Cross Border Love: क्या मोहब्बत से पिघल जाएगी भारत पाकिस्तान के बीच जमा कटुता की बर्फ?
Cross Border Love: आंध्र प्रदेश के नांदयाल में पांच बच्चों की मां 35 साल की दौलत बी तेलंगाना हाईकोर्ट की शरण में है। उन्होंने जेल से छूटे 51 वर्षीय गुलजार मसीह को भारत में रहने देने की अपील की है। पाकिस्तानी नागरिक गुलज़ार उनके पति है। 2011 में ऐन-केन प्रकारेण भारत पहुंच उन्होंने दौलत बी से ब्याह रचाकर घर बसा लिया था। वह पेंटर के काम से घर की रोजीरोटी चलाते हैं। लेकिन पकड़े जाने के बाद पिछले हफ़्ते चेरिलपल्ली सेंट्रल जेल से रिहा किये गये। अब वापस पाकिस्तान भेजे जाने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
गुलज़ार मसीह अकेले नहीं है। इन दिनों 35 वर्षीय अंजू भी चर्चा में है। वह पढ़ी लिखी हैं। डाटा ऑपरेटर की नौकरी करती हैं। वैध दस्तावेजों के साथ 29 वर्षीय फेसबुक दोस्त नसरुल्लाह से मिलने पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा पहुंच गई। उत्साह से वाघा बार्डर पार करते हुए वीडियो बना जैसे ही सोशल मीडिया पर डाला और उनके निकाह कर फातिमा होने की खबर आई, तो हंगामा बरपा है। आगे देखना होगा है कि वीजा अवधि खत्म होने से पहले वह भारत लौटती है या फिर मामले में कोई नया ट्विस्ट आता है। 15 वर्ष की बेटी और 9 साल के बेटे की मां अंजू के पास 20 अगस्त तक पाकिस्तान में रुकने, ठहरने, घूमने और शादी के अधिकार का वैध वीजा है।

इनके अलावा कई और गुमनाम जोड़े हैं जो अंतरराष्ट्रीय सीमा के नाम पर बन आई दुश्मनी के चलते छिपकर जानलेवा इश्क को जिंदा रक्खे हुए हैं। सहमे हैं कि पकड़े जाने पर कानून के अपराधी बन जायेंगे। जीना दुश्वार हो जायेगा। इससे बेपरवाह इश्क में बावली सीमा हैदर की भी कहानी है। प्यार में पड़कर नेपाल के रास्ते गुपचुप तरीके से भारत पहुंची, और चार बच्चों के साथ पबजी गेम के फ्रेंड को पति बना यहां बस गई। डेढ़ महीने बाद जब दांपत्य रिश्ते को कानूनी जामा पहनाने का मन किया तो ग्रेटर नोएडा फैमिली कोर्ट की शरण में जाने की पहल की। मामले से घबराकर वकील साब ने धोखा दे दिया, गुपचुप पुलिस को जानकारी देना जरूरी समझा और भेद खुल गया।
मीडिया ट्रायल की वजह से नोएडा की सुपर हिट सीमा सचिन की कहानी से अब शायद ही कोई भारतीय या पाकिस्तानी अनजान हो। सिंध की गरीब महिला सीमा हैदर सोशल मीडिया की सेलिब्रिटी बन चुकी है। दोनों देशों के समाचार चैनलों पर राज कर रही है। टीआरपी के चटकारे लेने वाले टीवी चैनलों के लिए सबसे मजेदार मसाला बनी हुई है।
30 साल की सीमा हैदर 22 वर्ष के सचिन से प्यार की खातिर पाकिस्तान वापसी की प्रक्रिया रोकने की गुहार लगा रही है। जार जार रोती सीमा का कहना है कि जब तक वह भारत में है तब तक ही जिंदा है, पाकिस्तान पहुंचते ही मार दी जाएगी। सीमा के रूदन में दम लग रहा है कि उसकी खबर सार्वजानिक बहस में आने के बाद से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर शामत आई है। गैर मुल्क में गैर मजहबी शख्स से शादी करने को कठमुल्ला पचा नहीं पा रहे। सिंध के कुख्यात डकैतों ने वीडियो जारी कर सरेआम अल्टीमेटम दे रखा है। मजहबी कट्टरपंथियों से अल्पसंख्यकों की बहन बेटियों की सुरक्षा पर बन आई है। फिर से पुराने मंदिरों को निशाना बनाया जा रहा है।
धर्मांधता की बलिवेदी पर इश्क लगातार कुर्बान होता रहा है। इसके खिलाफ जघन्य और क्रूर अपराधों से सभ्यताएं कांपती रही हैं। मगर सीमा सचिन की कहानी को जिस स्तर की लोकप्रियता मिल रही है, उससे इसके दुष्परिणाम के कम होने की उम्मीद बंधनी लगी है। सवाल है कि क्या हम इश्क के फेर में बंटवारे के दंश के अमिट दर्द को भूलने लगे हैं? जान माल की भारी कीमत देकर 76 साल पहले दो देशों के बीच खड़ी हुई नफरत की दीवार क्या अब दरकने लगी है? क्या हमारी मान्यताएं, एक दूसरे को लेकर बनी अवधारणा और विश्वास बदलने का समय करीब आ रहा है? क्या विभाजन की कृत्रिम रेखाएं बर्लिन की दीवार की तरह ध्वस्त होने के लिए ही बनती हैं?
