World Hindi Day: हिन्दी के बढ़ते प्रभाव से खतरे में पड़ती बोलियां
World Hindi Day: लोक के रोम-रोम में अगर राम स्थापित हैं, तो इसका बड़ा श्रेय तुलसीदास को जाता है। रामचरित मानस को रचकर उन्होंने राम को कहें तो सनातन समाज के हर कोने में पहुंचा दिया।

यह काम उन्होंने संस्कृत या खड़ी बोली वाली हिन्दी में नहीं बल्कि अवधी बोली में किया।
सुनीति कुमार चटर्जी जैसे भाषा वैज्ञानिक अवधी को हिंदी की एक बोली बताते हैं। लेकिन लोक से लेकर साहित्य की भाषा रही अवधी को आज चुनौती हिंदी से मिल रही है। अवधी ही क्यों, भोजपुरी, ब्रज, बघेली हिंदी की तमाम स्थानीय भाषाओं को आज सबसे ज्यादा चुनौती अपनी खड़ी बोली वाली हिंदी से ही है। उस हिंदी से, जिसे आधुनिक भाषा विज्ञानियों ने केंद्रीय भाषा मान रखा है, और अवधी, भोजपुरी, मगही, बघेली, छत्तीसगढ़ी, ब्रज, बांगरू आदि को हिंदी की ही बोली बता रखा है।
आज विश्व हिंदी दिवस है। इस मौके पर हिंदी की बात होनी स्वाभाविक है। इस मौके पर विंध्य के दक्षिण से हिंदी विरोध की आवाज उठना भी उतना ही स्वाभाविक है। विंध्य पर्वतमाला के दक्षिण यानी कर्नाटक और तमिलनाडु से हिंदी के विरोध में जब भी आवाज उठती है तो आवाज उठाने वाली ताकतें दो आधार बताती हैं। पहला यह कि हिंदी उन पर जबरदस्ती थोपी जा रही है, और दूसरा यह कि हिंदी से उनकी भाषाओं को खतरा है। हालांकि दोनों ही आरोप सही नहीं है। ना तो हिंदी को थोपा जा रहा है और ना ही हिंदी का विरोध करने वाली स्थानीय भाषाओं को हिंदी से खतरा है।
अव्वल तो ऐसी चिंता अवधी, भोजपुरी या ऐसी भाषाओं की होनी चाहिए। अवधी तो मध्य काल में केंद्रीय भाषा रही है। रामचरित मानस, विनय पत्रिका, हनुमान चालीसा, कवितावली, पद्मावत जैसी रचनाएं तो अवधी में ही आईं। बेशक रामचरित मानस को सर्वाधिक लोक स्नेह मिला, लेकिन बाकी रचनाएं भी अलक्षित नहीं रहीं। उनका भी यथेष्ठ प्रचार-प्रसार हुआ। नागर समाज से लेकर लोक तक ने इन्हें स्वीकार किया और उनका मान बढ़ाया। इसी तरह उसी दौर में ब्रज भी केंद्रीय भाषा रही। सूरदास, रहीम, बिहारी आदि के जरिए ब्रज के साहित्य ने भी अपना स्थान बनाया। चाहे अवधी हो या फिर ब्रज, इनमें प्रतिष्ठित रचनाकारों की श्रृंखला है। उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता।
बेशक एक वक्त के बाद चाहे अवधी हो या फिर ब्रज, दोनों केंद्रीय भाषाएं नहीं रहीं। पहले फारसी का उन्होंने दबाव सहा और बाद में जब आधुनिक हिंदी बढ़ने लगी तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई। हो सकता है कि फारसी के दबाव के आगे उनका वश ना चला हो, लेकिन हिंदी के विस्तार में स्थानीय बोलियों और भाषाओं ने अपना भी विस्तार और प्रसार देखा। हिंदी से खतरे की आशंका या आरोप दक्षिण की जो भाषाएं लगाती हैं, उन्हें हिंदी से कोई खतरा ही नहीं है।
हमारे संविधानविदों ने हिंदी को राजभाषा के तौर पर स्थापित करने की जो कोशिश की, दरअसल उसके निशाने पर भारतीय भाषाएं नहीं रहीं। बल्कि अंग्रेजी की जगह पर हिंदी को स्थापित करना था। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि अंग्रेजी की जगह अपनी देसज हिंदी को हमारे गैर हिंदीभाषी राज्य स्वीकार करते, लेकिन उन्होंने अंग्रेजी के ही वर्चस्व में अपनी भलाई देखी। अंग्रेजी उन्हें साम्राज्यवादी नजर नहीं आती, लेकिन हिंदी उन्हें थोपी जाती हुई दिखने लगती है।
हिंदी के विस्तार के दो रूप देश में दिखते हैं। हिंदी जब गैर हिंदीभाषी इलाकों में विस्तारित होती है तो यह विस्तार स्थानीय भाषा की कीमत पर नहीं होता। बल्कि उस इलाका विशेष की स्थानीय शब्द संपदा और लय को आत्मसात करते हुए होता है। इसीलिए तमिलनाडु की हिंदी का स्वाद, उच्चारण और लय कुछ विशेष है तो केरल की हिंदी का कुछ अलग। कर्नाटक और आंध्र ही नहीं, बांग्ला और उड़िया इलाके में जो भी किंचित हिंदी चलन में है, उस पर स्थानीय प्रभाव ज्यादा है। स्थानीय बोध को आत्मसात करना हिंदी की ताकत है।
