World Cancer Day: कैंसर की चिकित्सा से अधिक जागरुकता और बचाव जरूरी

कैंसर ऐसी बीमारी है, जिसकी शुरुआत में पहचान और कारण का पता लगाना मुश्किल है। इस कारण चिकित्सा विज्ञान भी कैंसर के इलाज में पूरी तरह सफल नहीं हो पाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि कैंसर से बचने के क्या उपाय हो सकते हैं?

cancer

आंकडों की मानें तो दुनिया के कुल कैंसर रोगियों में 20% अकेले भारत में हैं। यह संख्या पिछले 5 वर्षों में लगातार बढ़कर चीन और अमरीका को टक्कर देते हुए दिख रही है। भारत कैंसर रोगियों की संख्या के मामले में तीसरे स्थान पर आ खड़ा हुआ है। देश में केरल, हरियाणा, पंजाब, मिजोरम, कर्नाटक से सबसे अधिक कैंसर रोगियों की रिपोर्टिंग होती है।

कैंसर के अन्य कारणों के बीच सबसे बड़ा कारण पेस्टीसाइड्स का अन्धाधुन्ध प्रयोग है। भारत में जहां महिलाओं में स्तन, कोलोरेक्टल, फेफड़े, सर्वाइकल और थाइरॉइड कैंसर प्रमुख हैं, वहीं पुरुषों में फेफड़े, मुंह, प्रोस्टेट, कोलोरेक्टल, पेट और लीवर कैंसर के मामले सबसे ज़्यादा देखने को मिलते हैं। पूरी दुनिया में लंग कैंसर (फेफड़ों का कैंसर) के कारण मरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसमें भी भारत की अपनी बढ़त बनाने की तैयारी दिखाई पड़ती है। शोध भी यही बताते हैं कि वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण फेफड़ों का कैंसर, मुुंह और गले के कैंसर का खतरा बढ़ रहा है।

हालांकि शरीर में कैंसर कोशिकाएं विभिन्न कारणों से बढ़ती हैं। इसके पीछे मानसिक और शारीरिक दोनों अनियमितताओं को कारण माना जा सकता है। कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों को कार्सिनोजेन यानी कैंसरजनक कहा जाता है। यह कार्सिनोजेन कुछ भी हो सकता है जैसे केमिकल, तंबाकू, तंबाकू का धुआं, प्रदूषित वातावरण, वायरस आदि। शारीरिक श्रम की कमी, रोजमर्रा की एक्टीविटी की कमी, मोटापा, तंबाकू का प्रयोग, धूम्रपान, शराब और अल्ट्रा वॉयलेट किरणों के संपर्क में आना आदि कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारक हैं जो कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। भोजन में पोषाहार अनियमितता भी उनमें से एक है।

पिछले एक-डेढ़ दशक से भारत में प्रॉसेस्ड फूड का प्रचलन बढ़ा है। यदि आप भी उसका बहुत अधिक प्रयोग करते हैं तो सावधान हो जाना चाहिए। ऐसे खाद्य पदार्थ मोटापा तो बढ़ाते ही हैं लेकिन ये कैंसर के खतरे को भी बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। प्रॉसेस्ड मीट का कार्सिनोजेन कम्पाउंड पेट और कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है। फार्म में कृत्रिम हॉर्मोन देकर तैयार एनिमल प्रोडक्ट भी कैंसर रिस्क का कारण हो सकते हैं।

कई प्रतिष्ठित संस्थाओं में हुए कैंसर संबंधी शोध यह भी कहते हैं कि अत्यधिक रिफाइंड चीनी और कार्बोहाइड्रेट्स का प्रयोग भी कैंसर को दावत देने के समान हैं। ये कई मरीजों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन को बढ़ाने के कारक पाए गए हैं। आहार में रिफाइंड प्रोडक्ट्स की अधिक मात्रा अक्सर कुछ विशेष प्रकार के कैंसर के लिए उत्तरदायी हो सकती है, जिसमें स्तन यानी ब्रेस्ट कैंसर, डिम्बग्रंथि यानी ओवरी का कैंसर और एंडोमेट्रियल या यूटेरियन और गर्भाशय कैंसर का अधिक खतरा होता है। इसीलिए रिफाइन्ड फूड का सेवन बहुत कम मात्रा में ही करने की सलाह दी जाती है।

पहले भारत में मिठास के लिए चीनी के स्थान पर गुड़, खजूर या शहद का प्रयोग होता था। रिफाइंड कार्ब्स का प्रयोग न करके लोग साबुत अनाज, मोटा आटा प्रयोग करते थे। और रिफाइंड तेल की जगह लोग स्थानीय तिलहन से कोल्हू में तेल निकालते थे, जिसमें सरसों, अलसी या तीसी (जिसे इंग्लिश में फ्लेक्स सीड कहते हैं), तिल, सींगदाना ( मूंगफली), कपास के बीज, सूरजमुखी आदि के तेल या घी का सेवन करते थे। लेकिन अब जैसे-जैसे फूड प्रोसेस्ड होते जा रहे हैं, कैंसर सहित स्वास्थ्य के दूसरे खतरे भी बढ़ रहे हैं।

