंग अपने पति के पास जाकर उनके बग़ल में लेट गईं। बेटी डोल्मा त्सेरिंग और बेटा ज्ञालो दोनडुब भी अपनी-अपनी जगह सो गए। 6 जुलाई 1935 की सुबह डिकी त्सेरिंग की नींद समय से पहले खुल गई। इसकी वजह थी तूफ़ान। तूफ़ान अभी गाव तक आया नहीं था, दूर था, लेकिन हवा के शोर की वजह से डिकी त्सेरिंग की नींद टूट गई। जैसे ही आँखें खुलीं, डिकी त्सेरिंग ने हलके से उभरे हुए अपने पेट पर हाथ फेरा। उन्हें ख़ुशी महसूस हुई और अनायास ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
किसी ने कहा- 'बड़ा इन्सान जन्म लेने वाला है'
उन्हें लगा कि किसी ने उनसे कहा, "बड़ा इन्सान जन्म लेने वाला है।" डिकी त्सेरिंग इस बात का मतलब नहीं समझ पाईं। बिस्तर से उठीं और अपने काम में लग गईं। काम करते समय उन्हें पेट में मरोड़ महसूस हुई। अनुभवी थीं, इस वजह से जान गईं कि बच्चे को जन्म देने का समय आ गया है। लेकिन उन्होंने अपना काम जारी रखा। हर दिन की तरह ही वे गोशाला गईं। जानवरों को चारा दिया। चूँकि तूफ़ान के संकेत साफ़ नज़र आ रहे थे, उन्होंने नाली को भी साफ़ किया। डिकी त्सेरिंग ने न सिर्फ़ अनुभव के आधार पर बहुत कुछ सीखा था, बल्कि वे दूरदर्शी भी थीं। घर-परिवार चलाने में माहिर थीं।
डिकी त्सेरिंग ने एक सुंदर और स्वस्थ्य बालक को जन्म दिया
काम करते समय डिकी त्सेरिंग को प्रसव-पीड़ा हुई। उन्होंने अपने हाथ हल्के से पेट पर फेरने शुरू किए। कुछ देर बाद वे फूस के एक ढेर के पास बैठ गईं। आस-पास का नज़ारा बहुत लुभावना था। बारिश के साफ़ संकेत थे। घने और काले बादल घेरे हुए थे। आसमान में बिजली गरज रही थी। तूफ़ान आने वाला था। पिछले कुछ दिनों से बारिश होती रही थी। इंद्रधनुष दिखाई दिए थे। दुबारा से इंद्रधनुष देखने की आस में गाँव के बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे। गोशाला में ज़ोमो जुगाली करते हुए अपने सिर हिला रहे थे। मुर्गियां अपना भोजन खोजने में मस्त थीं। कुछ मुर्गियाँ चोएकयोंग त्सेरिंग के आस-पास भी घूमने लगीं। ऐसे माहौल में डिकी त्सेरिंग ने एक सुंदर और स्वस्थ्य बालक को जन्म दिया। शिशु का वजन क़रीब आठ पाउंड था।
वन वाराह वर्ष के पांचवें महीने के पांचवें दिन शिशु का जन्म
मां डिकी त्सेरिंग ने ग़ौर किया कि जन्म के बाद शिशु रोया नहीं। तिब्बती पंचांग के अनुसार शिङ्-फग् (वन वाराह) वर्ष के पांचवें महीने के पांचवें दिन शिशु का जन्म हुआ था। अंग्रेज़ी कलेंडर के मुताबिक़ तारीख़ थी 6 जुलाई, 1935। कुछ देर में बेटी डोल्मा त्सेरिंग अपनी मां के पास पहुँचीं। जब डोल्मा त्सेरिंग ने देखा कि उनके नन्हे भाई की एक आंख ठीक तरह से खुली नहीं है, तब उन्होंने तुरंत अपना अँगूठा लगाकर उसे खोल दिया। बहन ने ही नवजात शिशु को उसके जीवन का पहला भोजन कराया।
