हर्बल फार्मा क्वीन भगवती बल्दवा: आयुर्वेद का ग्लोबल तूफान, दुनिया के 65 देशों में गाड़ दिया हिंदुस्तान का झंडा
भगवती बल्दवा, राजस्थान की वो बिजनेसवुमन, जिसने ग्लोबल मार्केट में हिंदुस्तान का डंका कुछ इस कदर बजाया है कि वेस्टर्न फार्मा लॉबी के पसीने छूट गए। जब बात हेल्थ और मेडिसिन की आती है, तो पूरी दुनिया को लगता है कि असली पावर तो सिर्फ अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी लैब्स में है। लेकिन इस विदेशी गुरूर की धज्जियां उड़ाने वाली एक हिंदुस्तानी महिला ने ऐसा भौकाल काटा है, जिसकी गूंज आज हर महाद्वीप में सुनाई दे रही है।

इग्जोरियल ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की फाउंडर भगवती महेश बल्दवा, वो हर्बल फार्मा क्वीन हैं, जिनका खौफ और रुतबा आज अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के 65 से ज्यादा देशों में एकछत्र हुकूमत कर रहा है । आज इग्जोरियल को दुनिया भर में आयुर्वेद के क्षेत्र की पहली मल्टी-बिलियन डॉलर यूनिकॉर्न कंपनी का दर्जा हासिल हो चुका है।
जिस आयुर्वेद को अंग्रेज कभी सिर्फ दादी मां का नुस्खा कहकर खारिज कर देते थे, आज उसी आयुर्वेद को भगवती बल्दवा ने 70 से ज्यादा गोल्ड स्टैंडर्ड क्लिनिकल ट्रायल्स के जरिए मॉडर्न फार्मा की छाती पर मूँग दलते हुए पूरी शान से स्थापित कर दिया है । लेकिन क्या आप जानते हैं कि अरबों डॉलर के इस भयंकर साम्राज्य की शुरुआत महलों से नहीं हुई थी। उनका रिक्शा से रॉल्स रॉयस तक का यह सफर एक ऐसे संघर्ष से शुरू होता है, जो हर किसी के रोंगटे खड़े कर देता है।
कहानी फ्लैशबैक में जाती है। तारीख थी 16 अप्रैल 1963, और जगह थी राजस्थान के बीकानेर जिले का एक छोटा सा कस्बा-श्री डूंगरगढ़ । भगवती का जन्म एक ऐसे रूढ़िवादी दौर में हुआ था, जब लड़कियों का घर की दहलीज लांघकर कॉलेज जाना भी किसी एवरेस्ट फतह करने से कम नहीं माना जाता था । समाज की बेड़ियां, लड़कियों के लिए सख्त नियम और घुटन भरा माहौल। उस वक्त लड़कियों को सिर्फ चूल्हा-चौका सिखाया जाता था, लेकिन इस मारवाड़ी बेटी के दिमाग में तो दुनिया मुट्ठी में करने का ब्लूप्रिंट बन रहा था। तमाम विरोधों और मुश्किलों का सीना चीरकर उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी।
जब वो बीकानेर में डिस्टेंस एज्यूकेशन से बी. कॉम की परीक्षा दे रही थी, तो 1200 छात्रों के बीच अकेली लड़की थी। इसके बाद एस.पी. जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से D.F.M.B हासिल किया । फिर साल 1982 में उनकी जिंदगी में वो गेम-चेंजिंग मोमेंट आया, जिसने उनके सपनों को जेट पैक लगा दिया । उनका विवाह महेश बल्दवा के साथ हुआ, जो उनके लिए महज़ एक पति नहीं, बल्कि एक ऐसा रॉक-सॉलिड सपोर्ट सिस्टम साबित हुए, जिसने उनके हर विजन को परवान चढ़ाया । लेकिन बीकानेर की तपती रेत से निकलकर कॉर्पोरेट वर्ल्ड का बेताज बादशाह बनने का रास्ता फूलों से नहीं भरा था।
