Women Reservation: महिला आरक्षण में अतीत के रोड़े और भविष्य की अड़चन
Women Reservation: नये सदन में पहले ही दिन मोदी सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को "नारीशक्ति वंदन विधेयक" नाम से पेश कर सियासी गलियारे में हलचल बढ़ा दी है। बयानबाजी का मौसम पूरे परवान पर है और अब संसद में प्रस्तावित सात घंटे की बहस यह प्रमाणित करेगी कि आखिरकार सही मायने में कौन इसके पूर्ण समर्थन में हैं, कौन सशर्त समर्थन में हैं और कौन विरोध में हैं।
मोदीजी ने यह विधेयक लाकर इंडी एलायंस की एकता की भी परीक्षा ली है। यह स्वतन्त्र रूप से कांग्रेस की भी परीक्षा की घड़ी है कि वह घटक दलों की सहमति कैसे बनाती है और जनगणना और परिसीमन के बाद इसके लागू किये जाने का स्वागत करती है या विधेयक से अपनी सहमति का पल्ला झाड़ लेती है। राज्यसभा में खड़गे के बयान के भी अपने मायने हैं जिसमें उन्होंने ओबीसी वर्ग के आरक्षण की बात कही। विधेयक से कन्नी काटने की नज़र से भी इसे देखा जा सकता है।

महिलाओं ने दोनों सदनो में अपने उचित प्रतिनिधित्व के लिए बहुत प्रतीक्षा की है। लेकिन इस विधेयक के पास होने के बाद भी यह आरक्षण उच्च सदन और विधान परिषदों में लागू नहीं होगा तो एक अधूरेपन का एहसास तो हो ही रहा है। परंतु यहाँ तक पहुँचने के लिए भी इस विधेयक ने बहुत प्रतीक्षा की है। बस अबकी प्रतीक्षा को परिणति में बदलने की प्रबल संभावना दिख रही है।
इतिहास पर नज़र डाले तो सबसे पहले इस विधेयक को सितंबर 1996 में 13 पार्टियों के गठबन्धन वाली एच डी देवगौडा की यूनाइटेड फ्रंट सरकार लेकर आई थी। इनके आपसी मतभेद ने ही विधेयक को आगे बढ़ने से रोक दिया। विरोध को समाप्त करने के उद्देश्य से इसे सीपीआई की गीता मुखर्जी के नेतृत्व वाली संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। इस समिति ने 7 बदलाव की मांग रखी जो मंजूर नहीं की गई और विधेयक अधर में लटक गया। इसी समय नीतीश कुमार ने इसमें ओबीसी आरक्षण की मांग रखी थी और इसी आधार पर विधेयक का विरोध किया था। 16 मई 1997 को इसी सरकार ने दोबारा प्रयास किया पर इस बार सरकार के भीतर से ही विरोध की आवाज़ उठी और विधेयक एक बार फिर औंधे मुँह गिर गया।
1998 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने भी इस विधेयक को पास कराने का भरपूर प्रयास किया था पर हर बार असफल रहे। 13 जुलाई 1998 को लोकसभा में इस विधेयक की तो बात करते ही कोहराम मच गया था। राजद सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने स्पीकर के हाथ से लेकर इस बिल को फाड़ दिया था। हास्यास्पद यह रहा कि कारण पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि ऐसा करने के लिए उन्हें सपने में बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा था। इसलिए उस समय यह विधेयक पेश भी नहीं किया जा सका था।
11 दिसंबर 1998 को इस विधेयक पर संसद में फिर हंगामा मचा। उस समय ममता बनर्जी ने विरोध जता रहे सपा के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कॉलर पकड़ लिया था। अटल जी की सरकार ने एक बार पुनः इसे 23 दिसंबर 1998 को पेश किया। सपा, बसपा, मुस्लिम लीग, राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के विरोध के बाद भी इसे लाया गया पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। दिसंबर 1999 को सरकार के पुनर्गठन के बाद फिर प्रयास किया गया पर असफलता ही हाथ लगी। 2000, 2002 और 2003 में लेफ्ट और कांग्रेस के समर्थन के बावजूद इस विधेयक को एनडीए पास नहीं करा पाई।