नवजात शिशु को एक पौधे की छाल का रस चखाया
तिब्बती परंपरा को निभाते हुए नवजात शिशु को एक पौधे की छाल का रस चखाया गया। जब नवजात शिशु को घर के भीतर ला लिया गया, तब एक पड़ोसी दौड़ा-दौड़ा आया और चोएकयोंग त्सेरिंग और उनके परिवारवालों से कहने लगा,"एक इंद्रधनुष आपके मकान की छत को छू रहा है।"
'शिशु के जन्म के तुरंत बाद पिता की बीमारी दूर हो गई'
एक और बड़ी अनूठी घटना हुई। चोएकयोंग त्सेरिंग जो बीमार पड़ गए थे और खटिया पकड़ ली थी, वे इस शिशु के जन्म के तुरंत बाद अचानक स्वस्थ्य हो गए। उनकी बीमारी छूमंतर हो गई। परिवार में किसी को भी इस बात का आभास नहीं हुआ कि शिशु के जन्म से पिता की बीमारी के दूर होने का कोई संबंध है। केऊछंग रिनपोछे ने बिना समय गँवाए बाक़ी परीक्षाएं लेने का मन बना लिया था।
तेरहवें दलाई लामा की माला पहनी बालक ने
उन्होंने बालक के सामने दो मालाएँ रखीं और और फिर ल्हामो दोनडुब से अपनी माला ले लेने को कहा। बालक ने एक माला उठाई और उसे अपने गले में डाल दिया। ल्हामो दोनडुब ने जो माला उठाकर अपने गले में डाल ली थी, वह तेरहवें दलाई लामा की थी। खोजी दल के सदस्यों के लिए अपनी ख़ुशी को छिपाना मुश्किल हो रहा था। लेकिन सभी ने अपने आप को संयमित रखा।
डुगडुगी भी दलाई लामा वाली थी
इसके बाद केऊछंग रिनपोछे ने बालक के सामने दो डुगडुगियाँ रखीं। एक छोटी थी और दूसरी इससे बड़ी थी। बड़ी डुगडुगी बहुत सुंदर और आकर्षक थी। बड़ी वाली डुगडुगी में सुनहरी तस्मे लगे हुए थे। ल्हामो दोनडुब ने छोटी डुगडुगी उठाई और उसे बजाने लगे। बालक ने डुगडुगी उसी तरह बजाई, जैसे कि प्रार्थना के समय बजाई जाती है। जिस डुगडुगी को बालक ने उठाया था, वह डुगडुगी भी दलाई लामा की थी। इस डुगडुगी का इस्तेमाल दलाई लामा अपने अपने परिचारकों को बुलाने के लिए करते थे।
इसके बाद बालक के सामने दो छड़ियाँ रखी गईं और इनमें से एक को चुनने के लिया कहा गया। ल्हामो दोनडुब ने एक छड़ी अपने हाथ में ली और उसे ग़ौर से देखने लगे। केऊछंग रिनपोछे और उनके साथियों के दिल की धड़कनें फिर से तेज़ हो गईं। कुछ पल बाद ल्हामो दोनडुब ने वह छड़ी छोड़ की और दूसरी उठा ली और उसे अपना कहा।
दलाई लामा का प्याला ही बालक ने उठाया
जो पहली छड़ी बालक ने अपने हाथ में ली थी, वह भी दलाई लामा की थी। इस छड़ी को दलाई लामा ने एक लामा को दे दिया था। इस लामा ने यह छड़ी केल्स रिपोछे को सौंप दी थी। जिस छड़ी को बालक ने अपना कहा था, वह छड़ी दलाई लामा की ही थी। आगे बालक के सामने दो प्याले रखे गए। ल्हामो दोनडुब ने वही प्याला उठाया, जिससे दलाई लामा चाय पिया करते थे। इसके बाद बालक के सामने पूजा की दो घंटियाँ रखी गईं। ल्हामो दोनडुब ने वही घंटी उठाई, जो दलाई लामा की थी।
