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चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बढ़ते संकट के लिए आखिर कौन है जिम्मेदार?

By आर एस शुक्ल
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नई दिल्ली। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन अब उसकी विश्वसनीयता को लेकर जिस तरह का संकट खड़ा हो गया है उसे अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। इसके पीछे दो प्रमुख कारणों का हवाला दिया जा रहा है। पहला तो यह कि चुनाव आयोग के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब उसे अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल करना पड़ा। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार पर रोक की अवधि बढ़ा दी गई और इसमें भी पक्षपात किए जाने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाईयों पर अंगुलियां उठाई गईं। दूसरा यह कि अभी तक विपक्ष की ओर से ही चुनाव आयोग पर अंगुली उठाई जाती रही है। अब तो सत्तापक्ष की ओर से भी उस पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे हैं। हालांकि अभी तक चुनाव आयोग के बचाव में खड़े होने वाले सत्तापक्ष की ओर से की गई आलोचना के पीछे की सोच कुछ और हो सकती है, लेकिन पश्चिम बंगाल को लेकर चुनाव आयोग की ओर से की गई कार्रवाई को विपक्ष न केवल एकतरफा बता रहा है बल्कि साफ-साफ कहा जा रहा है कि वह केंद्र में सत्ताधारी पार्टी को हर तरह से लाभ पहुंचाने और विपक्ष को नुकसान पहुंचाने के लिए की गई है। कांग्रेस, बसपा, सपा, डीएमके, आरजेडी समेत अनेक विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है और उसकी ताजा कार्रवाइयों को एक खास पार्टी को सहूलियतें प्रदान करने के रूप में व्याख्यायित किया है।

Election Commission

सबसे पहले यह देखने की बात है कि आखिर पश्चिम बंगाल को लेकर चुनाव आयोग ने किया क्या और फिर उस पर विपक्ष इतना आगबबूला क्यों हो रहा है। इसके पीछे तात्कालिक कारण कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का रोड शो बताया गया जिसके दौरान न केवल व्यापक हिंसा हुई बल्कि महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ दी गई। इस दौरान पथराव, तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी हुईं।इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ। भाजपा की ओर से इस सबके लिए टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया गया। आरोप लगाया गया कि सब कुछ ममता के इशारे पर टीएमसी के गुंडों ने किया। यह भी कहा गया कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है और चुनाव आयोग मूकदर्शक बना हुआ है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की ओर से संवाददाता सम्मेलन कर यह आरोप भी लगाया गया कि अगर सुरक्षा बलों ने बचाया न होता तो उनकी जान तक को खतरा उत्प्न्न हो गया था। भाजपा की ओर से कुछ नेता चुनाव आयोग भी गए और शिकायत दर्ज कराई। कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने जंतर मंतर पर मौन धरना भी दिया। इसके अलावा भी भाजपा नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस आदि कर ममता बनर्जी को निशाने पर लिया गया और चुनाव आयोग से आवश्यक कार्रवाई करने की बात की गई। अब यह पता नहीं कि चुनाव आयोग को इस सब का इंतजार था अथवा उसे खुद लगा कि कुछ करना चाहिए, सो उसकी ओर से वह सब कुछ करने की कोशिश कर दी गई जिसके बारे में उसकी ओर से कहा जाता रहा है कि उसके पास कार्रवाई करने की शक्तियां नहीं हैं। इसमें अनुच्छेद 324 का उपयोग तक शामिल हो गया।

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अब यह जानना आवश्यक है कि आखिर जिस चुनाव आयोग ने बीते छह चरणों के दौरान पश्चिम में लगातार हो रही हिंसा को रोकने और भाजपा-टीएमसी के बीच बढ़ते टकराव-तनाव और दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व में आपसी तनातनी के मद्देनजर आवश्यक कदम उठाने के लिए एहतियाती उपाय करने की जरूरत थी, वह अनदेखी करता रहा और जब हालात इतने बिगड़ गए, उसके बाद आयोग की नींद टूटी तो फिर अपनी कार्रवाई को लेकर आलोचना का शिकार हो गया। चुनाव आयोग की ओर से बाकायदा संवाददाता सम्मेलन कर लिए गए फैसलों की जानकारी दी गई। इसके मुताबिक 17 मई को समाप्त होने वाले चुनाव प्रचार को गुरुवार रात बजे से कर दिया गया। राज्य के एडीजी (सीआईडी) और प्रधान सचिव (गृह) को हटा दिया गया और एडीजी (सीआईडी) को गृहमंत्रालय भेज दिया गया। मुख्य सचिव को गृह सचिव की जिम्मेदारी दे दी गई। आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि राज्य प्रशासन की ओर से निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने में उसे अपेक्षित सहयोग भी नहीं मिल रहा है। बताया जाता है कि आयोग की कार्रवाई अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल करते हुए की गई जो चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार हुआ है।