भारत और पाकिस्तान जब तक अपनी जगह अड़े हैं, इन सवालों के जवाब मिलना मुश्किल है। उसकी ठोस वजह है, लेकिन स्व. कुलदीप नैयर और मरहूम असमा जहांगीर जैसी आत्माएं दर्द से बेजार होकर एक होने का सबक देती रहेंगी। जब इश्क में डूबे सीमा और अंजू के साथ बुरा न होने देने की कामना दोनों देशों में एक समान रूप से की जा रही है, तब तक यह उम्मीद भी कायम रहेगी कि वक्त के ताप से घृणा और रंजोगम की बर्फ पिघलने लगी है।
आगामी 14-15 अगस्त को बंटवारे के 76 वर्ष होने को हैं। मतलब 77 की आयु वाले पाकिस्तान वासियों का जन्म जिस ब्रिटिश भारत में हुआ था वह उस समय एक ही देश था। वैज्ञानिक तौर पर हम समान गुणसूत्र वाले हैं। आरएनए डीएनए एक है। एक रंग और रूप है। जुबान एक है। भारत में विकसित उर्दू पाकिस्तान में राजकाज की भाषा है। हिंदी और उर्दू का व्याकरण एक है। लहजा एक है। यहीं वजह है कि सिंध से आने वाली सीमा के मुंह से फूट रहे हरेक बोल पराए नहीं लगते। विदेश खासकर यूएई और पश्चिमी देशों की धरती पर टैक्सी या ढाबा चलाने वाला कोई शख्स जब तक खुद न बताए वह किस मुल्क का है, आप बता नहीं सकते कि वह भारतीय है या पाकिस्तानी। इस पर शर्त लगाकर आप हार सकते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे की कोई प्राकृतिक नहीं बल्कि कृत्रिम रेखा है। चीन की तरह हमारे बीच कोई हिमालय नहीं खड़ा। एक सियासी फितूर ने ब्रिटिश भारत को दो हिस्सों में बांटने को मजबूर कर दिया। तेज होती आजादी की मांग और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन को सात समंदर पार भारत पर राज चलाने में मुश्किल होने लगी। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत पर अन्य सियासी नेताओं को राजी किया। सहमति ली और आननफानन में एक वकील सिरिल रेडक्लिफ़ को बंटवारे की लकीर खींचने की जिम्मेदारी सौंप दी।
रेडक्लिफ भारत कभी नहीं आए थे। यहां के रहन सहन और आबोहवा से परिचित नहीं थे। उन्होने कम से कम समय में काम पूरा करने के लिए मौसम की बेइंतहा गर्मी से बीमार होने का बहाना बनाया और महज पांच हफ्ते में कोरे कागज पर 48 करोड़ आबादी को बांटने के लिए एक लंबी राजनीतिक रेखा खींच दी। जघन्य रक्तपात, हिंसा और घृणा के तौर पर इसका भीषण दुष्परिणाम हुआ। उसे याद कर आज भी रूह कांप जाती हैं। फिर भी कहते हैं प्रेम इंसान की स्वाभाविक प्रकृति है और रोष बनावटी चेहरा। तो क्या अब समय आ रहा है कि हम प्रेम के प्रभाव में आकर बनावटी रेखा को मिटाने में लग जाएं?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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