दलाई लामा के पुनरावतार की खोज पूरी हो गई
केऊछंग रिनपोछे और उनके साथ अब आनंद के सागर में डूब गए थे। मन में अब एक शंका भी नहीं बची थी। ल्हामो दोनडुब ने सभी परीक्षाएँ पास कर ली थीं। जो संकेत मिले थे, सभी सही साबित हो गए थे। केऊछंग रिनपोछे और उनके साथियों को यक़ीन हो गया कि दलाई लामा के पुनरावतार की खोज पूरी हो गई है। केऊछंग रिनपोछे और उनके साथी जान गए कि ल्हामो दोनडुब ही चौदहवें दलाई लामा हैं। सभी ल्हामो दोनडुब के सामने नतमस्तक हो गए। सभी की आँखों से ख़ुशी के आँसू बहने लगे।
"ज्ञान और करुणा के महासागर" की खोज कर ली
सभी के लिए ये जीवन के सबसे सुखद श्रण थे। सभी ख़ुद को ख़ुशनसीब मान रहे थे। यह कोई मामूली घटना नहीं थी। इस खोजी दल के सदस्यों ने "ज्ञान और करुणा के महासागर" की खोज कर ली थी। दलाई लामा के नए अवतार का पता लगा लिया था। तिब्बतियों के जीवन में दलाई लामा का काफ़ी महत्व है। दलाई लामा सिर्फ़ तिब्बत के शासक मात्र नहीं हैं, वे सबसे बड़े धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु हैं। वे बुद्ध हैं, जीवित बुद्ध हैं। वे करुणा के बोधिसत्व, चेनरेजी यानी अवलोकितेश्वर का साकार रूप हैं।
अल साल्वाडोर ने तिब्बत के समर्थन में आवाज़ उठाई
तिब्बत पर संकट दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। तिब्बत सरकार ने इस संकट को दूर करने के मक़सद से एक बड़ा फ़ैसला लिया। फ़ैसला लिया कि वह संयुक्त राष्ट्र की मदद लेने की कोशिश करेगा। 7 नवंबर, 1950 को तिब्बत ने संयुक्त राष्ट्र से अपील की। लेकिन तिब्बत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं था, इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने इस पर ध्यान नहीं दिया। संयुक्त राष्ट्र की बैठक में केवल अल साल्वाडोर ने तिब्बत के समर्थन में आवाज़ उठाई। बाक़ी सभी देशों के प्रतिनिधि चुप रहे। चीन संयुक्त राष्ट्र का सदस्य था।
'दलाई लामा को अब शासन की ज़िम्मेदारी सौंप दी जानी चाहिए'
अब सबसे बड़े और निर्णायक फ़ैसले लेने का समय आ गया था। हमेशा की तरह ही तिब्बत सरकार ने इस बार भी दैववक्ताओं और अनुभवी लामाओं की सलाह लेने की सोची। दैववक्ताओं और अनुभवी लामाओं ने सरकार से कहा, "समय आ गया है। दलाई लामा को अब शासन की ज़िम्मेदारी सौंप दी जानी चाहिए।"
दलाई लामा की शिक्षा 18 साल की उम्र तक चलती है
