नेताजी सुभाष चंद्र बोस से ब्रिटेन को डर क्यों लगता था?
दिल्ली के दिल इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित हो चुकी है। 8 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस प्रतिमा का अनावरण किया था जिसे आंध्र प्रदेश के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने तैयार किया है। इंडिया गेट पर जिस छतरी के नीचे नेताजी की प्रतिमा स्थापित की गयी है उसमें कभी जार्ज पंचम की प्रतिमा होती थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद जार्ज पंचम की प्रतिमा तो हटा दी गयी लेकिन तब से ये छतरी खाली थी। अब वहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा खड़ी है जिसे देखने के लिए देशभर से लोग आ रहे हैं। यह जानना जरुरी है कि इतने महत्त्व पूर्ण स्थल पर नेताजी की प्रतिमा लगाने का क्या कारण है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और ब्रिटिश हुकूमत
भारत जिस दिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वतंत्र हुआ, उस दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली थे। उन्होंने "एज इट हैपेन्ड" नाम से अपनी एक आत्मकथा लिखी, जिसमें वे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का उल्लेख करते हुए लिखते है, "हालाँकि, भारतीय नेताओं को जापानी साम्राज्यवाद से कोई सहानुभूति नहीं है, फिर भी कुछ लोग भारत के गले से शाही दासता को बाहर फेंकने के लिए जापान में सम्भावना तलाश रहे है। वो बंगाल का सुभाष जापानियों द्वारा बंधक बनाये कुछ कैदियों की सहायता से इंडियन नेशनल आर्मी बनाने में व्यस्त है। इस सदी की शुरुआत में जापान द्वारा रशिया को हराने के चलते एशिया में राष्ट्रवाद तीव्र हो गया है। इसलिए मुझे एकदम स्पष्ट था कि जैसे ही युद्ध (द्वितीय विश्वयुद्ध) समाप्त होगा तो एशिया पर यूरोपीय प्रभुत्व घटने लगेगा और ब्रिटेन को एशिया से समानता की मजबूत मांग का सामना करना होगा।"
एटली के इस कथन से तीन बातें एकदम स्पष्ट है, पहली, ब्रिटेन को यह कहने में कोई दिक्कत नहीं होती थी कि उन्होंने भारत के गले में शाही दासता अथवा गुलामी का पट्टा बांधा हुआ है। दूसरी, यूरोप के लोग एशिया को अपने से नीचा मानते थे इसलिए वे समानता जैसी बातों का जिक्र कर रहे थे। तीसरी, नेताजी का डर ब्रिटेन को सताने लगा था क्योंकि अगर वे अपनी योजना में सफल हो जाते तो न सिर्फ भारत बल्कि पूरे एशिया से यूरोपीय प्रभुत्व समाप्त हो सकता था और उसका असर अगली कई शताब्दियों तक बना रहता।
ब्रिटिश संसद सदस्य रामसे मैकडोनाल्ड 1930 से 1932 के दौरान भारत की यात्रा पर थे। बाद में वे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भी बने। उन्होंने भारत यात्रा के संस्मरणों को अपनी एक पुस्तक के रूप में "द अवेकनिंग इंडिया" में लिखा है। इस पुस्तक के माध्यम से वे एटली की भांति ही भारत में पनप रहे ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवाद पर चिंता जाहिर करते हुए लिखते है कि "सदी की शुरुआत में पूर्वोत्तर के देशों के जीवन में एक नयी उमंग भर चुकी है और वे अब पहले से ज्यादा सचेत हो गए है। इस बदलाव का असर भारतीय राष्ट्रीय जीवन के पुनर्जागरण पर भी दिखने लगा है। इसमें युवाओं को अधिक उम्मीदें नजर आती है।"
भारतीय सचेतना और पुनर्जागरण के इस कालखंड की शुरुआत स्वामी विवेकानंद, बंकिम चंद्र चटर्जी और अरविन्द घोष ने की जिसमें बाद में श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक और डॉ. हेडगेवार जैसे नाम जुड़ गए। इसी क्रम में आगे चलकर सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा का नेतृत्व संभाला।
