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Women in Politics: राजनीतिक दलों में कैसे दूर होगा महिला नेतृत्व का संकट?

Women in Politics: भारत की संसद के दोनों ही सदनों से महिला आरक्षण के लिए "नारी शक्ति वंदन" अधिनियम सर्वसम्मति से पारित हो गया है। उम्मीद करनी चाहिए कि आनेवाले कुछ कुछ वर्षों में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। यह बहुत ही हर्ष की बात है कि दोनों ही सदनों में किसी भी दल ने इसका कोई बहुत अधिक विरोध न करते हुए अपनी सहमति दी। लगभग हर दल ने कहा कि वह महिलाओं को समान अधिकार देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ है।

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष एवं रायबरेली से सांसद श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा कि यह विधेयक उनके पति पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी लेकर आए थे और यह कांग्रेस पार्टी का सपना था कि महिलाओं को संसद में आरक्षण मिले। कोई भी दल ऐसा नहीं रहा जिसने यह कहा हो वह महिलाओं के संसद में पहुँचने का विरोधी है। हालांकि संसद से बाहर अवश्य कुछ ऐसे संगठन हैं, जो महिलाओं के इस प्रकार संसद पहुँचने के विरोधी हैं, जिनमें पुरुषों के अधिकारों के लिए कार्य करने वाले संगठन मुख्य हैं। वह यह कह रहे हैं कि जैसे पुरुष संघर्ष करके आगे बढ़कर राजनीति में स्थान बनाते हैं, वैसे ही महिलाओं को बनाना चाहिए। आरक्षण देकर कैसी समानता? परन्तु इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि महिला आरक्षण अब एक सत्यता है।

Women in Politics: How will the crisis of women leadership in political parties be resolved?

अब जब राजनीतिक दलों द्वारा महिला आरक्षण पर समर्थन की बात आ रही है तो एक बहुत ही रोचक तस्वीर सामने आ रही है कि यद्यपि किसी भी दल ने इस विधेयक का विरोध नहीं किया और यह सर्वसम्मति से पारित हुआ, फिर भी एक प्रश्न यह उठता है कि जिन दलों ने संसद में महिला आरक्षण का समर्थन किया है, उन्होंने अपने-अपने दलों में महिला प्रतिनिधित्व के लिए कितने कदम आगे बढ़ाए हैं?

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में कुल 724 महिला उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाई थी। कांग्रेस की ओर से 54 तो बीजेपी ने 53, बसपा ने 24, तृणमूल कांग्रेस ने 23, सीपीआईएम ने 10 महिलाओं को मैदान में उतारा था। 543 सीटों वाली लोकसभा में 78 महिलाओं ने चुनाव जीता था जो कि कुल सदस्यता का 14 प्रतिशत बैठता है। इसमें भाजपा से सर्वाधिक 40 महिला सांसद चुनकर आई थीं। तृणमूल कांग्रेस से 9 तो बीजू जनता दल से 6 महिला सांसद चुनकर लोकसभा पहुंची। 2019 का आमचुनाव महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से ऐतिहासिक कहा जा सकता है क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ है कि देश में इतनी बड़ी संख्या में महिला सांसद चुनकर संसद पहुंची। इसमें पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश ने अगुवाई की क्योंकि दोनों ही राज्यों से 11-11 महिला सांसद लोकसभा में दाखिल हुई थी।

इस अच्छी तस्वीर का यह क्रम अगर जारी रहता है और राजनीतिक दल महिलाओं को आनुपातिक भागीदारी देते रहते हैं तो संभव है 2029 तक संभावित आरक्षण के पहले ही 2024 में महिला उम्मीदवारी और जीत का प्रतिशत और बेहतर हो जाए। परंतु यहां एक प्रश्न महत्वपूर्ण है। क्या कोई दल महिला नेतृत्व को तैयार करने के लिए काम करता है?

राजीव गांधी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी होने के नाते सोनिया गांधी के हाथ में कांग्रेस की कमान जरूर आयी लेकिन जब उनको अपना उत्तराधिकारी तय करना हुआ तो उन्होंने बेटी की बजाय बेटे का ही चयन किया। सोनिया गांधी के परिवार में प्रियंका गांधी की भूमिका ट्रबल शूटर की है। उनकी इस क्षमता के बावजूद उन्हें नेतृत्व देने की बजाय सोनिया गांधी ने बेटे राहुल का ही चयन किया। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या राजनीतिक विरासत का हस्तांतरण एक महिला द्वारा दूसरी महिला को नहीं किया जा सकता?