परंपरा के मुताबिक़, दलाई लामा की शिक्षा 18 साल की उम्र तक चलती है। 18 साल की उम्र में जब उनकी शिक्षा पूरी हो जाती है और वे सभी परीक्षाओं में पास हो जाते हैं, तब सत्ता की कमान उनके हाथों में सौंपी जाती है। यह परंपरा कई सालों से चली आ रही थी। दलाई लामा के 18 साल की उम्र का होने तक सत्ता की कमान चुने हुए राज्याधिकारी के हाथों में होती है। चौदहवें दलाई लामा की खोज के समय रेटिंग रिनपोछे राज्याधिकारी थे। लेकिन उन पर कुछ आरोप लगे और उनकी जगह ताक्त्रा रिनपोछे को राज्याधिकारी बनाया गया था। संकट के इस नए दौर में राज्याधिकारी ताक्त्रा रिनपोछे ही थे।
'दलाई लामा ही तिब्बत को बचा सकते हैं'
ताक्त्रा रिनपोछे भी जान गए थे कि संकट के इस दौर में वे सत्ता नहीं संभाल सकते हैं। दलाई लामा ही तिब्बत को बचा सकते हैं। ताक्त्रा रिनपोछे ने एलान कर दिया किया कि दैववक्ताओं और अनुभवी लामाओं की सलाह को जस का तस मान लिया जाएगा। एक दिन दलाई लामा अपने दरबार में बैठे हुए थे। माहौल गंभीर था। वहाँ एक दैवज्ञ ध्यान की अवस्था में था। उसका शरीर काँप रहा था। उसका चेहरा लाल हो गया था और उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। वह ज़ोर-ज़ोर से बोल रहा था, जैसे कोई और ताक़त उसके शरीर को माध्यम बनाकर बोल रही हो।
'आपको कमान अपने हाथों में लेनी होगी'
धीरे-धीरे वह दैववक्ता अपने क़दम बढ़ाता हुआ दलाई लामा के पास पहुँचा। उसके हाथ में खाता था। खाता यानी एक सफ़ेद रेशमी स्कार्फ, सम्मान और आशीर्वाद का प्रतीक होता है। उसने वह खाता दलाई लामा की गोद में रख दिया। इसके बाद उसकी आवाज़ और भी गंभीर हो गई। उसने दृढ़ता से कहा, "अब समय आ गया है। आपको कमान अपने हाथों में लेनी होगी।"
'अब दलाई लामा को केवल एक धार्मिक गुरु नहीं बल्कि राजनीतिक नेता थे'
ये शब्द सुनते ही पूरा दरबार एकदम शांत हो गया। वहाँ बैठे सभी अधिकारी, भिक्षु और विद्वान समझ गए कि यह कोई साधारण बात नहीं है। यह 'दैवी संकेत' था। एक आदेश था। अब दलाई लामा को केवल एक धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि तिब्बत के राजनीतिक नेता की भूमिका भी निभानी थी।
दलाई लामा के सामने तिब्बत का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी
यह एक ऐतिहासिक पल था। दलाई लामा उस समय किशोरावस्था में थे। मठीय शिक्षा जारी थी। धर्म-अध्यात्म, इतिहास-भूगोल, ज्ञान-विज्ञान की बातें सीख रहे थे। ध्यान-साधना पूजा-अनुष्ठानों के रहस्यों के बारे में जान रहे थे। लेकिन अब उनके सामने तिब्बत का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी थी। अब उन्हें न केवल धर्म की रक्षा करनी थी, बल्कि देश की राजनीति, जनता की भलाई, और तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए भी काम करना था।
मन में सवाल उठे, क्या मैं तैयार हूँ? क्या मैं कर पाऊँगा?