वक्त का पहिया घूमा और साल आ गया 1989 । शहर था हैदराबाद। जेब में कोई करोड़ों की पुश्तैनी दौलत या विदेशी फंडिंग नहीं थी। बैकअप के नाम पर था सिर्फ 3 लाख रुपये का एक छोटा सा बैंक लोन । इसी मामूली सी रकम के साथ भगवती और उनके पति ने एक छोटे से केमिकल व्यवसाय की नींव रखी । जरा सोचिए, एक महिला, जो राजस्थान के एक टिपिकल माहौल से निकलकर सीधे एक कट-थ्रोट इंडस्ट्रियल सेटअप में कदम रख रही है! वहां कितने ही कॉर्पोरेट शार्क उन्हें कच्चा चबा जाने को तैयार बैठे थे।
लेकिन भगवती बल्दवा की एग्रेसिव अप्रोच, डिसीजन-मेकिंग पावर और गजब के एडमिनिस्ट्रेटिव स्किल्स के सामने अच्छे-अच्छों ने घुटने टेक दिए । देखते ही देखते ये छोटा सा केमिकल का बिजनेस उनके बेटे कार्तिकेय बल्दवा के सॉलिड सपोर्ट से एक ग्लोबल इंडस्ट्रियल ग्रुप में तब्दील हो गया । आज ये इग्जोरियल ग्रुप केमिकल्स, बायोटेक्नोलॉजी, टेक्सटाइल, माइनिंग, ज्वैलरी और रियल एस्टेट जैसे सेक्टर्स में बवंडर ला रहा है।
जब भगवती बल्दवा ने अश्वगंधा को इंटरनेशनल मार्केट में उतारने का अग्रेसिव डिसीजन लिया, तो विदेशी कंपनियों ने उनका जमकर मजाक उड़ाया। उनका ईगो कहता था कि भारत की जड़ी-बूटियां क्लिनिकल तौर पर कभी प्रूव नहीं हो सकतीं। लेकिन भगवती का विजन लेजर-शार्प था। उन्होंने लॉस एंजिल्स बेस्ड अपनी कंपनी इग्जोरियल इंक के जरिए अश्वगंधा को केवल एक पारंपरिक औषधि की कैटेगरी से खींचकर बाहर निकाला और सीधे एविडेंस-बेस्ड मॉडर्न न्यूट्रास्यूटिकल्स की टॉप लीग में खड़ा कर दिया ।
उन्होंने मार्केट में लॉन्च किया KSM-66 अश्वगंधा, जो आज की तारीख में दुनिया का सबसे शुद्ध और क्लिनिकली प्रूवन हर्बल प्रोडक्ट माना जाता है । और इसका इम्पैक्ट सुनेंगे तो हिल जाएंगे! आज ग्लोबल मार्केट में अश्वगंधा का 65% से ज्यादा मार्केट शेयर सिर्फ और सिर्फ भगवती जी की कंपनी के कब्जे में है । इसे कहते हैं असली ग्लोबल डोमिनेशन! अमेरिका में बैठे लोग भी आज इस हिंदुस्तानी कंपनी के सामने हाथ बांधे खड़े हैं, जो हर्बल सप्लीमेंट्स की दुनिया में एकतरफा राज कर रही है और आयुर्वेद की पहली यूनिकॉर्न बन चुकी है।
इनोवेशन और बिजनेस का अग्रेसन, भगवती बल्दवा की रगों में दौड़ता है। अक्टूबर 2025 में उन्होंने महिलाओं की हेल्थ को सीधे टारगेट करते हुए SRI 81 शतावरी नाम का एक एकदम नया और रेवोल्यूशनरी प्रोडक्ट मार्केट में उतार दिया है । ये प्रोडक्ट उनके लगातार चल रहे साइंटिफिक रिसर्च और मार्केट डोमिनेशन का सबसे फ्रेश सबूत है । और बॉस, सिर्फ बिजनेस ही नहीं, बल्कि पावर के गलियारों में भी आज उनका जबरदस्त दबदबा है। भारत सरकार ने इनकी एक्सपर्टीज को देखते हुए जनवरी 2026 में इन्हें स्पाइस बोर्ड ऑफ इंडिया का बोर्ड मेंबर नियुक्त किया। ये एग्रीकल्चर और एक्सपोर्ट के फील्ड में उनके बाप लेवल के एक्सपीरियंस का नेशनल सम्मान है । बात यहीं खत्म नहीं होती, उन्हें 'केंद्रीय बजट-2026 की प्रदेश समिति' में भी एक टॉप उद्योगपति के हैसियत से एक बेहद पावरफुल जिम्मेदारी सौंपी गई है।
