Caste Census: जातीय जनगणना से किसे होगा नुकसान

1857 की क्रांति के बाद भारत की स्वतन्त्रता के लिए देश में बढ़ती एकता से घबराए अंग्रेजों ने समाज में फूट डालने के लिए जातीय भेदभाव का प्रोपेगेंडा रचा था। उसी आधार पर उन्होंने जातीय जनगणना करवाई थी। लेकिन कांग्रेस और गांधीजी के भयंकर विरोध के कारण 1931 के बाद जातीय जनगणना बंद हो गई थी। उसके 70 वर्ष बाद 2004 में बनी मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने गठबंधन सहयोगियों के दबाव में जातीय-जनगणना फिर शुरू की थी, लेकिन उसके खिलाफ वेद प्रताप वैदिक जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 'मेरी जाति हिंदुस्तानी' आंदोलन शुरू किया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खुद जातीय जनगणना के आंकड़े जारी नहीं होने दिए थे।

हैरानी की बात यह है कि नीतीश कुमार की सरकार ने गांधी जयंती पर ही जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए। उससे ज्यादा हैरानी की बात यह है कांग्रेस भी आज गांधी के सिद्धांतो के विपरीत जातिवादी राजनीति को अपना हथियार चुकी है। उसी कांग्रेस पार्टी ने हाल ही में अपनी हैदराबाद कार्यसमिति की बैठक में जातीय जनगणना का प्रस्ताव पास किया, जिस कांग्रेस पार्टी ने 1931 में जातीय जनगणना का विरोध किया था।

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राहुल गांधी ने भी संसद के पिछले सत्र में जाति आधारित जनगणना की मांग रख कर अपनी दादी इंदिरा गांधी की राजनीति को पलट दिया, जिन्होने नारा दिया था- जात पर ना पात पर, इंदिरा गांधी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर। लगता है राहुल ने महात्मा गांधी, नेहरू, इंदिरा के सिद्धांतो को पूरी तरह तिलांजली दे दी है।

बिहार की जातीय जनगणना पर राहुल गांधी ने लिखा है कि बिहार में 84 प्रतिशत पिछड़े, आदिवासी और दलित हैं। उनके कहने का मतलब यह था कि 16 प्रतिशत स्वर्ण हैं। उनका यह ट्विट पूरी तरह गलत और भ्रम फैलाने वाला है, क्योंकि उन्होंने बिहार के सभी 17 प्रतिशत मुसलमानों को भी पिछड़ों में जोड़ लिया। जबकि अपने ट्विट में उन्होंने सिर्फ दलित, आदिवासी और पिछड़े लिखा है।

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अगर राहुल कहते हैं कि 84 प्रतिशत पिछड़े हैं, तो अब इस बात पर तो उन्हें खुद जवाब देना पड़ेगा कि 1937 से 1967 तक कांग्रेस ने बिहार को जो चार मुख्यमंत्री (कृष्ण सिंह, दीप नारायण सिंह, विनोदानंद झा और कृष्ण वल्लभ सहाय) दिए उनमें से कोई भी पिछड़ी जातियों का क्यों नहीं था। पिछड़ी जातियों के साथ अन्याय तो बहुत पहले से हो रहा है। 1931 की जनगणना में भी पिछड़ों की आबादी ज्यादा थी।

भारतीय जनता पार्टी का यह मानना है कि जाति आधारित जनगणना हिंदू समाज को तोड़ने की साजिश का हिस्सा है, आज़ादी से पहले कांग्रेस और गांधी भी यही मानते थे। तीन अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बस्तर में दिए अपने भाषण में कहा है कि कांग्रेस ने सोचना समझना बंद कर दिया है, उसने सोचने समझने और नीतियाँ बनाने का काम आउटसोर्स करना शुरू कर दिया है। उनका इशारा यह था कि कांग्रेस की जातीय जनगणना की राजनीति लालू यादव और नीतीश कुमार को आउटसोर्स की हुई है।

जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने कहा था कि देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। लेकिन अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि पिछड़ी जातियों को उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस की वक्त के साथ बदलती नीति की तरफ भी देश का ध्यान आकर्षित किया है।
2011 में मनमोहन सरकार ने जाति आधारित जनगणना के कुछ आंकड़े जुटाए थे, लेकिन बाद में उन अधूरे आंकड़ों को जारी नहीं किया गया। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था कि जातीय जनगणना के आंकड़े अधूरे हैं, इसलिए उन्हें जारी नहीं किया जा सकता। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो केंद्र सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में हल्फिया बयान देकर कहा था कि 2011 की जनगणना में जाति आधारित आंकड़े अधूरे हैं, लेकिन राहुल गांधी कह रहे हैं कि मनमोहन सरकार के समय एकत्र किए गए आंकड़े जारी किए जाएं, नहीं तो कांग्रेस उन्हें जारी कर देगी।