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इसके साथ ही चुनाव आयोग के फैसलों की तीखी आलोचना शुरू हो गई और गंभीर सवाल उठाए जाने लगे। यह कहा जाने लगा कि आखिर चुनाव आयोग छह चरणों तक चुप्पी क्यों साधे रहा। क्या उसे यह सब होने का इंतजार था। आयोग को पता था कि पश्चिम बंगाल में क्या कुछ हो रहा है। ऐसे में क्या पहले से एहतियाती कदम नहीं उठाए जाने चाहिए थे। व्यवस्था के मुताबिक चुनावों की घोषणा के साथ ही प्रशासन आयोग के अधीन हो जाता है। इसके बावजूद यह कहना कि प्रशासन सहयोग नहीं कर रहा था कुछ छिपाने जैसा नहीं लगता। अगर वाकई ऐसा था तो पहले क्यों कार्रवाइयां क्यों नहींकी गईं। इस तरह के अनेक सवाल आम लोगों के दिमाग में उठ रहे हैं जिनकी वजह से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता संदिग्ध लगने लगती है। चुनाव आयोग के सारे तर्क और कार्रवाइयां उचित हो सकती हैं और केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के सभी आरोप ठीक हो सकते हैं लेकिन आम लोगों के मन में उठ रही शंकाओं और विपक्ष के सवालों का कोई समुचित जवाब मिलता नजर नहीं आ रहा है। यह सब शायद इस वजह से है कि वर्तामान चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वनीयता पर संबे समय से लगातार सवाल उठते रहे हैं और यह कहा जाता रहा है कि वह एकतरफा सत्ता पक्ष के हितों को साधने में लगा हुआ है। उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर संभवतः कोई चिंता नहीं रह गई है।

इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि आखिर विपक्ष की ओऱ से चुनाव आयोग को लेकर क्या कुछ कहा जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी नेता ममता बनर्जी हालिया घटनाक्रमों के लिए पूरी तौर पर भाजपा और उसके नेतृत्व को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। इसके अलावा उनके निशाने पर चुनाव आयोग भी है। ममता का आरोप है कि चुनाव आयोग की पूरी कार्रवाई स्वतः नहीं बल्कि भाजपा के निर्देश पर की गई है जो पक्षपातपूर्ण है। ममता का आरोप तो यहां तक है कि इतना कमजोर चुनाव आयोग कभी नहीं रहा। यह भी आरोप लगाया कि जिन अमित शाह की वजह से अराजकता की स्थिति उत्पन्न हुई उनको नोटिस तक आयोग की ओर से जारी नहीं किया गया। इस सब का क्या मतलब निकाला जा सकता है। कांग्रेस की ओऱ से भी संवाददाता सम्मेलन कर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए। कांग्रेस ने प्रचार पहले खत्म करने को लेकर आयोग को निशाने पर लिया और कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
की रैलियां होने देने के लिए किया गया। अगर हालात इतने खराब थे कि इस फैसले को गुरुवार सुबह से ही क्यों नहीं लागू किया गया। यह आरोप भी लगाया कि क्या आयोगभाजपा से निर्देश प्राप्त कर कार्रवाई कर रहा है। बसपा प्रमुख मायावती ने भी कहा है कि ममता बनर्जी को साजिश के तहत टारगेट किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि हिंसा जानबूझकर संघ और भाजपा की ओर से करवाई गई। उन्होंने चुनाव आयोग की ओर से की गई एकतरफा कार्रवाई के लिए चुनाव आयोग पर आरोप लगाए। सपा समेत कई अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।

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संभव है कि विपक्ष के आरोप गलत और राजनीति से प्रेरित हों और चुनाव आयोग पूरी ईमानदारी व निष्पक्षता से फैसले ले रहा हो, लेकिन अगर सवाल उठाए जा रहे हैं तो इसके जवाब उन कार्रवाइयों से ही दिए जा सकते हैं जिससे लगे कि सब कुछ ठीक चल रहा है। इस चुनाव आयोग के बारे में शायद आम लोगों को भी ऐसा नहीं लग रहा है। यह सब तब हो रहा है जब केवल एक चरण का मतदान बाकी है। इससे पहले फर्जी मतदान, मतदाताओं को मतदान से रोकने, बूथ कब्जों, हिंसा की वारदातें, ईवीएम में गड़बड़ियों की शिकायतें और मशीनों को कहीं अन्यत्र ले जाने की खबरें बताती हैं कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो गड़बड़ जरूरी है जिसकी परदादारी की जा रही है। इसे किसी भी तरह से लोकतंत्र के हित में नहीं माना जा सकता। इस तरह के अनेक कारण रहे हैं जिनकी वजह से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वनीयता को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो चुका है। इसे जितनी जल्दी बहाल किया जा सकेगा, देश, लोकतंत्र और खुद इस संस्था के लिए उतना ही अच्छा होगा।

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English summary
Who is responsible for crisis over the credibility of the Election Commission
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