Uttar Pradesh: सोनिया और अखिलेश क्यों चाहते हैं मायावती का साथ

चुनावी सर्वेक्षणों में नरेंद्र मोदी के 2024 में तीसरी बार प्रधान मंत्री बनने के रुझान निकल रहे हैं। इसके बावजूद इंडिया गठबंधन की बड़ी चुनौती के चलते भाजपा के भीतर सत्ता को बनाए रखने का जबर्दस्त मंथन चल रहा है।

नरेंद्र मोदी के मन में भी डर पैदा हुआ है, इसलिए उन्होंने नौ साल में पहली बार एनडीए की सुध ली है। 2019 की तरह बहुत शोर मच रहा है कि 2024 में भाजपा की ज्यादा नहीं तो सौ सीटें घटेंगी। स्थिति एक दम 2018 वाली है, तब कांग्रेस मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा से जीती थी।

 Sonia Gandhi and Akhilesh Yadav

इस बार कांग्रेस हिमाचल और कर्नाटक भाजपा से जीत चुकी है, और उन तीनों राज्यों के चुनाव होने बाकी हैं। चुनावी सर्वे इन तीनों राज्यों में से किसी भी राज्य में भाजपा का पलड़ा भारी नहीं बता रहे। राजस्थान और मध्यप्रदेश में कड़ा मुकाबला बता रहे है और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का पलड़ा भारी है। मान लो इन तीनों राज्यों में भी कांग्रेस जीत जाती है, तो कांग्रेस के लिए स्थिति 2019 से कहीं बेहतर होगी।

Why Sonia Gandhi and Akhilesh Yadav want Mayawatis support

कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा हुआ है। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव का सारा दारोमदार क्षेत्रीय पार्टियों पर है। भाजपा की अगर सौ नहीं, 50-55 सीटें भी घटती हैं, तो उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहना होगा। भाजपा अगर 50 सीटें हारने के बावजूद 250 सीटें जीत लेती है, तो सरकार उसी की बनेगी, क्योंकि उसके सहयोगी-दल 30-35 सीटें तो जीतेंगे ही और एनडीए को बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस का समर्थन भी मिल जाएगा। मान लो कांग्रेस की सीटें बढ़कर दोगुनी हो जाती है, तो भी इंडिया गठबंधन की सरकार नहीं बनती। लेकिन कांग्रेस का उद्देश्य क्षेत्रीय दलों के कंधों पर सवार होकर अपनी ताकत बढ़ाना है, ताकि उसकी तीसरी बार इतनी शर्मनाक हार न हो कि लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा भी न मिले।

सिर्फ कांग्रेस नहीं, बल्कि 2024 का लोकसभा चुनाव गांधी परिवार के लिए जीवन मरण का सवाल बन गया है। सोनिया गांधी अपनी उम्र और बीमारी के कारण चुनावी राजनीति से बाहर होना चाहती है। लेकिन कांग्रेस के नेता उन्हें बाहर होने देना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें राहुल गांधी और प्रियंका पर वैसा भरोसा नहीं बन पा रहा, जैसा 1998 में सोनिया गांधी पर बना था। कांग्रेस के नेताओं का 1998 में सोनिया गांधी पर इतना भरोसा बन गया था कि सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया को अध्यक्ष बना दिया था।

इसलिए सोनिया गांधी पर दबाव है कि वह लोकसभा चुनाव जरुर लड़ें। लेकिन अगर वह चुनाव लड़ने को तैयार नहीं होती, तो मंथन यह चल रहा है कि फिर रायबरेली में कौन लड़े। क्या वहां प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ने भेजा जाएगा। अगर प्रियंका रायबरेली से लडती हैं, तो अमेठी से कौन लड़ेगा। स्मृति ईरानी से हारने के बाद राहुल गांधी दुबारा अमेठी से नहीं लड़ना चाहते। इसलिए प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने जब यह बयान दिया कि राहुल गांधी अमेठी से ही चुनाव लड़ेंगे, तो अगले ही दिन उन्हें अपना बयान वापस लेना पड़ा। बयान बदल कर उन्होंने कहा कि अमेठी के कार्यकर्ता चाहते हैं कि राहुल गांधी वहां से चुनाव लड़ें।

अजय राय के बयान वापस लेने से साफ़ हो जाता है कि उन्हें गांधी परिवार के किसी सदस्य के बारे में बोलने से रोका गया है। परिवार में मंथन यह चल रहा है कि राहुल गांधी वायनाड के साथ साथ अमेठी के बजाए रायबरेली से लड़ें। जबकि अमेठी में स्मृति ईरानी के मुकाबले प्रियंका गांधी को मैदान में उतारा जाए। प्रियंका अमेठी में स्मृति ईरानी को राहुल से बेहतर मुकाबला दे सकती है।