भारतीय जनता पार्टी से इस लोकसभा में सबसे अधिक महिला सांसद चुनकर आई और द्रौपदी मुर्मू के रूप में महिला राष्ट्रपति का निर्वाचन भी पार्टी नेताओं का सराहनीय कदम है। फिर भी सुषमा स्वराज जैसी नेताओं का अभाव अभी भी खटकता है, जिनका पार्टी की विचारधारा के आधार पर एक नेतृत्वकर्ता के रूप में विकास हुआ था। पार्टी में वसुंधरा राजे एकमात्र व्यापक जनाधार वाली पूर्व मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उन्हें भी किनारे करने में भाजपा के नेता लगे हुए हैं। नरेंद्र मोदी के बाद मुख्यमंत्री बनी आनंदीबेन पटेल को भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया गया।

वहीं महिलाओं को लेकर आजादी की बात करने वाले वामदलों में तो नेतृत्व के नाम पर महिला नेतृत्व शून्य ही है। मात्र एक नेता वृंदा करात ही प्रभावी महिला नेता के रूप में दिखाई देती हैं, परन्तु वह भी नेतृत्व नहीं कर रही हैं। समाजवादी पार्टी की बात की जाए या फिर सामाजिक न्याय की सबसे अधिक बात करने वाली पार्टी राष्ट्रीय जनता दल की तो इन दोनों ही दलों में ऐसे महिला चेहरे नहीं दिखते हैं, जो परिवार से इतर हों और जो विचारों के आधार पर उस दल में नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रही हों। जेडीयू में भी महिला नेतृत्व नहीं दिखाई देता है!

शरद पवार अपने उत्तराधिकारी के तौर पर जरूर सुप्रिया सुले का नाम आगे करते हैं लेकिन यहां भी उनकी नहीं चल पाती और उनका भतीजा पार्टी की कमान अपने हाथ में ले लेता है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी ने जरूर पिछले लोकसभा चुनाव में प्रमुखता से महिलाओं को टिकट दिया था लेकिन नेतृत्व की बात आयी तो भाई के बेटे अभिषेक का चेहरा आगे कर दिया।

फिर चाहे दक्षिण में द्रमुक हो जिसमें करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी को सांसद तो बनाया गया, परन्तु पार्टी का नेतृत्व पुत्री कनिमोझी के हाथ में नहीं बल्कि पुत्र स्टालिन के हाथ में ही गया। यहाँ तक कि अन्नाद्रमुक, जिसकी ओर से जयललिता मुख्यमंत्री रह चुकी थीं उस दल से भी कोई प्रभावी महिला नेतृत्व नहीं दिखाई देता है।

यह कुछ प्रमुख दलों की बात है, जिनमें महिला नेता दिखाई देती हैं। परन्तु यदि महिला नेतृत्व की बात की जाए तो एक रिक्तता परिलक्षित होती है और यह भी प्रश्न उठ कर आता है महिला आरक्षण की बात करने वाले दल अपने स्वयं के दलों में परिवार से इतर एवं ग्लैमर से इतर कितनी उन महिलाओं को राजनीति में लाएंगे जो वास्तव में कुछ करना चाहती हैं। जिनमें वास्तव में नेतृत्व क्षमता है?

भारत में अगर सबसे कद्दावर महिला नेताओं की बात की जाए तो इंदिरा गांधी का नाम सबसे ऊपर आयेगा। वो एक महिला थीं लेकिन उनकी नेतृत्व क्षमता ने देश को कई उपलब्धियों से दो चार करवाया। उन्हें भी जवाहरलाल नेहरू की एकमात्र संतान होने का लाभ मिला। उनके बाद सोनिया गांधी को राजीव गांधी की पत्नी होने का लाभ मिला और पार्टी ने नेतृत्व सौंपा। लेकिन उसके बाद महिला नेतृत्व का अभाव ही दिखता है।

प्रदेश स्तर पर जयललिता, मायावती, ममता बनर्जी, वसुंधरा राजे आदि ने अपनी नेतृत्व क्षमता की छाप जरूर छोड़ी लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी का विकल्प कोई बन नहीं पायी। महिला आरक्षण पर अपना समर्थन देने वाले नेताओं को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि उनकी पार्टी में दमदार महिला नेताओं को आगे बढ़ने का पूरा मौका मिला। महिला कार्यकर्ताओं को भी यह देखना होगा कि क्या पार्टियों में महिला नेतृत्व उभारने के लिए नये परिसीमन तक प्रतीक्षा ही करनी होगी?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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