World Heritage Sites: विश्व-विरासत घोषित होने के फायदे और नुकसान
प.बंगाल के वीरभूमि जिले में मौजूद छोटा सा कस्बा शांतिनिकेतन, अभी तक कविगुरु रबीन्द्रनाथ टैगोर के पिता श्री देबेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय के लिए ही विश्वविख्यात था। लेकिन बीते हफ्ते, इसे एक नई पहचान हासिल हुई है। यह देश की 42वीं ऐसी साइट है, जिसे यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने विश्व विरासत घोषित किया है। पूरी दुनिया में ऐसी बहुत सारी साइटें हैं। 168 देशों की 1199 साइटें, 933 सांस्कृतिक, 227 प्राकृतिक और बाकी 39 मिली-जुली। हर साइट की अपनी एक कहानी है, और उसे विश्व विरासत घोषित किए जाने की भी।

सबसे ज्यादा विश्व विरासतों वाले देशों की सूची में इटली, चीन, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के बाद भारत छठवें स्थान पर है। यह कोई साधारण बात नहीं है कि हमारे यहॉं इतनी ज्यादा विश्व विरासतें हैं। लेकिन, भारत की विविधता और विशालता को देखते हुए यह एक बहुत छोटी सी संख्या जान पड़ती है। बेशक प्रमाणपत्र न मिला हो, लेकिन हमारे देश में ऐसी हजारों ज्ञात-अज्ञात जगहें मौजूद हो सकती हैं, जो विश्व विरासतों की श्रेणी में आने की योग्यता रखती हैं।
जब यूनेस्को किसी जगह या संरचना को विश्व विरासत घोषित करता है तो इसकी एक चरणबद्ध प्रक्रिया होती है। जो उस देश द्वारा अपनी साइट के नामांकन के साथ शुरू होती है। नामांकन में एक विस्तृत दस्तावेज शामिल है, जिसमें साइट के ओयूवी (असाधारण वैश्विक महत्व) और इसके संरक्षण व प्रबंधन योजना का वर्णन होता है। इसके बाद विशेषज्ञों के एक पैनल द्वारा प्रस्ताव की समीक्षा की जाती है। फिर यह पैनल 21 देशों के प्रतिनिधियों वाली विश्व विरासत समिति को अपनी सिफारिशें भेजता है।
इन सिफारिशों के आधार पर समिति वर्ष में एक बार बैठक करके यह तय करती है कि किन स्थलों को विश्व विरासत सूची में शामिल किया जा सकता है। उसका निर्णय अंतिम होता है। इसमें अमूमन प्राकृतिक व सांस्कृतिक जगहों को ही चुना जाता है। लेकिन, कई बार कुछ अलग तरह के चयन भी हो सकते हैं, जैसे कि पिछले साल यूनेस्को ने कोलकाता दुर्गा पूजा को विश्व विरासत सूची में शामिल कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था।
इसके पीछे तर्क था कि यह एक अनोखा और जीवंत पर्व है। इस फैसले से विरासतों की सूची में शामिल होने वाला यह देश का पहला अमूर्त सांस्कृतिक विरासत स्थल बन गया। अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का तात्पर्य संगीत, नृत्य, भाषा और त्यौहार जैसी उन सजीव परंपराओं और प्रथाओं से है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं।
प्रत्यक्षत: यह एक बहुत सीधी-सरल प्रक्रिया नजर आती है। लेकिन माना जाता है कि कई बार इसमें डिप्लोमेसी भी बड़ी भूमिका निभाती है, क्योंकि अक्सर विभिन्न देश अपनी साइटों को इसमें शामिल करने की पैरवी करते हैं, और विशेषज्ञों को तरह-तरह से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। उनके ऐसा करने के पीछे वे फायदे हैं, जो किसी स्थल को विश्व विरासत बनने की वजह से मिलते हैं। जैसे कि इससे अंतरराष्ट्रीय मान्यता और प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है, क्योंकि विश्व विरासत सूची में अंकित होना विशिष्टता का प्रतीक है जो पर्यटकों और निवेश को आकर्षित करने में मदद कर सकता है।
हमारे देश में चंपानेर-पावागढ़ आर्कियोलॉजिकल पार्क, रानी की बावड़ी, हम्पी, कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान, नालन्दा महाविहार जैसी कई साइटें हैं, जिन्हें विश्व विरासत सूची में शामिल होने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। दूसरा फायदा यह है कि यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों को उनके संरक्षण और प्रबंधन में मदद के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। साथ ही किसी साइट के विश्व विरासत घोषित हो जाने के बाद, उसे ऐसे विकास से बचाव के लिए सुरक्षा कवच हासिल हो जाता है, जो उसे नुकसान पहुँचा सकता था।
साइटों के चयन को लेकर यूनेस्को पर अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि वह पहले से ही प्रसिद्ध साइटों को विश्व विरासत घोषित करने में ज्यादा रुचि लेता है। लेकिन, वह कई बार कुछ ऐसी साइटों को भी यह सम्मान देता है, जिनके बारे में या तो लोगों को पता ही नहीं होता या फिर बहुत कम लोगों को पता होता है। पलाऊ का रॉक आइलैंड साउथ लैगून, सर्यारका - उत्तरी कजाकिस्तान के स्टेपी और झीलें, कोलंबिया का चिरिबिकेट नेशनल पार्क, तुर्की का गोबेकली टेपे ल्हासा, तिब्बत में जोखांग मंदिर और रूस के करेलिया में किज़ी पोगोस्ट जैसी साइटें इसका प्रमाण हैं।
