Bankebihari Temple Corridor: बांके बिहारी मंदिर में बनने जा रहे कॉरिडोर का क्यों हो रहा है विरोध?
वाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और उज्जैन के महाकाल लोक की तरह ही वृंदावन में स्थित प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के चारों ओर भी एक विशाल गलियारा बनाए जाने की योजना प्रस्तावित है।

Bankebihari Temple Corridor: हाल ही में वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के आसपास के इलाके में सर्वे किया गया। हालांकि, इस कॉरिडोर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होते ही इसका विरोध होने लगा है। वृंदावन के पुजारियों, स्थानीय निवासियों के साथ व्यापारी भी इस कॉरिडोर के खिलाफ प्रदर्शन करने में जुटे हैं। इन तमाम लोगों का कहना है कि बांके बिहारी मंदिर के चारों ओर गलियारा बनने से पौराणिक और धार्मिक मान्यताएं खत्म हो जायेगी।
बांके बिहारी कॉरिडोर के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों में से कुछ ने पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ को गलियारे का काम बंद कराने के लिए खून से लिखी चिट्ठियां भी भेजी हैं। वहीं, कुछ स्थानीय निवासियों ने परिवार समेत आत्मदाह तक की धमकी दी हैं।
मंदिर के पास कितनी जमीन?
भगवान बांके बिहारी मंदिर की स्थापना उनके अनन्य भक्त स्वामी हरिदास ने की थी। कहा जाता है कि स्वामी हरिदास की भक्तिभावना से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान ने बांके बिहारी की मूर्ति निधिवन में प्रकट की थी। इसी मूर्ति को लेकर बांके बिहारी मंदिर की स्थापना की गई। कहा जाता है कि 1863 में भरतपुर के राजा रतन सिंह ने मंदिर के आसपास 3600 वर्गफीट में हास-परिहास बगीचा का निर्माण कराया था। जिस जगह ये कॉरिडोर बनाया जाना है, उस इलाके को आज के समय में बिहारीपुरा कहा जाता है। ये इलाका हास-परिहास बगीचा के अंतर्गत ही आता है।
फिलहाल, बांके बिहारी मंदिर केवल 1200 वर्गफीट की ही जगह में बना हुआ है। बाकी की जमीन पर मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले गोस्वामी पुजारियों और अन्य बड़े लोगों के घर वगैरह हैं। ये सभी लोग मंदिर से जुड़े हुए हैं। कहा जाता है कि बगीचा में चार कुएं भी हुआ करते थे, जिनके अवशेष आज भी नजर आते हैं। समय के साथ लोगों के इस इलाके में बसने और बड़े निर्माणों से ये इलाका और ज्यादा घना होता गया।
प्रस्तावित कॉरिडोर में क्या है खास?
राज्य की योगी सरकार की ओर से 506 करोड़ की प्रस्तावित बांके बिहारी मंदिर के कॉरिडोर की योजना में मंदिर के आसपास की 5 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा। मंदिर के चारों ओर से आने वाली पतली और संकरी गलियों (जिन्हें स्थानीय लोग कुंज गलियां कहते हैं) की जगह तीन 25-25 मीटर चौड़े गलियारे बनाए जाएंगे। मंदिर के फ्रंट को छोड़कर उसके दाएं-बाएं और पीछे की तरफ 25 मीटर का परिक्रमा पथ बनाया जाएगा। इसके साथ ही जुगल घाट से मंदिर तक के लिए 100 फुट चौड़ा रास्ता बनाने के साथ विद्यापीठ चौराहे और जादौन पार्किंग से भी मंदिर तक आने वाले मार्गों का चौड़ीकरण किया जाएगा।
इस कॉरिडोर में बांके बिहारी मंदिर के अलावा राधा वल्लभ मंदिर और मदन मोहन मंदिर समेत चार अन्य प्राचीन मंदिरों को भी जोड़ा जाएगा। प्रस्तावित कॉरिडोर की योजना के मुताबिक, 5 एकड़ में बनने वाला ये गलियारा दो मंजिला होगा। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और महाकाल लोक की तरह ही ये गलियारा मंदिर को सीधे यमुना नदी से जोड़ेगा। 900 वर्गमीटर में परिक्रमा का पथ बनाया जाएगा।
कॉरिडोर में श्रद्धालुओं के लिए प्रस्तावित कॉरिडोर में बांके बिहारी मंदिर के परिसर के निचले तल को करीब 11 हजार वर्गमीटर का बनाया जाएगा। जिसमें श्रद्धालुओं के लिए दो हरे-भरे पार्क, प्रतीक्षालय, पीने के पानी, सामान घर, जूता घर, प्रसाधन, पूजा सामग्री के लिए दुकानें, चिकित्सा और बच्चों के देखभाल समेत अन्य व्यवस्थाएं करने की योजना है। ये गलियारा भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से सुसज्जित होगा। प्रस्तावित गलियारा इस तरह बनाया जाएगा कि बांके बिहारी की मूर्ति प्रथम तल पर आएगी।
कॉरिडोर का क्यों हो रहा है विरोध?
