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Film on Savarkar: वीर सावरकर पर बनी फिल्म पर क्यों है विवाद?

आजकल वीर सावरकर पर आरोप लगाना एक फैशन सा बन गया है। जबकि जरुरत है कि पूरे स्वाधीनता संग्राम को व्यापकताऔर गहराई से समझा जाये।

Why is there a controversy over the film on Veer Savarkar?

Film on Savarkar: बीतें दिनों 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' फिल्म का टीजर जारी हुआ। इस फिल्म में वीर सावरकर का किरदार रणदीप हुड्डा निभा रहे हैं। कुल 1 मिनट 13 सेकंड के इस टीजर ने एकबार फिर से वीर सावरकर और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान पर बहस शुरू कर दी है। इस टीजर में दो बातें कही गयी हैं, पहली कि गांधीजी बुरे इंसान नहीं थे, मगर वह अपनी अहिंसावादी सोच पर अड़े नहीं रहते तो भारत 35 साल पहले आजाद हो गया होता। दूसरी बात है कि सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रांतिकारी नेता वीर सावरकर से प्रेरित थे।

सावरकर का अमूमन विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि यह दोनों बातें एकदम गलत है। यही नहीं, वह इसपर भड़क भी रहे हैं। जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि न सिर्फ टीजर में दम है बल्कि ये बातें भी एकदम सटीक है। वैसे टीजर को देखकर लगता है कि रणदीप हुड्डा ने वास्तव में बहुत मेहनत की है। चूंकि सावरकर एक सामान्य कद काठी वाले इंसान थे। उनकी जो छवि लोगों के बीच में है उसमें वह दुबले-पतले और गाल थोड़े धंसे हुए नजर आते है। इस किरदार में ढ़लने के लिए रणदीप हुड्डा ने लगभग 26 किलो वजन घटाया और 4 महीनों तक प्रतिदिन केवल एक खजूर एवं एक गिलास दूध पर गुजारा किया। कलाकार द्वारा हकीकत में अपने आप को इस तरह झोंकने का यह एक बेमिसाल उदाहरण है।

अब बात करते हैं उन तथ्यों की जिनपर बवाल मचाया जा रहा है। पहले बात गांधीजी की अहिंसावादी सोच और भारत के 35 साल पहले आजाद होने की करते हैं। हम सब जानते हैं कि भारत 1947 में विभाजन के साथ आजाद हुआ। इसमें 35 साल पहले की बात करें तो हम 1912 में पहुंच जाते हैं। अब फिल्म का विरोध करने वालों का कहना है कि गांधीजी तब भारत में नहीं थे। वह तो जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे, तो 1912 में आजादी न मिलने में गांधीजी की भूमिका कैसे हो सकती है? मगर यहां जल्दीबाजी से नहीं बल्कि थोडा ठहरकर दस्तावेजों और इस कालखंड के घटनाक्रमों का अध्ययन करना बेहद जरुरी है।

महात्मा गांधी का जन्म 1869 में हुआ और 1883 में वह पहली बार दक्षिण अफ्रीका गये। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका उसी ब्रिटिश साम्राज्यवाद का हिस्सा हुआ करता था जिसमें भारत फंसा हुआ था। तो गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई की शुरुआत दक्षिण अफ्रीका से की। अब बार-बार इस बात को कहना कि गांधीजी 1915 में ही लौटे, तभी उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया। यह एक भ्रम है और सरासर गलत तथ्य है।

गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका में थे बीच-बीच में कई बार भारत आये थे। जैसे 1896 में वह बम्बई आये और महादेव गोविन्द रानाडे, बदरुद्दीन तैयबजी एवं फिरोजशाह मेहता से मिले। इसके बाद पुणे में गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य गंगाधर तिलक और आर.जी. भंडारकर से मिले। फिर नागपुर होते हुए कलकत्ता पहुंचे और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी से मुलाकात की।

साल 1901-02 में वह दुबारा भारत में थे। इस बार वह सबसे पहले राजकोट गये और फिर बम्बई। उसके बाद कलकत्ता पहुंचे और कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में हिस्सा लिया। इस दौरान वह कई दिनों तक गोखले के साथ रहे। यहां से माना गया कि गांधीजी के राजनैतिक गुरु गोखले ही थे। इन दोनों के संबंध समय के साथ मजबूत होते चले गए और फरवरी 1915 में गोखले के निधन तक बने रहे।