इस संदर्भ में यूनेस्कों की निर्णय लेने की प्रक्रिया बेशक कितनी ही सख्त क्यों न हो, लेकिन इसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर अतीत में कई बार सवाल उठाए जा चुके हैं। विश्व विरासत सूची यूरोसेंट्रिक मानने वाले कुछ आलोचकों का आरोप है कि इसका झुकाव यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी स्थलों के प्रति ज्यादा है। इस आरोप के मद्देनजर वर्ष 2019 में एक अध्ययन किया गया, जिसमें पाया गया कि विश्व विरासतों की सूची में यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी स्थलों की हिस्सेदारी 50% से अधिक है, जबकि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की हिस्सेदारी 10% से भी कम है।
कुछ आलोचक यह भी शिकायत करते हैं कि विश्व धरोहर का दर्जा हासिल करने के कारण कुछ साइटों का अतिव्यावसायीकरण हो गया है। जैसे कि चीन की दीवार आज दुनिया के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है, और इसकी लोकप्रियता ने प्रदूषण व भीड़भाड़ जैसी कई समस्याओं को जन्म दिया है।
इन सामान्य आलोचनाओं के अलावा, कुछ विश्व विरासत स्थलों के चयन पर भी विवाद हो चुके हैं। वर्ष 2010 में, यूनेस्को ने हेब्रोन/अल-खलील प्राचीन नगर को फिलिस्तीनी स्थल के रूप में विश्व विरासत सूची में शामिल किया। इस निर्णय को इज़राइल के विरोध का सामना करना पड़ा, जिसका तर्क था कि साइट को फिलीस्तीनी साइट की बजाए, एक यहूदी और मुस्लिम साइट के रूप में अंकित किया जाना चाहिए था।
ऐसे में कई बार ऐसी नौबत भी आ जाती है, जब यूनेस्को को किसी स्थल को विश्व विरासत घोषित करने के बाद, अपना फैसला रद्द करना पड़ता है। जैसे कि वर्ष 2021 में लिवरपूल मैरीटाइम मर्केंटाइल सिटी को सूची से हटा दिया गया था। वजह यह बताई गई कि लोगों को यह चिंता सताने लगी थी कि इस साइट की प्रस्तावित विकास परियोजनाओं से उसके ऐतिहासिक चरित्र के नष्ट हो जाने का खतरा है। इसी तरह वर्ष 2009 में जर्मनी में ड्रेसडेन एल्बे घाटी को, एल्बे नदी पर एक नए पुल के निर्माण के कारण विरासत सूची से हटा दिया गया था।
यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल के खिताब से संबंधित कुछ सामान्य मुद्दों और विवादों में कुछ मामलों में, स्थानीय समुदायों या स्वदेशी समूहों द्वारा किसी साइट को विश्व विरासत के रूप में नामित करने का विरोध किया गया है। विरोध के पीछे उन्हें विस्थापन, भूमि के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का डर हो सकता है। और यह भी कि जब किसी साइट को विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया जाता है, तो अक्सर पर्यटन में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुभव होता है। हालाँकि इससे आर्थिक लाभ तो होता है, लेकिन इससे भीड़भाड़ भी बढ़ती है, जिससे पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को काफी नुकसान भी हो सकता है।
कई बार कुछ अच्छी वजह भी सामने आती हैं, जैसे कि वर्ष 2007 में ओमान में अरेबियन ओरिक्स अभयारण्य को जंगल में ओरिक्स के सफल प्रजनन के कारण सूची से हटा दिया गया। क्योंकि इस स्थल को मूल रूप से अरेबियन ऑरिक्स की लुप्तप्राय स्थिति के कारण विश्व विरासत सूची में दर्ज किया गया था। अभयारण्य के संरक्षण की सफलता देखते हुए इसे सूची से बाहर कर दिया गया। वैसे सच तो यह है कि किसी भी विश्व विरासत को सूची से हटना एक बेहद असामान्य और लगभग दुर्लभ घटना है। यूनेस्को यह कदम केवल तभी उठाता है जब कोई स्थल विश्व विरासत बने रहने के मानदंडों को पूरा नहीं कर पा रहा हो या उसे लेकर बहुत ज्यादा विवाद हो गया हो ।
कुल मिलाकर, यूनेस्को विश्व विरासत कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण पहल है जो विश्व की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासतों के संरक्षण और प्रचार में सहायता करता है। हालाँकि, आलोचनाओं के बीच काम करते हुए यह सुनिश्चित करना भी बहुत जरूरी है कि विश्व विरासतों की सूची, दुनिया की सभी संस्कृतियों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हो।












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