दलाई लामा का मन अंदर ही अंदर काँप उठा। मन में सवाल उठे, क्या मैं तैयार हूँ? क्या मैं कर पाऊँगा? लेकिन दलाई लामा ने मन के भावों पर काबू पाने की कोशिश शुरू की। बुद्ध के उपदेशों को याद किया। वे ख़ुद पर क़ाबू पाने में कामयाब हुए। मन शांत हुआ। विचार स्थिर हुए। एहसास हुआ कि आज नहीं तो कल उन्हें तिब्बत की कमान अपने हाथों में लेनी ही होगी। दलाई लामा ने बुद्ध को याद किया और मन ही मन संकल्प लिया, "चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, मैं पीछे नहीं हटूँगा।"
ज्योतिषियों ने तय किया कि 17 नवंबर 1950 की सुबह दलाई लामा तिब्बत के आध्यात्मिक और राजनैतिक नेता के रूप में सत्ता संभालेंगे। राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हुई। तिब्बत के लोगों में एक नए उत्साह का संचार हुआ। नई उम्मीद जगी। लोगों के मन में विश्वास जगा कि दलाई लामा तिब्बत के संकट को दूर कर देंगे। उनके नेतृत्व में तिब्बत में शांति होगी। ख़ुशहाली होगी। चीन तिब्बत से दूर रहेगा।
17 नवंबर, 1950, यह तिब्बत के इतिहास में एक बहुत बड़ा दिन
यह सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं थी, बल्कि एक ऐसा मोड़ था, जहाँ तिब्बत के भविष्य की दिशा तय होनी थी। पारंपरिक नियमों के अनुसार, कोई भी दलाई लामा जब तक 18 वर्ष के नहीं हो जाते, तब तक वे तिब्बत की शासन-व्यवस्था की बागडोर नहीं संभाल सकते थे। लेकिन परिस्थितियाँ अब सामान्य नहीं थीं। देश पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। चीन की सेना तिब्बत की सीमाओं में प्रवेश कर चुकी थी। पूरे तिब्बत में भय और अनिश्चितता का माहौल था। ऐसे समय में एक बड़ा और ऐतिहासिक फ़ैसला लिया गया-परंपरा को तोड़ा जाएगा, दलाई लामा को पंद्रह साल की उम्र में ही राजनीति की कमान सौंपी जाएगी। दलाई लामा अब सिर्फ एक धार्मिक नेता नहीं रहेंगे, बल्कि वे तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष भी बनेंगे।
17 नवंबर की सुबह दलाई लामा बहुत जल्दी उठे। यह दिन बहुत ख़ास था। ज्योतिषियों ने कहा था कि इस दिन हरा रंग शुभ रहेगा। इसलिए दलाई लामा ने कमर में हरे रंग का कपड़ा बाँधा।समारोह से पहले एक परंपरा निभानी थी, उन्हें एक सेब खाना था। दलाई लामा को सेब पसंद नहीं था। उनका मन नहीं था सेब खाने का, लेकिन यह परंपरा थी, इसलिए उन्होंने खा लिया। सेब खाने के बाद उनके पेट में तकलीफ़ शुरू हुई। पेट भारी लगने लगा।
जब तकलीफ़ बढ़ने लगी, तब उन्होंने अपने ख़ास सेवक के ज़रिए संदेश भेजा कि समारोह जल्दी समाप्त किया जाए। लेकिन समारोह की रस्में बहुत लंबी थीं। हर चरण तय विधियों और परंपराओं से जुड़ा था। इसलिए उन्हें चुपचाप बैठकर सब सहना पड़ा।
समारोह के दौरान उन्हें 'स्वर्णिम धर्म चक्र' सौंपा गया। यह बहुत ही पवित्र और ऐतिहासिक प्रतीक था। यह चक्र तिब्बत में राजनीतिक शक्ति और शासन का प्रतीक माना जाता है। जब किसी दलाई लामा को पूरी सत्ता सौंपी जाती है, तब उन्हें यह धर्म चक्र दिया जाता है। यह चक्र केवल एक वस्तु नहीं था, यह एक संदेश था - अब दलाई लामा ही तिब्बत के आध्यात्मिक और राजनैतिक नेता हैं। यह चक्र उनके हाथ में देकर सबने उन्हें तिब्बत की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी।
एक किशोर लड़का बना राष्ट्र का सर्वमान्य नेता
इस तरह, एक किशोर लड़का, जो अभी अपनी धार्मिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाया था, वह एक राष्ट्र का सर्वमान्य नेता बन गया। वह भी एक ऐसे समय में, जब तिब्बत पर ख़तरा मंडरा रहा था। वाक़ई यह बड़ी घटना थी। राष्ट्र पर मंडरा रहे संकट के घने और डरावने बादलों को देखकर तिब्बत की सरकार और लोगों ने पंद्रह साल के दलाई लामा को अपना नेता बना लिया था। यह फ़ैसला आसान नहीं था, क्योंकि दलाई लामा अभी बहुत किशोर थे। लेकिन तक़ाज़ा-ए-वक़्त कुछ और था।
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