ये उनकी सॉलिड इकनॉमिक पॉलिसी और विजन का सबसे बड़ा ठप्पा है । हिंदुस्तान की इस आयरन लेडी के पावर का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि देश के सबसे बड़े और ताकतवर राजनेता भी उनके मुरीद हैं।
मार्च 2022 में खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रतिष्ठित मन की बात कार्यक्रम में भगवती बल्दवा और उनकी कंपनी इग्जोरियल का खुलकर नाम लिया और उनकी सराहना की । पीएम मोदी ने दुनिया भर में अश्वगंधा की अवेयरनेस फैलाने और टॉप क्वालिटी प्रोडक्शन प्रोसेस में इन्वेस्ट करने के लिए उनके भयंकर विजन को सलाम किया। साल 2019 से लेकर आज तक, ये लगातार तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों की शीर्ष करदाता बनी हुई हैं।
इसी परफॉरमेंस की वजह से 2021 में आजादी का अमृत महोत्सव के दौरान इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर ने उन्हें डिस्टिंग्विश्ड टैक्सपेयर के पावरफुल अवार्ड से नवाजा । इसके अलावा 2020 में FTCCI ने उन्हें आउटस्टैंडिंग वुमन एंटरप्रेन्योर का खिताब भी दिया है । 2016 में ये हर्बल इंडस्ट्री लीडर बनीं और 2012 में वुमन एंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर चुनी गईं । लेकिन एक अरबपति बिजनेसवुमन होने के अलावा, वो देश के सबसे बड़े सरकारी संस्थानों में भी अपनी धमक रखती हैं।
भगवती का रुतबा सिर्फ बैलेंस शीट और प्रॉफिट मार्जिन तक सीमित नहीं है। वो पॉलिसी मेकिंग की एक ऐसी साइलेंट लेकिन डेडली ऑपरेटर हैं, जिनका लोहा हर कोई मानता है। साल 2015 से 2019 तक, वो भारत सरकार की नवरत्न कंपनी NMDC लिमिटेड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर की कुर्सी संभाल चुकी हैं । इसके अलावा रेलवे यूजर्स कंसल्टेटिव कमेटी (2000-2001) और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की NIPCCD (2002-2003) की अहम मेंबर भी रही हैं।
राजनीति के मैदान में भी उनका डंका बजता है। वो बीजेपी महिला मोर्चा की पूर्व प्रभारी (राजस्थान 2003-2005) और ऑल इंडिया को-कन्वीनर (वुमन एंटरप्रेन्योर सेल 2018-2021) जैसे अहम पदों पर काम कर चुकी हैं । FTCCI में महिलाओं के बिजनेस को लीड कर चुकी हैं और महिलाओं की सेफ्टी के लिए तेलंगाना पुलिस के सुपर-इनिशिएटिव SAHAS की स्टीयरिंग कमेटी की मेंबर हैं । सबसे बड़ा फैक्ट ये है कि विमेन एम्पावरमेंट पर वो सिर्फ स्पीच नहीं देतीं, उनके खुद के बिजनेसेज में 70 फीसदी वर्कफोर्स महिलाओं की है, जो उनके एक्शन का सबसे बड़ा सबूत है । इसी वजह से 2005 में ही उन्हें सामाजिक परिवर्तन के लिए इंदिरा गांधी नेशनल अवॉर्ड मिल चुका था । लेकिन इतना सब कुछ हासिल करने के बाद, शोहरत और अरबों की दौलत के पहाड़ पर बैठने के बावजूद, उनके सीने में जो एक चीज सबसे तेज धड़कती है, वो है उनका राष्ट्रवाद ।