दरअसल, सर्वे के बाद से ही स्थानीय लोगों ने प्रस्तावित कॉरिडोर का विरोध करना शुरू कर दिया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बांके बिहारी मंदिर के चारों ओर बनने वाले कॉरिडोर से वृंदावन की धार्मिक और पौराणिक विरासत खत्म हो जाएगी। वहीं, इस कॉरिडोर के निर्माण में मदनमोहन मंदिर और राधावल्लभ मंदिर को भी शामिल किया गया है। लोगों का कहना है कि ये दोनों मंदिर एएसआई (ASI) की ओर से संरक्षित श्रेणी में रखे गए हैं और इनके 500 मीटर के दायरे में कोई निर्माण कार्य नहीं हो सकता है। फिर बांके बिहारी कॉरिडोर कैसे बनाया जा सकता है?
हालांकि, विरोध का एक बड़ा कारण बांके बिहारी मंदिर के आसपास के लोगों की आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। 5 एकड़ में बनने जा रहे इस कॉरिडोर को लेकर किए गए सर्वे में 323 इमारतों तो चिन्हित किया गया हैं। इन रिहाइशी और कॉमर्शियल इमारतों के मालिकों को 200 से 220 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाना है। जिसमें कॉमर्शियल इमारतों के लिए 60 से 70 हजार प्रति वर्गमीटर और रिहाइशी इमारतों के लिए 16 हजार प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मुआवजे की रकम तय की गई है। मुआवजे की इस रकम को लेकर भी लोगों में भारी विरोध है।
इससे इतर यहां रहने वाले लोगों में से कई लोगों के पास जमीन के पूरे कागजात ही नहीं हैं। इन लोगों के पास नगर पालिका के टैक्स की रसीदों और बिजली बिल के अलावा अपना मालिकाना हक साबित करने वाले कोई दस्तावेज ही नहीं हैं। जिसकी वजह से इन लोगों को मुआवजा मिलना भी मुश्किल होगा। हालांकि, प्रशासन की ओर से कहा गया है कि लोगों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा। घर और दुकान मालिकों को मुआवजा दिया जाएगा। इसी के साथ जो लोग यहां दुकानें चला रहे हैं, उन्हें कॉरिडोर प्लान के ही शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में दुकानें भी दी जायेगी। इसके लिए कॉरिडोर में 800 वर्गमीटर की जगह रखी गई है। हालांकि, ये कितनी दुकानें होगी, इसकी अभी जानकारी सामने नहीं आई है।
मंदिर फंड के इस्तेमाल पर सेवायतों ने सुप्रीम कोर्ट तक में लगाई गुहार
बांके बिहारी कॉरिडोर को बनाने में मंदिर के फंड का इस्तेमाल किए जाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई थी। मंदिर के सेवायतों की ओर से दाखिल इस याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तुरंत सुनवाई करने से इनकार करते हुए याचिका को दो हफ्तों के लिए टाल दिया था। जिसकी अगली सुनवाई 6 फरवरी को होगी। मंदिर के गोस्वामी सेवायतों का कहना है कि ये उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
कॉरिडोर के पक्ष में भी उठ रही आवाजें
ऐसा नहीं है कि कॉरिडोर निर्माण का सिर्फ विरोध ही हो रहा है। वृंदावन के साधु-संत बांके बिहारी कॉरिडोर के पक्ष में भी आगे आए हैं। महंत फूलडोल बिहारी दास के साथ वृंदावन के कई संत कॉरिडोर के पक्ष में अपनी राय रख रहे हैं। इनका कहना है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा की दृष्टि से भगवान बांके बिहारी मंदिर परिसर सहित आसपास के संकरे क्षेत्र की जगह कॉरिडोर निर्माण का फैसला सराहनीय है। इन लोगों का कहना है कि पहले भी बांके बिहारी की मूर्ति कई मंदिरों में स्थानांतरित हुई है।
इन साधु-संतों के अनुसार, भगवान बांके बिहारी अब तक सात अलग-अलग स्थानों और मंदिरों में निवास कर चुके हैं। 1543 में अपने प्राकट्य के बाद से 1607 तक वो निधिवन में रहे। इसके बाद 1719 तक मूर्ति रंगमहल नाम के एक अन्य मंदिर में रही। उस साल करौली की रानी उन्हें करौली ले गई, जहां वे 1721 तक रहे। भरतपुर में एक चौथा मंदिर 1724 तक उनका निवास स्थान बना। इसके बाद बांके बिहारी फिर निधिवन वापस आए और 1787 तक नए मंदिर में रहे। जहां से उन्हें एक अन्य मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया था। 1864 में उस मंदिर से उन्हें वर्तमान परिसर में लाया गया था।
क्यों बनाया जा रहा है बांके बिहारी मंदिर में गलियारा?
बीते साल 19 अगस्त 2022 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर बांके बिहारी मंदिर में भारी भीड़ के चलते मची भगदड़ में दो लोगों की मौत हो गई थी। दरअसल, इस दुर्घटना के बाद योगी सरकार ने हाईकोर्ट में बांके बिहारी मंदिर के लिए कॉरिडोर निर्माण का प्रस्ताव रखा था। जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंदिर के आसपास का सर्वे कराने का आदेश दिया था। दिसंबर में मथुरा के डीएम ने सर्वे के लिए 8 सदस्यीय टीम का ऐलान किया था। जिसने 3 जनवरी 2023 से 8 जनवरी तक सर्वे कर 300 से ज्यादा मकानों को चिन्हित किया हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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