खुद को गांधीवादी कहने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने प्रदेश में जाति आधारित जनगणना करवा कर और उसके आंकड़े जारी करके गांधी की आत्मा को ठेस नहीं पहुंचाई क्या, जिन्होंने यह कह कर जाति आधारित जनगणना का विरोध किया था कि यह हिन्दुओं को बांटने की साजिश है। अगर उन्हें बिहार के गरीबों की चिंता होती तो वह गरीब परिवारों की जनगणना करवाते, उसमें जाति और मजहब का ख्याल बिल्कुल नहीं किया जाता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जातीय जनगणना के खिलाफ स्पष्ट स्टैंड लेते हुए तीन अक्टूबर को कहा कि जातीय जनगणना समाज की एकता को तोड़ने की भारत विरोधी ताकतों की साजिश है। उनकी नजर में अमीर और गरीब, दो ही जातियां है, जो भी लड़ाई लडनी है, वह गरीबों को न्याय दिलाने के लिए लड़नी है, इसलिए उनकी सरकार ने आर्थिक तौर पर पिछड़ों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया है।

बिहार में ताजा जातीय जनगणना का अर्थ समझ नहीं आ रहा, यह किसलिए की गई है, क्या सारी पिछड़ी जातियां आर्थिक रूप से भी पिछड़ी हैं, क्या आज़ादी के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। क्या 1990 से शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के बावजूद उनका शैक्षणिक विकास नहीं हुआ। सवाल यह पैदा होता है कि लालू यादव और उनकी पत्नी राबडी देवी के 15 साल मुख्यमंत्री रहने और नीतीश कुमार के 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी अगर बिहार की पिछड़ी जातियों का विकास नहीं हुआ, तो क्या वह अपनी असफलता गिना रहे हैं।

जातीय जनगणना का एक ही मकसद दिखाई देता है कि ओबीसी का आरक्षण कोटा बढाने की मांग को लोकसभा चुनावों में जोरदार ढंग से उठा कर ओबीसी का वोट हथियाया जाए। सुप्रीमकोर्ट ने 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा तय की हुई है। जबकि नीतीश सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में खुद कहा था कि यह जाति आधारित जनगणना नहीं, जाति आधारित सर्वे है। इसलिए नीतीश कुमार और लालू यादव का मकसद सिर्फ राजनीतिक है। उन्हें लगता है कि सुप्रीमकोर्ट से आरक्षण का कोटा बढ़ाने की अनुमति मिले न मिले, उन्हें चुनावों में राजनीतिक फायदा होगा।

सवाल यह है कि पिछले लोकसभा चुनावों में जिन 44 प्रतिशत पिछड़ों ने भाजपा को वोट था, क्या जातीय जनगणना के बाद वे भाजपा को वोट नहीं देंगे। अगर नहीं देंगे, तो क्यों नहीं देंगे। जनगणना से तो किसी की आर्थिक स्थिति सुधरने से रही, लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार तो सरकार की नीतियों से आएगा, और वह पिछले पांच साल में मोदी सरकार की नीतियों से आया भी है, क्योंकि देश में प्रति व्यक्ति आय में अच्छी खासी बढौतरी हुई है, जिनमें सभी जातियां आती हैं।

पिछड़ी जातियों और अति पिछड़ी जातियों को इन्साफ की कुंजी रोहिणी कमेटी की सिफारिशों में रखी है। मोदी सरकार अगर संसद के अगले सत्र में रोहिणी कमेटी की सिफारिशों को संसद के पटल पर रख देगी, तो पिछले 23 साल से आरक्षण का फायदा उठाने वाली कुछ गिनी चुनी पिछड़ी जातियों की पोल खुल जाएगी। 10 प्रतिशत पिछड़ी जातियों ने नौकरियों में आरक्षण का पच्चीस फीसदी हिस्सा हड़प लिया। 25 प्रतिशत पिछड़ी जातियों ने आरक्षण का 97 फीसदी हिस्सा हड़प लिया।

983 पिछड़ी जातियों को न नौकरियों में आरक्षण का कोई फायदा हुआ, न शिक्षा के क्षेत्र में, फिर आरक्षण का कोटा बढ़ने से उनका क्या फायदा होगा। तो अब जरूरी हो गया है कि 23 साल में आरक्षण का फायदा उठाने वालों को आरक्षण के फायदे से वंचित करके आरक्षण से बाहर किया जाए। इस सर्वे से वैसे भी बिहार के यादव बड़ी मुश्किल में फंस गए हैं, एक तो राज्य में सत्ता और आर्थिक संसाधनों का सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं ने उठाया था, ऊपर से ताजा आंकड़ों में यादवों की संख्या मुसलमानों से कम निकल आई है।

इस जनगणना ने राजनीतिक तौर पर भी यह साबित कर दिया कि 2005 में राम विलास पासवान के लालू यादव के सामने समर्थन के लिए मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त ठीक ही रखी थी, क्योंकि जिस मुस्लिम यादव गठबंधन के नाम पर लालू सत्ता हासिल करते थे, उसका फायदा तो यादव उठाते थे, जबकि सत्ता मुस्लिम वोटरों के बूते हासिल करते थे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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