ब्रिटेन के दो प्रधानमंत्रियों - मैकडोनाल्ड और एटली को ब्रिटेन के खिलाफ पैदा हो रहे भारतीय राष्ट्रवाद का खतरा महसूस हो चुका था। ऐसा ही डर 1940 के आसपास ब्रिटिश संसद सहित साम्राज्यवाद के प्रमुख नेताओं को लगने लगा था। इसका एक उदाहरण ब्रिटिश संसद की एक चर्चा में भी मिलता है।
नेताजी की यूरोप यात्रा और ब्रिटिश संसद की परेशानी
बात 1 दिसंबर 1936 की है जब हाउस ऑफ लॉर्ड्स में नेताजी की गिरफ्तारी को लेकर कुछ सवाल-जवाब किये गए। वैसे तो वहां जो कुछ भी हुआ वह सब नेताजी की ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों से ही सम्बंधित था और भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, लॉरेंस डुंडास ने नेताजी से जुड़े कई ब्रिटिश विरोधी किस्से सदन के सामने रखे। मगर उन्होंने इसी बहस के दौरान नेताजी की गतिविधियों को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए 'विनाशक' की संज्ञा देकर संबोधित किया। अपने भाषण में इस 'विनाशक' शब्द का उल्लेख उन्होंने एक बार नहीं बल्कि नेताजी के सन्दर्भ देते हुए तीन बार किया।
हालाँकि, वर्ष 1937 में नेताजी को यूरोप जाने की मंजूरी दी गयी लेकिन फिर भी ब्रिटिश संसद में उनसे सतर्क रहने का दबाव बनाया गया। 22 नवम्बर 1937 को हाउस ऑफ कॉमन्स में अर्नेस्ट थर्टल ने कहा कि क्या भारत सरकार श्रीमान सुभाष चंद्र बोस की आगामी यूरोप यात्रा में कोई बाधा नहीं उत्पन्न करेगी? उन्होंने आगे कहा, "जब पिछली बार वे (बोस) यूरोप की यात्रा पर थे तो इस देश (ब्रिटेन) की सरकार ने उनके इस देश में होने पर कठिनाई व्यक्त की थी। क्या अब इस बात का आश्वासन दिया जायेगा कि इस बार कोई ऐसी कोई कठिनाई नहीं होगी?"
इसमें कोई दो राय नहीं है कि नेताजी के यूरोप में होने से सरकार को परेशानी तो उठानी ही थी इसलिए बाद में 1940 में नेताजी को उनकी ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों के चलते नजरबंद कर दिया गया। उन पर चौबीसों घंटे सरकार की नजर बनी रहती थी। इसके बावजूद भी जनवरी 1941 में वे वहां से अचानक फरार हो गए।
अतः एक बार फिर ब्रिटिश संसद में नेताजी को लेकर हलचलें शुरू हो गयी। 27 नवम्बर 1941 को अल्फ्रेड नॉक्स ने भारत के तत्कालीन स्टेट सेक्रेटरी, लियो एमेरी से प्रश्न किया कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि कांग्रेस पार्टी के पूर्व नेता सुभाष चंद्र बोस आजकल कहा है?" इस पर एमेरी ने जवाब दिया, "इसमें कोई शक नहीं है कि सुभाष बोस दुश्मनों (जर्मनी) से जाकर मिल गए है। यह बताया गया है कि या तो वे रोम में है या बर्लिन में। मगर मेरे पास कोई निश्चित जानकारी नहीं है।"
यह दौर ऐसा था जब ब्रिटिश सरकार, उनकी संसद और स्टेट सेक्रेटरी तक सुभाष बोस को लेकर एकदम असहाय हो गए थे। वे सभी मिलकर प्रयासरत रहते थे कि कैसे भी नेताजी को सार्वजनिक रूप से भारतीय जनता के सामने नहीं आने देना है।
नेताजी की नेतृत्व क्षमता से डरती थी ब्रिटिश सरकार
नेताजी जब जर्मनी में थे तो एक एलेक्जेंडर वेर्थ नाम के व्यक्ति से मिले जिन्होंने उन पर वर्ष 1973 में "ए बिकॉन एक्रॉस एशिया: ए बॉयोग्राफी ऑफ सुभाष चंद्र बोस" नाम से एक पुस्तक लिखी। उसमें उन्होंने लिखा, "बोस की यह अवधारणा थी कि भारतीय नागरिक एक वास्तविक राजनैतिक संघर्ष का हिस्सा तब तक नहीं बनेंगे जब तक उन्हें अच्छे से जागृत और संगठित न किया जाए। जबकि इन्ही संगठित लोगों से ब्रिटिश सरकार को सबसे ज्यादा ज्यादा खतरा लगता था।" यह नेताजी का खौफ ब्रिटिश सरकार को उनके जीवित रहने तक हमेशा बना रहा क्योंकि उनमें भारतीय नागरिकों को करिश्माई रूप से संगठित करने की काबिलियत थी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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