एक तरफ जहाँ कई बड़े-बड़े कॉर्पोरेट टायकून्स वेस्टर्न कल्चर की चकाचौंध में अंधे हो जाते हैं, वहीं भगवती बल्दवा अपनी जड़ों और संस्कारों से उतनी ही आक्रामकता के साथ जुड़ी हुई हैं । वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों से बेहद गहराई से प्रभावित हैं और परिवार से लेकर पूरे समाज में विशुद्ध भारतीय मूल्यों को प्राथमिकता देती हैं । वो सेवा भारती और वनवासी कल्याण परिषद के लिए दिन-रात एक्टिव रहकर काम करती हैं । महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान की प्राइम डोनर और ट्रस्टी के तौर पर वो वैदिक छात्रों की पढ़ाई का पूरा जिम्मा उठाती हैं।
राजस्थान के एक छोटे से गाँव में 350 साल पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार हो, या 'श्री रामानुज सहस्राब्दी' के तहत हेल्थ कैंप्स लगवाना, उनका डोनेशन सनातन धर्म की जड़ों में खाद-पानी का काम कर रहा है । समाज के कमजोर वर्गों के लिए इन्होंने 'महेश भगवती बल्दवा फाउंडेशन' और 'महेश फाउंडेशन' के बैनर तले काम किया है।
महेश फाउंडेशन के तहत इन्होंने वीकर सेक्शन के लिए मौत के बाद 10 लाख रुपये की फैमिली सिक्योरिटी स्कीम और ग्रुप मेडिकल इंश्योरेंस को लॉन्च करवाया, जो कई बेबस परिवारों को उजड़ने से बचाने वाला साबित हुआ है। लघु उद्योग भारती के साथ जयपुर और जोधपुर में स्टेट-ऑफ-द-आर्ट स्किल डेवलपमेंट सेंटर खड़े कर दिए । विकलांगों के कल्याण के लिए सक्षम (SAKSHAM) के राजस्थान सेंटर्स गोद ले लिये हैं। यहाँ तक कि तिरुपति देवस्थानम (TTD) में एक पेडियाट्रिक हॉस्पिटल सेट अप करने में भी उन्होंने तगड़ा सपोर्ट किया।
भगवती बल्दवा का पूरा वजूद और उनका लाइफस्टाइल, सादगी और हाई-ऑक्टेन मॉडर्न कॉर्पोरेट स्ट्रैटेजी का एक ऐसा रेयर और डेडली कॉम्बिनेशन है, जिसे आज के स्टार्टअप गुरु भी डिकोड नहीं कर सकते । एक तरफ वो मॉडर्न बायोटेक्नोलॉजी और फार्मा वर्ल्ड में अमेरिका-यूरोप की धज्जियां उड़ाते हुए हिंदुस्तान का तिरंगा लहरा रही हैं, और दूसरी तरफ अपनी मिटटी के उत्थान के लिए जमीन पर खून-पसीना एक कर रही हैं । वो भारत के करोड़ों युवाओं और उन लाखों महिलाओं के लिए एक ऐसा धधकता हुआ सूरज हैं, जो समाज की तमाम सड़ी-गली रूढ़ियों की बेड़ियों को पिघलाकर अपनी खुद की एक नई और आक्रामक पहचान बनाना चाहती हैं ।
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