अल्कोहल और कार्बोनेटेड पेय पदार्थ जिसे सॉफ्ट ड्रिंक कहा जाता है, दोनों ही स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से हानिकारक हैं। इसका सेवन शरीर में फ्री रैडिकल्स को बढ़ा देता है जो शरीर में सूजन का कारण बन सकता है। यह इम्यून फंक्शन को इस तरह प्रभावित करता है कि कैंसर की आरम्भिक अवस्था में संक्रमित कोशिकाओं का पता लगाना कठिन हो जाता है।

भारत अभी कुछ वर्षों में घर के भोजन की अपनी परंपरागत व्यवस्था से दूर होता जा रहा है। ऐसे में लगातार डिब्बाबंद पैकेज्ड फूड का चलन बढ़ता जा रहा है। इसके लिए किसी विशेष सुपर मार्केट में जाने की भी आवश्यकता नहीं है। अब इसकी उपलब्धता आसपास की दुकानों में और ऑनलाइन स्टोर्स पर हर कहीं है। इन्हें पकाना आसान लगता है। पैकेज्ड, प्रॉसेस्ड फूड, रेडी-टू-कुक फूड, तैयारी और पकाने में सरल, सहज बनाने के लिए उपयुक्त लग सकता है। यह समय की बचत भी करा सकता है, किन्तु यह हमारे लिए कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ाने में भी मददगार है।

अधिकतर ऐसे फटाफट कुकिंग वाले खाद्य पदार्थों के पैकेट्स में एक केमिकल बिस्फेनॉल ए (बीपीए) होता है। जो उस भोजन के पकने पर घुल जाता है। यह कंपाउंड न सिर्फ व्यक्ति के लिए हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकता है बल्कि यह व्यक्ति के डीएनए में बदलाव और कैंसर का कारण बन सकता है।

इसके अतिरिक्त शरीर में विटामिन डी की कमी के कारण भी कैंसर की संभावना बहुत बढ़ जाती है। प्रकृति ने हमें विटामिन डी का निःशुल्क स्रोत दिया हुआ है। किन्तु उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में हमने उसे भी अपने से दूर कर दिया है। सूर्य की किरणें विटामिन D का सर्वोत्तम स्रोत हैं। किंतु महानगरों में वातावरण में प्रदूषण कणों की अधिकता के कारण और हमारी अव्यवस्थित दिनचर्या के कारण बड़ी संख्या में लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं।

कैंसर संस्थानों में हुए शोध अपने परिणाम में स्पष्ट करते हैं कि शरीर में विटामिन डी की कमी के कारण ब्लड कैंसर होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
जब व्यक्ति की कोशिका के डीएनए में कोई त्रुटि (म्यूटेशन) आ जाती है, तब वे अनियंत्रित हो कर विकसित होने लगती हैं। तब कैंसर की शुरुआत होती है। फिर ये कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित होती हैं और बढ़ती रहती हैं। ये कोशिकाएं मिल कर कैंसर बनाती हैं और फैलती जाती हैं।

ऊपर हमने कई सारे कैंसर कारकों की बात की। इनसे बचने के लिए अपने जीवन में संयम और संतुलन बनाकर, हानिकारक चीज़ों से दूरी बनाकर भी इस बीमारी के रिस्क को कम कर सकते हैं। बाजार के प्रोसेस्ड फूड से जितना हो सके दूर रहें। पेस्टिसाइड युक्त अनाज और सब्जियों का सेवन न करें। इसके अलावा तनाव से दूर रहें। अपने रुचि के कार्य करें। योगासन, प्राणयाम और ध्यान करें। खेल-कूद में भाग लें और मस्तिष्क को शांत करने वाली अन्य गतिविधियां करें।

विश्व कैंसर दिवस मनाने का उद्देश्य इस रोग के खतरों में कमी और इसके प्रति जागरुकता लाना है। वर्ष 2023 में विश्व कैंसर दिवस की थीम "क्लोज द केयर गैप" है। यह इस थीम के दूसरे चरण का वर्ष है, जहां, उपचार की असमानताओं को समझने और दूर करने के प्रयास पर जोर दिया गया है। फिर भी जब तक हम कैंसर के मूल कारकों को चिह्नित नहीं करते तब तक स्थाई समाधान नहीं सिर्फ समस्या का प्रबंधन करने में ही लगे रहेंगे।

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