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Opposition Strategy: विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव में कौन पास, कौन फेल?

Opposition Strategy: राजनीति के हर कदम के कुछ घोषित, तो कुछ अघोषित मकसद होते हैं। यह भी दिलचस्प है कि उसके घोषित मकसद से कहीं ज्यादा अघोषित और सांकेतिक मकसद महत्वपूर्ण होते हैं। विपक्ष द्वारा लोकसभा में पेश अविश्वास प्रस्ताव का घोषित मकसद मणिपुर के मामले को राष्ट्रीय नैरेटिव का हिस्सा बनाना रहा, लेकिन इसका अघोषित मकसद आगामी लोकसभा चुनाव का मुद्दा तय करना और उसके जरिए नरेंद्र मोदी सरकार को घेरना था।

हालांकि अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में विपक्षी बहिर्गमन के बाद ध्वनि मत से गिर चुका है और आगामी लोकसभा चुनाव तक के लिए मोदी सरकार की राह का कांटा दूर हो गया है। इसके बाद यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या कांग्रेस का अविश्वास प्रस्ताव अपने घोषित और अघोषित दोनों लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रहा?

Who passed and failed in the no-confidence motion of the opposition?

इसमें दो राय नहीं कि अविश्वास प्रस्ताव अपने घोषित मकसद में किंचित कामयाब रहा, लेकिन वह अपने सांकेतिक और अघोषित लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा है। इतना ही नहीं, एक तरह से कांग्रेस ने तश्तरी में सजाकर मोदी सरकार को अगले चुनाव के लिए अपना एजेंडा स्थापित करने और उसी के अनुरूप चुनाव अभियान चलाने की सहूलियत प्रदान कर दी है।

सबसे पहली बात यह कि जिस कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया, उसके प्रदर्शन को देखना होगा। लोकसभा की सदस्यता बहाल होने के बाद राहुल गांधी का लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलना, पहला संबोधन था। उनके चाहने वाले ही नहीं, विरोधियों की भी निगाह राहुल गांधी के संबोधन पर थी। चाहने वाले इस उम्मीद में थे कि अपने भाषण के जरिए वे केंद्र सरकार के खिलाफ मजबूत घेरेबंदी करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष आशंकित था कि राहुल कहीं नया टंटा न खड़ा करें। लेकिन राहुल ने अपने अनुयायियों को जहां निराश किया, वहीं सत्ता पक्ष को राहत दे दी। उनके लचर प्रदर्शन के बाद अब सत्ता पक्ष चुनावी मैदान में बार-बार उन्हें अयोग्य बताएगा, उनकी नाकामियां गिनाएगा। सत्ता पक्ष यह साबित करने की कोशिश करेगा कि राहुल भले ही अधेड़ हो चुके हों, लेकिन उनमें अभी भी बचपना है। सत्ता पक्ष वोटरों को यह भी समझाने की कोशिश करेगा कि देश किसी अपरिपक्व के हाथ में नहीं दिया जा सकता।

कांग्रेस और उसके रणनीतिकार भूल गए कि अविश्वास प्रस्ताव के बहाने यह समूचे देश को संबोधित करने का मौका है। एक शानदार अवसर वे चूक गए। वाममोर्चे के एक-दो सदस्यों को छोड़ दें तो समूचा विपक्ष ही अविश्वास प्रस्ताव पर दिशाहीन नजर आया। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव से भी उम्मीद थी कि वे कुछ तर्क देंगी। लेकिन उन्होंने भी निराश किया। एक दौर में समाजवादी राजनीति अपनी धारदार भाषण कला और तर्कों के कारण जानी जाती थी। लेकिन चाहे जनता दल हो या राष्ट्रीय जनता दल, उसके सदस्य भी कोई धारदार और वजनी तर्क पेश नहीं कर पाए। जनता दल यू के सांसद गिरधारी यादव के संबोधन का आशय क्या रहा, वह शायद ही लोकसभा के सदस्य कुछ समझ पाए होंगे।

विपक्ष के तर्कों के बरक्स भाजपा की दलीलें देखिए। भाजपा की ओर से चर्चा की शुरूआत करते हुए निशिकांत दुबे ने तर्क, तथ्य और तंज तीनों का अद्भुत मेल दिखाया। उनके तंज गहरे चुभन वाले रहे, लेकिन भाषा और तर्क ऐसा रहा कि जिस कांग्रेस पर वे हमला कर रहे थे, उसके सदस्य भी मंद स्मित से भरे नजर आए। गृहमंत्री अमित शाह की ख्याति बहुत अच्छे वक्ता के तौर पर नहीं रही है। लेकिन उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव के पहले दिन की चर्चा में जिस तरह तर्क, तंज और तथ्यों का मेल दिखाया, वह अद्भुत रहा।