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच इस आवाजाही में गांधीजी इंग्लैंड में विलियम वेडरबर्न (कांग्रेस के संस्थापक सदस्य और अध्यक्ष) एवं दादाभाई नौरोजी से भी मिले। यही नहीं, वह वायसराय कर्जन से लेकर भारत के स्टेट सेक्रेटरी के भी संपर्क में रहा करते थे। यानी कुलमिलाकर वह दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे थे। उसके साथ-साथ भारत की राजनैतिक स्थितियों अथवा हालातों से भली-भांति परिचित थे। वह उस दौर के सभी बड़े नेताओं के संपर्क में थे और लगातार अपना राजनैतिक कद बढ़ा रहे थे।

जब गांधीजी इन संपर्क अभियानों के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ काम कर रहे थे, तब भारत में क्रांतिकारियों का एक बड़ा नेटवर्क बन चुका था। इसमें एक नहीं बल्कि दर्जनों गुप्त संस्थाएं और सैकड़ों क्रांतिकारी जुड़ चुके थे। इसमें श्यामजी कृष्णवर्मा के इंडिया हाउस से लेकर अनुशीलन समिति और जुगांतर जैसी संस्थाएं शामिल थीं। इनसे जुड़े कई क्रांतिकारियों जैसे मदमलाल धींगरा ने कर्जन वायली को मारा और खुदीराम बोस ने बंगाल के अंग्रेज गवर्नर को मारने की नाकाम कोशिश की। बंगाल में कई बम और बंदूक बनाने के गुप्त कारखाने स्थापित हो गये थे। अब जिस बारूद और गोलियों के दमपर ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में सत्ता हथियाई थी, उसे उन्हीं से जवाब दिया जा रहा था।

इसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत को एक बड़ी चुनौती बंग-भंग आन्दोलन से मिल रही थी। इस घटना का आजकल आमतौर पर जिक्र नहीं होता। जबकि यह कोई साधारण आन्दोलन नहीं था। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों के गठजोड़ ने ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिला दी थी। रही सही कसर कांग्रेस के गरमदल नेताओं ने अपना समर्थन देकर पूरी कर दी। जिसका नेतृत्व बालगंगाधर तिलक कर रहे थे।

इसी दौरान स्वदेशी और बंदेमातरम के नारों ने अंग्रेजी सरकार को लगभग दिवालिया बना दिया था। इस बात को सामने लाने की जरुरत है कि कैसे एक आंदोलन के चलते विदेशी नमक का भारत में आयात एक लाख 40 हजार मन घट गया था। विदेशी कॉटन की मांग में करोड़ों यार्ड्स की भारी गिरावट होने लगी। यह जानकारी 'द टाइम' ने 22 जनवरी 1909 को प्रकाशित अपने अंक में दी थी।

इस आर्थिक नुकसान और राजनैतिक अस्थिरता की गूंज लन्दन में पहले ही पहुंच गयी थी। हाउस ऑफ कॉमन्स में 26 नवंबर 1906 को बहस हुई कि भारत में व्यापक अशांति फैली हुई है। ध्यान रहे कि इस डिबेट का नाम 'Unrest in India and Partition of Bengal' था, यानी बंगाल का विभाजन और भारत में अशांति। जब कोई रास्ता नहीं निकला तो तत्कालीन वायसराय कर्जन को हटाकर मिन्टो को लाया गया।

इस मिन्टो ने दो काम किये, पहला इस आन्दोलन की एक कमजोर कड़ी, मतलब कांग्रेस के नरमदल के नेताओं से संपर्क साधा। इस गुट के मुखिया गांधीजी के राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले थे। मिन्टो ने ही गोखले को बुलाकर समझाया कि बंगाल के आन्दोलन में कांग्रेस की भूमिका को सीमित रखना चाहिए। इस प्रस्ताव पर गोखले पूरी तरह से सहमत दिखे। इस मुलाकात का जिक्र साल 1934 में प्रकाशित पुस्तक 'इंडिया मिन्टो एंड मोर्ले' में मिलता है। दूसरा काम जो मिन्टो ने किया वह था मुसलमानों को भारत में एक अलग से राजनैतिक ईकाई के रूप में स्वीकार करना। इन सबके लिए उसने भारत में संवैधानिक सुधारों की बातें कही जिनका गोखले सहित अन्य नरमपंथियों ने स्वागत किया।

फिर 1906 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में नरमपंथी दादाभाई नौरोजी ने स्वराज की मांग कर दी। उन्होंने कहा "भारत के लिए ईमानदारी, सम्मानपूर्वक और कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ स्वराज को अपनाना, मेरे छोटे से जीवन में एक उपहार की तरह होगा। और इसकी शुरुआत हो चुकी है जोकि निर्णायक रहेगी।" मगर इस स्वराज का रास्ता ब्रिटिश सरकार के अधीन स्वायत्तता (ऑटोनोमी) से होकर संवैधानिक तथा राजनैतिक सुधारों की मांग पर खुलता था। इसी प्रकार से 1947 में देश को आजादी मिली।

