Mohammed Shami: क्रिकेटर शमी के बहाने मजहबी कट्टरता बढ़ाने का प्रयास
Mohammed Shami: बुधवार को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भारतीय क्रिकेट टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए विश्वकप के फाइनल में अपनी जगह बना ली। भारत की इस शानदार विजय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और मैन ऑफ द मैच मोहम्मद शमी के साथ साथ विराट कोहली, श्रेयस अय्यर, शुभमन गिल, राहुल शर्मा और अन्य सभी खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन देखने को मिला। लेकिन जिस तरह से एक ही मैच में 7 विकेट लेकर शमी ने न्यूजीलैंड की बल्लेबाजी को ध्वस्त कर दिया उसके कारण उनकी चर्चा देशभर में हुई।
सोशल मीडिया पर क्रिकेट प्रशंसकों के साथ साथ आम भारतीय जन द्वारा भी इस जीत पर अपने अपने तरीके से बधाई देकर विजय जश्न मनाया जा रहा है। यह क्रिकेट खेल के इस दीवाने देश के लिए बिल्कुल नैसर्गिक और सामान्य सी बात है। लेकिन सोशल मीडिया पर एक वर्ग द्वारा जिस तरह से भारत के उत्कृष्ट बॉलर मोहम्मद शमी की मजहबी पहचान को आगे कर मुस्लिम-मुस्लिम का राग अलापा जा रहा है वह हैरान करनेवाला है। ऐसा लग रहा है जैसे मोहम्मद शमी ने क्रिकेट के मैदान में नहीं जंग के मैदान में खड़े थे और जीत टीम इंडिया की नहीं मुस्लिम कौम की हुई है।

इस मानसिकता के पीछे वही अशराफवादी साम्प्रदायिक सोच है जिसने एक तरफ तो देश का बंटवारा कराया और दूसरी ओर यह दंभ भरा कि इस देश के भाग्य का फैसला मुसलमानों के बिना नहीं हो सकता। इसे समझने के लिए सोशल मीडिया के कुछ ट्वीट देखते हैं तो अंदाज लग जाता है कि अशराफिया मानसिकता कैसे आज भी दहाड़े मार रही है।
शादाब चौहान नामक एक यूजर शमी के साथ अपनी फोटो शेयर करते हुए लिखता है कि "शामी भाई के आखिरी विकेट लेते ही दिल से निकला नारा ए तकबीर अल्लाह हू अकबर। मेरे भाई मोहम्मद शमी ने इतिहास लिख दिया। भारत की पकड़ से दूर जाते मैच को भारत की तरफ कर दिया और बता दिया कि जिसको तुमने बाहर बिठाया था वही वर्ल्ड कप जिताएगा।" इसी तरह एक और यूजर शदफ आफरीन ने लिखा है कि "मियां भाई का जलवा बरकरार है साथियों।" इसी तरह एक और गुमनाम यूजर लिखता है कि "मौलाना आजाद ने सही कहा था इस मुल्क की तकदीर के फैसले तुम्हारे बिना नहीं हो सकते।"
किसी ने लिखा कि "मियां मियां मियां भाई" तो किसी ने कहा कि "मियां है तो मुमकिन है"। लेकिन इन सभी ट्वीट्स को पढ़ते समय एक बात साफ समझ आती है कि जो लोग भी ये ट्वीट कर रहे हैं उनके लिए टीम इंडिया की जीत का कोई महत्व नहीं है। अगर कुछ महत्व है तो सिर्फ मोहम्मद शमी के मजहब का क्योंकि वो मुस्लिम हैं।
इस तरह की मजहबी साम्प्रदायिक भाषा का इस्तेमाल कर और मुस्लिम साम्प्रदायिक को बढ़ावा देकर क्रिकेट के इस सभ्य खेल को सांप्रदायिक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यह न क्रिकेट खेल के लिए और न ही भारत जैसे सेकुलर देश के सामाजिक सौहार्द के लिए उचित है, जहां विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के लोग सदियों से आपस में मिल जुल कर रहते हैं।
जहां तक क्रिकेटर शमी का सवाल है तो वो भारत के एक बेहतरीन गेंदबाज बन कर उभरे हैं और क्रिकेट विश्व कप में भारत के अब तक के अच्छे प्रदर्शन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। उत्तर प्रदेश के एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान परिवार से संबंध रखने वाले शमी ने अपने गेंदबाज पिता के स्वप्न को साकार करने के लिए क्रिकेट को अपना ओढ़ना बिछौना बना लिया। उनके पिता ने खेत में ही विकेट तैयार कर उनको प्रशिक्षित करना शुरू किया। फिर खेत बेच कर क्रिकेट एकेडमी में भर्ती करवाया। शमी ने अपनी मेहनत लगन से कोलकाता रणजी टीम और आईपीएल से होते हुए भारतीय टीम तक का सफर किया है। इस दौरान शमी को पारिवारिक विवाद का भी सामना करना पड़ा उन पर मैच फिक्सिंग तक का आरोप लगाया गया जिसने उनके व्यक्तिगत जीवन एवं क्रिकेट कैरियर को बुरी तरह प्रभावित भी किया। लेकिन इन सबके बाद भी वह संघर्ष की आग में तप कर कुंदन बन भारतीय क्रिकेट का रोशन सितारा बन कर उभरे।
शमी और उनके प्रेरणादायक संघर्ष को जहां पूरे देश में बिना किसी मजहबी भेदभाव के सम्मान और सराहना मिल रही है, वहीं कुछ लोग उनको एक मजहब विशेष के खांचे में डाल कर उनका कद छोटा एवं सांप्रदायिक करने का प्रयास कर रहें हैं। इन लोगों को सोचना चाहिए कि आज उनके अच्छे खेल को आप उनके मजहबी पहचान से जोड़ कर जश्न मना रहें हैं कल यदि उनके खराब खेल के कारण कोई उनके मजहबी पहचान के आधार पर निंदा करेगा तब आपको कैसा लगेगा?
खेल में हार जीत होती रहती है और यह पूरी तरह संबंधित खेल के खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। उनकी मजहबी आस्था से इसका बहुत कुछ लेना देना नहीं होता है। इसी विश्वकप में केशव महाराज दक्षिण अफ्रीका से तो रचिन रविन्द्र न्यूजीलैंड की ओर से खेल रहे थे। तो क्या उनके प्रदर्शन को उनके धर्म के आधार पर देखा जाएगा या उनके देश के आधार पर?
किसी हिन्दू खिलाड़ी द्वारा अच्छा प्रदर्शन करने पर हिन्दू समाज की और से ऐसी प्रतिक्रिया कभी नहीं आती कि देखो फलां खिलाड़ी हिन्दू था इसलिए उसने जीत दिलवा दी। लेकिन मुस्लिम समाज की ओर से ऐसा प्रायः देखने में आता है। जो ना तो भारतीय क्रिकेट और ना ही शमी जैसे उत्कृष्ट क्रिकेटर के हित में है। ऐसे किसी भी कृत्य का पूरे भारतीय समाज को पुरजोर विरोध करना चाहिए ताकि फिर कभी कोई किसी खिलाड़ी के शानदार प्रदर्शन को मजहबी चश्मे से न देखे और क्रिकेट के साथ साथ भारतीय समाज का सेक्युलर चरित्र चमकता दमकता रहे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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