2008 में यूपीए की सरकार ने पुनः प्रयास प्रारंभ किया और आखिरकार 2010 में इसे राज्यसभा में पारित करा लिया पर लोकसभा में यह बिल पेश भी नहीं किया जा सका था। एनडीए के 2014 और 2019 के घोषणा पत्रों में ऐसे विधेयक की बात की जाती रही है। आखिरकार इसे 19 सितंबर 2023 को नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से पेश किया गया है। नया विधेयक कुछ मामलों में पहले पेश किए गए विधेयकों से अलग है। इस संविधान (128वां संशोधन) विधेयक, 2023 में तीन नए अनुच्छेद और एक नया खंड शामिल किया गया है।
लोकसभा में प्रस्तुत विधेयक के अनुसार लोकसभा की अनारक्षित सीटों पर एक तिहाई आरक्षण महिलाओं के लिए रहेगा और एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों में 33% सीट महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। नये अनुच्छेद 239aa के तहत यह 33% महिला आरक्षण दिल्ली विधानसभा पर भी एससी एसटी के लिए आरक्षित और शेष अनारक्षित सीटों पर भी लगेगा। प्रस्तावित नये अनुच्छेद 332a के अनुसार प्रत्येक राज्य विधानसभा में एससी और एसटी के लिए आरक्षित सीटों में से ⅓ संबंधित श्रेणी की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। सीधे चुनाव द्वारा भरी जाने वाली कुल सीटों में से 1/3 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
नये अनुच्छेद 334a के तहत आज के बाद जो अगली जनगणना होगी उसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित होने के बाद परिसीमन होगा। उस नये परिसीमन के बाद ही यह महिला आरक्षण रोटेशनल तरीके से लागू होगा। इसके अलावा यह आरक्षण सिर्फ 15 साल के लिए लागू किया जाना प्रस्तावित है। उसके बाद संसद के अवलोकन के पश्चात इसे पुनः लागू किया जा सकेगा।
इस विधेयक के बहाने महिलाओं पर खूब चुटकी ली गई है, फब्तियाँ कसी गई हैं और आलोचनाएँ भी हुई हैं, परंतु एक सवाल यह भी बनता है कि क्या भारतीय समाज महिला नेतृत्व के लिए तैयार है? क्या धरातल पर हमारे पास 33% महिलाएं ऐसी हैं जो "नेचुरल लीडरशिप" रखती हैं? यह सच है कि पंचायत और म्युनिसिपैलिटी में लगभग 15 लाख महिला प्रतिनिधि के साथ लगभग 40% हिस्सेदारी महिला प्रतिनिधित्व को जाती है। परंतु वस्तुस्थिति से हम मुँह नहीं मोड़ सकते हैं। हम आज भी इन जगहों पर निर्णायक की भूमिका में पुरुषों को ही देखते हैं। महिला सरपंच या प्रधान की जगह उसके पुरुष रिश्तेदार सारे काम काज निपटाते हैं।
ऐसे में जब तक महिलाओं के हाथ में निर्णय लेने की क्षमता ना दी जाए तब तक महिला नेतृत्व का भ्रम एक क्षद्म है। हालांकि विधानसभा और लोकसभा स्तर पर "सरपंचपति" जैसी किसी भूमिका की संभावना और अवसर कम दिखते हैं फिर भी सवाल तो बनता है कि जिन पार्टियों ने अपनी कार्यकारिणी में महिलाओं को यथोचित स्थान ना दिया हो वो इतनी बड़ी संख्या में महिला नेतृत्व कहाँ से लाएंगे? बहरहाल, 2024 के चुनाव में तो यह किसी हाल में लागू नहीं होने वाला है। फिर मोदी सरकार को 2024 के चुनाव में इस विधेयक का कितना फायदा मिल पाएगा यह भी आने वाला वक़्त ही बताएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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