लेकिन हिंदी के केंद्रीय इलाकों की ओर का हिंदी का विकास अलग-सा नजर आता है। अवधी, भोजपुरी, मगही, ब्रज आदि इलाकों में हिंदी का विस्तार हो रहा है तो उसका असर स्थानीय भाषाओं के शब्द भंडार में संकुचन होता जा रहा है। इन भाषाओं के कई स्थानीय शब्द चलन से बाहर हो गए हैं, इसके बावजूद कि अपने प्रभावी इलाकों में अब भी आम बोलचाल और संपर्क की भाषा ये स्थानीय भाषाएं ही हैं।
हिंदी की बढती ताकत कहें या स्थानीय भाषाओं का खतरा, इसे हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ पत्रकार पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी ने समझ लिया था। इसीलिए उन्होंने हिंदी में जनपदीय आंदोलन चलाया था। उनका मानना था कि जनपदीय भाषाओं के शब्द भंडार के जरिए हिंदी ना सिर्फ समृद्ध होगी, बल्कि जनपदीय भाषाएं भी हिंदी से संस्कार और शब्द ग्रहण करेंगी। ऐसा हुआ भी। उदारीकरण के पहले ऐसा खूब हुआ। पत्रकारिता ने अपने विस्तार के लिए स्थानीय भाषाओं से शब्द खूब लिए। स्थानीय मुहावरे भी इस्तेमाल किए।
लेकिन उदारीकरण के बाद एक बार फिर जिस तरह उत्तर भारत में भी अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ने लगा, हिंदी की अपनी ही शब्द संपदा संकुचित होने लगी। उसकी अंग्रेजी से आवाजाही, स्थानीय भाषाओं की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ी। इसका असर ना सिर्फ हिंदी पर दिखने लगा, बल्कि हिंदी केंद्र की स्थानीय भाषाओं पर भी दिखने लगा। इससे हिंदी का देसज रंग किंचित फीका होने लगा। स्थानीय बोलियां और भाषाएं भी बदरंग जैसी होने लगीं। उनमें भी अंग्रेजी के शब्द बाजार के जरिए घुसते चले गए। ना सिर्फ घुस गए, बल्कि उन्होंने स्थानीय भाषाओं की लय तक स्वीकार कर ली। हर स्थानीय भाषा में अंग्रेजी से घुसपैठ कर चुके कई शब्द मिल जाएंगे।
भूमंडलीकरण कहें या फिर वैश्वीकरण या वैश्विक ग्राम, इस दौर में विंध्य के दक्षिणी इलाकों को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी भाषाओं को हिंदी से कोई खतरा नहीं है। बल्कि हिंदी उनसे समृद्ध हो रही है और हिंदी से भी वे भी समृद्ध हो सकती हैं। खड़ी बोली वाली हिन्दी के बढते चलन से स्थानीय बोलियों और भाषाओं को खतरा दिखता है।
हम मान सकते हैं कि यह हिंदी के विस्तार कीमत है, लेकिन विस्तार की इतनी बड़ी कीमत ठीक नहीं है। इसलिए जरूरी है कि स्थानीय बोलियों को भी संभाला जाए, उनकी शब्द संपदा, उनकी परंपरा, उनका जीवन हमारी सांस्कृतिक और सभ्यतागत थाती है। उस थाती को संभालना, अपनी संस्कृति को तो संभालना है, अपनी सांस्कृतिक विकास यात्रा को भी बचाए रखना है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
'मैंने 6 मर्दों के साथ', 62 साल की इस बॉलीवुड एक्ट्रेस ने खोलीं लव लाइफ की परतें, 2 शादियों में हुआ ऐसा हाल -
Delhi Riots: जिसने पूरी जिंदगी ईर्ष्या की, उसी के निकाह में 6 साल जेल काटकर पहुंचे Sharjeel Imam, दूल्हा कौन? -
Uttar Pradesh Silver Rate Today: ईद पर चांदी बुरी तरह UP में लुढकी? Lucknow समेत 8 शहरों का ताजा भाव क्या? -
Gold Silver Rate Crash: सोना ₹13,000 और चांदी ₹30,000 सस्ती, क्या यही है खरीदारी का समय? आज के ताजा रेट -
Mojtaba Khamenei: जिंदा है मोजतबा खामेनेई! मौत के दावों के बीच ईरान ने जारी किया सीक्रेट VIDEO -
US-Iran War: ‘पिछले हालात नहीं दोहराएंगे’, ईरान के विदेश मंत्री ने Ceasefire पर बढ़ाई Trump की टेंशन? -
iran Vs Israel War: ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला, अमेरिका-इजराइल की भीषण बमबारी से दहला नतांज -
ईरान का गायब सुप्रीम लीडर! जिंदा है या सच में मर गया? मोजतबा खामेनेई क्यों नहीं आ रहा सामने, IRGC चला रहे देश? -
Love Story: बंगाल की इस खूबसूरत नेता का 7 साल तक चला चक्कर, पति है फेमस निर्माता, कहां हुई थी पहली मुलाकात? -
'मेरे साथ गलत किया', Monalisa की शादी मामले में नया मोड़, डायरेक्टर सनोज मिश्रा पर लगा सनसनीखेज आरोप -
Mathura News: 'फरसा वाले बाबा' की हत्या से ब्रज में उबाल! दिल्ली-आगरा हाईवे जाम, CM योगी ने लिया एक्शन -
Strait of Hormuz में आधी रात को भारतीय जहाज का किसने दिया साथ? हमले के डर से तैयार थे लाइफ राफ्ट












Click it and Unblock the Notifications