उन्होंने विपक्षी आरोपों के खिलाफ दमदार तर्क रखे, अपनी सरकार की उपलब्धियां रखीं और लगे हाथों टोकाटाकी करते रहे सदन में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी को अपनी पार्टी के हिस्से से बोलने के लिए वक्त देने का ऐलान कर दिया। सवाल उठाने वाले सांसदों मसलन दानिश अली आदि को सीधे संबोधित करते हुए उनके आरोपों की धज्जी उड़ा दी। यह सब जानते हैं कि मणिपुर हिंसा के लिए मैती समुदाय से कहीं ज्यादा जिम्मेदार कुकी समुदाय है। लेकिन संसदीय व्यवहार के अनुरूप उन्होंने जब भी कुकी समुदाय का जिक्र किया, हर बार उन्हें कुकी भाई कहा। कह सकते हैं कि अमित शाह का यह भाषण राजनेता से स्टेट्समैन की ओर बढ़ते कदम का प्रतीक रहा। उनकी जैसी अक्खड़ छवि रही है, उनके भाषण में किंचित वह रही, लेकिन ज्यादातर वक्त वे विनम्र दिखते रहे।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए तो राहुल गांधी एक वरदान समान हैं। चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने राहुल का नाम नहीं लिया, अलबत्ता इस तथ्य को स्वीकार भी किया। अविश्वास प्रस्ताव हो या विश्वास प्रस्ताव, चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री को ही देना होता है। इस नाते उनकी बारी सबसे आखिर में आती है। चूंकि कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव रखा था, इसलिए वह प्रधानमंत्री के जवाब के बाद स्पष्टीकरण मांग सकती थी। लेकिन उसने खुद ही यह मौका खो दिया। वह ठोस और जानदार आरोप नहीं लगा सकी और आखिर में स्पष्टीकरण के वक्त समूचे विपक्ष के साथ सदन से बहिर्गमन कर गई।

प्रधानमंत्री को एक तरह से अविश्वास प्रस्ताव ने मौका दे दिया। उनके जवाब को दो हिस्सों में देखा जा सकता है। पहले हिस्से में उन्होंने जहां अपने नौ साल के कार्यकाल की उपलब्धियों की गिनती कराई, वहीं मणिपुर समेत समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र की मौजूदा समस्याओं के लिए अतीत की कांग्रेस सरकारों के कदमों को जिम्मेदार करार दिया। उन्होंने लोहिया को उद्धृत करते हुए पूर्वोत्तर की अशांति के लिए नेहरू की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।

वेरियर एल्विन के सुझाव पर नेहरू ने पूर्वोत्तर को एक तरह से संरक्षित और बफर जोन बना दिया था, जहां विकास की किरणें नहीं पहुंचनी थी। नेहरू शासन में पहुंची भी नहीं। इसका लोहिया ने विरोध करते हुए कहा था कि तीस हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल को कोल्डस्टोरेज में तब्दील करके उसे विकास से वंचित कर दिया गया है। लोहिया ने उस क्षेत्र में घुसने का बार-बार प्रयास किया और संरक्षित क्षेत्र बनाने का बार-बार विरोध किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर लोहिया के बहाने कांग्रेस के साथ खड़े समाजवादी दलों को भी निशाना बनाया। मणिपुर की समस्या के लिए उन्होंने मणिपुर हाईकोर्ट के फैसले को जिम्मेदार बताया। इसके साथ ही उन्होंने न्यायपालिका पर रहस्यपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अदालतों में जो हो रहा है, वह सबको पता है।

कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि अधीर रंजन चौधरी भले ही इस बात पर खुश होते रहें कि विपक्ष ने पीएम को संसद में बोलने के लिए विवश कर दिया लेकिन यह बोलना क्या विपक्ष के हित में गया है? इस मौके का उपयोग उन्होंने देश को संबोधित करने के रूप में लिया और इसका भरपूर फायदा उठाया। एक तरह से मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरूआत कर दी, जिसका कम से कम विपक्ष को तो कोई फायदा नहीं होने वाला।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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