भारत में मिन्टो 1910 तक रहा और इस दौरान उसने इस बात को सुनिश्चित किया कि मुसलमान और हिन्दू दोनों अलग है। कांग्रेस में गुटबाजी बनाये रखी जिससे बंगाल विभाजन विरोध जैसा दूसरा आंदोलन न पनपने लगे। बाकी क्रांतिकारियों से सरकार को सुरक्षित रखने के लिए राजधानी ही कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी।

फिर भी अंग्रेजों का क्रांतिकारियों से डर खत्म नहीं हुआ था। इसलिए 1911 में भारत की राजधानी दिल्ली को बनाया गया तो देशी रियासतों का समर्थन हासिल करने के लिए ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम को भारत बुलाया गया। मगर इसकी जानकारी आखिर तक गोपनीय रखी गयी जिससे अंग्रेजों के राजा को क्रांतिकारियों से सुरक्षित रखा जा सके। अगर वह पहले ही उनके आने की घोषणा कर देते तो शायद मुमकिन है कि कोई क्रांतिकारी बड़ा धमाका कर सकता था।

मिन्टो के बाद भारत के अगले वायसराय हार्डिंग बने। उन्होंने ही अपनी पुस्तक 'माय इंडियन इयर्स' में लिखा है कि जब ब्रिटिश मोनार्क को भारत आने का न्योता भेजा गया तो इसकी जानकारी मात्र 12 लोगों के पास थी। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने अपनी पुस्तक 'ए नेशन इन मेकिंग' में लिखा है कि जॉर्ज के आने की अधिकारिक घोषणा एक सप्ताह पहले दी गयी थी।

फिर साल 1915 में गांधीजी हमेशा के लिये भारत लौट आये, तबतक वह कांग्रेस के प्रथम पंक्ति के नेताओं में शुमार हो चुके थे। उन्होंने भारत की आजादी के उस मॉडल को प्रस्तावित किया जोकि क्रांतिकारियों की सोच के एकदम विपरीत था। यही उन्होंने अपने राजनैतिक गुरु गोखले से सीखा था।

अतः इस तथ्य के आधार पर फिल्म का कहना ठीक है कि क्रांतिकारियों के हिसाब से भारत 1911-12 के आसपास आजाद हो गया होता। बस जरुरत थी, उन क्रांतिकारियों के प्रयासों को एकजुट होकर समर्थन देने की जिससे अंग्रेज सबसे ज्यादा डरे हुए थे।

दूसरी बात, सुभाष चन्द्र बोस को लेकर कही जा रही है। जैसा फिल्म में कहा गया है कि सुभास चंद्र बोस को सावरकर से प्रेरणा मिली थी। यह कहना भी कोई गलत तथ्य नहीं है। बहुत ही सामान्य बात है कि एक इंसान अपने जीवन में कई लोगों से बहुत कुछ सीखता है। कई बार एक इंसान का कोई एक काम दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाता है। जैसे धनञ्जय कीर अपनी पुस्तक 'वीर सावरकर' में लिखते है कि सावरकर द्वारा लिखित 'द फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस - 1857' पुस्तक को क्रांतिकारियों की गीता कहा जाता था।

यह किताब सिर्फ इसलिये महत्वपूर्ण नहीं कि इसे सावरकर ने लिखा। बल्कि इसलिए भी है क्योंकि यह कई क्रांतिकारियों के हाथों से होकर गुजरी। इसमें एम.पी.टी. आचार्य और भीकाजी कामा सहित अभिनव भारत, गदर पार्टी और इंडिया हाउस से जुड़े हजारों-लाखों लोग शामिल थे। बाद में इस क्रम में भगत सिंह और उनके सहयोगी भी जुड़े। साल 1942 में फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसाइटी ने इसे जर्मनी में छपवाया और वितरित किया। इस दौरान नेताजी सुभास चंद्र बोस भारत के तीसरे वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस यानी आजाद हिन्द फौज के गठन की शुरुआत कर रहे थे।

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    धनञ्जय कीर के अनुसार इस आजद हिन्द फौज की बटालियनों, डिविजनों, नारों और गानों को सावरकर की इसी पुस्तक ने प्रेरित किया था। इस सन्दर्भ में के.एफ. नरीमन 'फ्री हिंदुस्तान वीकली' में लिखते है कि आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट का आईडिया नेताजी को सावरकर की इसी पुस्तक से आया था।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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