क्या भारत के लिए दो-दलीय व्यवस्था बेहतर होगी?
Two Party System: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) के मुखिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने एक अंग्रेजी समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद कई छोटे क्षेत्रीय दल या तो कांग्रेस से जुड़ जाएंगे अथवा उनका कांग्रेस में विलय हो जाएगा।
हालांकि अपनी विभाजित पार्टी के कांग्रेस में विलय को लेकर उन्होंने स्पष्टता से कुछ नहीं कहा किंतु स्वयं और पार्टी की विचारधारा को गांधी-नेहरू की वैचारिक लाइन बताकर राजनीतिक कयासों को तो जन्म दे ही दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शरद पवार के बयान पर उन्हें और उद्धव ठाकरे को घेरा है जिन्होंने शिव सेना में व्यापक टूट होने के बाद इंडिया गठबंधन का साझेदार होना स्वीकार किया।

इस मुद्दे पर महाराष्ट्र में हो रही राजनीति के चार पहलू नजर आते हैं, जिनका प्रभाव राष्ट्रव्यापी हो सकता है। पहला, अपने बयान से क्या शरद पवार कांग्रेस को मजबूत करके उसे भाजपा के समक्ष खड़ा करना चाहते हैं? वे स्वयं भी कांग्रेस से निकले हैं। यह तभी संभव है जब तमाम छोटे-बड़े क्षेत्रीय दल कांग्रेस से जुड़ें और यूपीए-3 की कल्पना साकार हो क्योंकि भाजपा के राजनीतिक अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोकने की क्षमता यूपीए में है, जिसे 10 वर्षों तक मनमोहन सिंह सरकार के नेतृत्व में यूपीए ने साबित किया है।
दूसरा, क्या शरद पवार ने अपनी मान्यता के विरुद्ध जाकर राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने का मन बना लिया है? ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ वर्षों पूर्व उन्होंने राहुल गांधी में निरंतरता की कमी का हवाला दिया था। तो क्या यह माना जाए कि राहुल गांधी की जो छवि बना दी गई थी, वे अब उससे निकल चुके हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने उनसे बेहतर नेता राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है?
तीसरा, भाजपा द्वारा छोटे-बड़े क्षेत्रीय दलों में टूट का जो आरोप विपक्षी लगाते हैं, उससे भी शरद पवार सभी को संकेत देने का प्रयास कर रहे हैं कि भाजपा के साथ टुकड़ों में जाकर अपने अस्तित्व को मिटाने से अच्छा है कि कांग्रेस में शामिल होकर उसे मजबूती दी जाए।
आखिरकार, अधिकांश क्षेत्रीय दलों का निर्माण कांग्रेस की गर्भनाल से ही हुआ है। बिहार में पप्पू यादव की पार्टी का कांग्रेस में विलय इसी मानसिकता का उदाहरण है। भविष्य में हनुमान बेनीवाल की आरएलपी, आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस, कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, मध्य प्रदेश में बाप-जयस जैसे दल यदि कांग्रेस में विलय कर दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि भाजपा ने जिस प्रकार इन्हें राजनीति में अप्रासंगिक करना शुरू किया है, उससे इनके अस्तित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
चौथा और सबसे महत्त्वपूर्व पहलू है, क्या शरद पवार गाहे-बगाहे भाजपा की दो दलीय व्यवस्था के नेरेटिव को धार दे रहे हैं? शरद पवार की राजनीति को देखें तो वह अप्रत्याशित रही है और उनकी कथनी और करनी में अंतर रहा है। यदि इस पहलू को सही मानें तो यह भारत के लोकतंत्र को पूरी तरह से बदलने की मंशा है।
भारत का लोकतंत्र जीवंत
भारत में गाहे-बगाहे दो दलीय व्यवस्था को लेकर राजनीतिक व सामाजिक रूप से चर्चा होती रहती है। एक बड़े वर्ग का मानना है कि भारत में सैकड़ों राजनीतिक दलों के होने के चलते यहां क्षेत्रवाद, भाषावाद एवं जातिवाद को बढ़ावा मिलता है। ऐसे लोग भारत में अमेरिका की अध्यक्षात्मक प्रणाली अपनाने का हवाला देते हैं जहां समस्त शक्तियां राष्ट्रपति के पास केंद्रित हैं किंतु भारत में राजनीतिक शक्तियों का विकेंद्रीकरण है।
संविधान सभा ने भारत में शासन की संसदीय प्रणाली का चयन किया क्योंकि यह भारतीय संदर्भ में कारगर थी। फिर स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली से परिचित था इसलिए संविधान निर्माताओं ने स्थायित्व की जगह जवाबदेही को महत्त्व दिया तथा सरकार को नागरिकों के प्रति जवाबदेह माना अतः तमाम जातीय, भाषा, प्रांत इत्यादि की विसंगतियों के बाद भी भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यद्यपि भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटिश राजशाही से ठीक उलट है और यहां राजा के स्थान पर गणतंत्रीय व्यवस्था है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपनी कमियां हैं जिनमें प्रमुख हैं, गठबंधन की राजनीति, राजनीति में अपराधीकरण, नीतिगत निरंतरता का अभाव आदि किंतु बहुलतावाद की अवधारणा के चलते भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ही कारगर है, जिसके अपने लाभ हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली में कार्यपालिका एवं विधायिका एक-दूसरे के परस्पर पूरक हैं।
लोकतंत्र स्वतंत्र लोक सेवा और गोपनीयता पर आधारित होती है जिसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य नागरिक अधिकारों को अक्षुण्ण रखना है। लोकतांत्रिक प्रणाली निरंकुश नहीं हो सकती जबकि अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के अपने दोष हैं और यही कारण है कि भारत का लोकतंत्र जीवंत है।
संभव नहीं है दो-दलीय व्यवस्था
भारत विश्व में सर्वाधिक विविधता वाला समाज है। 'कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी' जैसी विविधता विश्व के किसी राष्ट्र में नहीं मिलेगी। दो दलीय शासन व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष तो यही होगा कि इससे भारत की विविधता पर कुठाराघात होगा। इतने बड़े देश में दो दलीय व्यवस्था से अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना कठिन होगा।
ऐसा होने पर सबसे बड़ा संकट निरंकुशता का पैदा होगा। बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली शासन को निरंकुश होने से रोकती है। बहुमत के बाद भी सामूहिक रूप से उत्तरदायित्व शासक को निरंकुश होने से रोकता है। बहुदलीय व्यवस्था के चलते नागरिक अधिकारों का आदर किया जाता है। एक लोकतांत्रिक सरकार संवैधानिक कानूनों एवं नागरिक अधिकारों द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा के भीतर काम करती है जिसकी अपेक्षा दो दलीय व्यवस्था से नहीं की जा सकती।
भारत की वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो भारत में लोकतंत्र की सर्वश्रेठ व्यवस्था बहुदलीय व्यवस्था ही है जिसके चलते सभी वर्गों, समाजों को प्रतिनिधित्व का अवसर प्राप्त होता है। ऐसे में यदि शरद पवार अपने बयान से दो-दलीय व्यवस्था का इशारा कर रहे हों तो यह भारत में संभव नहीं है। फिलहाल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की जद्दोजहद में लगे शरद पवार को अपनी पार्टी और अपने परिवार की ओर देखना चाहिए जहां उनके अपने ही अधिनायकवाद के चलते टूट हो गई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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