वैसे भी 2014 और 2019 में अमेठी की बागडोर प्रियंका वाड्रा ने ही संभाली हुई थी। गांधी परिवार के तीनों सदस्य बखूबी जानते हैं कि अगर उनमें से दो लोग उत्तर प्रदेश से चुनाव नहीं जीतते, तो उतर प्रदेश में कांग्रेस को कभी भी पुनर्जीवित नहीं किया जा सकेगा। प्रियंका गांधी के समर्थक आचार्य प्रमोद ने तो यहां तक कह दिया कि प्रियंका वाड्रा को मोदी के सामने वाराणसी से चुनाव लड़ाया जाए, तो देश में चुनाव मोदी बनाम प्रियंका हो जाएंगे। इंडिया गठबंधन को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। कांग्रेस के भीतर ही कुछ लोग राहुल की काट में प्रियंका वाड्रा को लाना चाहते हैं। आचार्य प्रमोद उनमें से एक हैं।

जबकि परिवार के तीनों सदस्य जमीनी हकीकत जानते हैं। उन्हें पता है कि समाजवादी पार्टी और बसपा के समर्थन के बिना वे रायबरेली और अमेठी भी नहीं जीत सकते। पिछली बार सपा और बसपा ने सोनिया और राहुल दोनों को समर्थन दिया था। इसके बावजूद राहुल गांधी चुनाव हार गए थे। सोनिया गांधी की जीत का मार्जिन भी आधा रह गया था। सोनिया 2004 में ढाई लाख से, 2009 में पौने चार लाख से, 2014 में साढ़े तीन लाख से चुनाव जीती थी। लेकिन 2019 में सिर्फ 1 लाख 67 हजार के अंतर से जीती थी।

रायबरेली में मार्जिन आधा रह जाना और अमेठी में चुनाव हारना गांधी परिवार के प्रति आकर्षण घटने के प्रमाण हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश से गांधी परिवार की साख बचाने के लिए गठबंधन करना कांग्रेस की मजबूरी बन गया है। समाजवादी पार्टी के साथ तो कांग्रेस का गठबंधन लगभग हो गया है। अब तक के संकेत तो यही हैं कि मायावती दोनों गठबंधनों से दूरी बनाए हुए है। लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने मायावती को भी गठबंधन में शामिल करने की कोशिश शुरू कर दी है।

2014 में भाजपा 80 में से 71 सीटें जीती, भाजपा की सहयोगी अपना दल ने भी दो सीटें जीत लीं थी। कांग्रेस से सिर्फ सोनिया और राहुल ही जीते थे, बाकी पांच सीटें समाजवादी पार्टी जीती थी। तब 19.5 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम नहीं जीत पाया था, लेकिन 2019 में जब सपा-बसपा का गठबंधन हो गया तो भाजपा 71 से 62 पर आ गई, सपा भले पांच ही सीटें जीत पाई, लेकिन बसपा दस लोकसभा सीटें जीत गई थी। कांग्रेस से सिर्फ सोनिया गांधी जीती और अपना दल फिर दो सीटें जीत गया। हालांकि अखिलेश यादव और आजम खान के लोकसभा सीटों से इस्तीफों के बाद हुए उपचुनाव में वे दोनों सीटें भी भाजपा जीत गई।

2019 का नतीजा इस दृष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि सपा-बसपा गठबंधन के कारण मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं हुआ और दोनों दलों के तीन तीन मुस्लिम उम्मीदवार जीत गए। अब अगर कांग्रेस, सपा और आरएलडी के साथ बसपा नहीं आती है, तो इंडिया गठबंधन को कोई फायदा नहीं होगा। त्रिकोणीय चुनाव में मुस्लिम वोटों का बंटवारा होगा और भाजपा की ही सीटें बढ़ेंगी, जैसे 2014 में एनडीए को 80 में से 73 सीटें मिल गईं थीं। इस हकीकत को मायावती भी जानती है कि कर्नाटक का संदेश मुस्लिम वोटों का कांग्रेस की तरफ लौटना है, इसलिए कांग्रेस सपा गठबंधन में शामिल होना उन्हीं के फायदे में रहेगा। आने वाले दिनों में वह सिर्फ उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन बाकी राज्यों में अलग ही रहे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+