Caste Census: जाति जनगणना का क्या होगा राजनीतिक परिणाम?

राजनीति के हर कदम के पीछे सोची-समझी रणनीति ही नहीं, सुचिंतित कारण भी होते हैं। यह अकारण नहीं है कि गांधी जयंती के दिन बिहार की नीतीश-तेजस्वी सरकार ने राज्य की जाति जनगणना को जारी किया। गांधीजी जाति की आधुनिक व्यवस्था को खत्म होते देखना चाहते तो थे, लेकिन जातियों के बीच आपसी खींचतान और सिर-फुटौव्वल की कीमत पर नहीं। लेकिन क्या बिहार की जाति गणना के आधुनिक आंकड़ों को इस नजरिए से देखा और परखा जा सकता है?

जाति जनगणना के आंकड़ों के जाहिर होने के बाद राज्य और देश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? इस पर चर्चा के पहले जाति पर गांधी के विचारों को जान लेते हैं। गांधी ने एक जगह लिखा है, "भारत में जाति व्यवस्था ने कुछ भारतीयों को आध्यात्मिक रूप से अंधा कर दिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक भारतीय, या अधिकांश भारतीय, जाति व्यवस्था, या संदिग्ध प्रामाणिकता और मूल्य के प्राचीन भारतीय ग्रंथों की हर चीज का आंख मूंदकर पालन करते हैं। किसी भी अन्य समाज की तरह भारत का मूल्यांकन उसके सबसे खराब नमूनों के व्यंग्यचित्र से नहीं किया जा सकता।"

Caste Census

राजनीति की ओर से जब भी भारत की जाति पर बात की जाती है, तब क्या गांधी की इन बातों का ध्यान रखा जाता है? इस सवाल का जवाब बिल्कुल ना में है। गांधी की कौन कहे, स्वाधीनता आंदोलन के साथ ही भारतीय संविधान सभा और संविधान के मूल्यों का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। संविधान के अनुच्छेद पंद्रह और सोलह में जो व्यवस्था की गई है, जातिवाद की राजनीति लगातार इसका उल्लंघन करती रही है।

संविधान के अनुच्छेद 15 का पहला भाग कहता है कि राज्य किसी नागरिक के विरूद्ध केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान अथवा इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा। इसके साथ ही अनुच्छेद 16 के पहले भाग पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसमें संविधान कहता है कि राज्याधीन नौकरियां या पदों पर नियुक्ति के संबंध में सब नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।

चूंकि स्वाधीनता संग्राम और संविधान सभा की चर्चाओं के दौरान स्वीकार्य धारणा रही कि भारत की कुछ जातीय समूह और समुदाय सामाजिक विकास की दौड़ में पिछड़े रह गए हैं। लिहाजा उन्हें आरक्षण दिया जाए। यह व्यवस्था पंद्रह साल के लिए की गई। ऐसा समझा गया कि इतने दिनों में स्वाधीन भारत की व्यवस्था विकास दौड़ में पीछे रह गए लोग मुख्यधारा में आ जाएंगे। शायद संविधान निर्माताओं ने नहीं सोचा था कि आरक्षण की यह व्यवस्था आने वाले दिनों में अपनी-अपनी जातियों के लिए ऐसा निजी दायरा साबित होगी, जिसे ताकतवर होने के बाद वह जाति बढ़ाने की कोशिश करेगी और इस बहाने में दूसरे जातीय समूहों पर अपना वर्चस्व बनाने में जुट जाएगी।

जाति की राजनीति आज यही कर रही है। अब जातियों का अपना-अपना दायरा बन गया है और उस दायरे को उस समुदाय के लोग बढ़ाने की कोशिश में हैं और इस बहाने राजनीतिक ताकत हासिल करने की कोशिश में है। चूंकि आज राजनीतिक ताकत आर्थिक हैसियत बनाने का भी जरिया हो गई है। इसलिए सारी जातियों की कोशिश इसी पर है। इन प्रयासों को धार और नेतृत्व जातियों के अपने-अपने नेता कर रहे हैं। बिहार की जाति जनगणना का असल मकसद यही है।

जब किसी जाति, समुदाय या समूह को लेकर कोई आंकड़ा आता है, तो नए सिरे से उसे राजनीतिक ताकत और आरक्षण आदि देने की मांग शुरू हो जाती है। इसलिए इसमें कोई दो-राय नहीं कि बिहार के जातीय आंकड़े सामने आने के बाद ऐसी मांग शुरू होगी। जैसे अब तक माना जाता था कि कोइरी और कुशवाहा जाति के लोगों की संख्या कुर्मी समाज की तुलना में कम है। लेकिन नए आंकड़े बताते हैं कि बिहार के अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों में सबसे ज्यादा यानी 14.2 प्रतिशत वाले यादव समुदाय के बाद कुशवाहा जाति ही है। जिसकी संख्या करीब 4.21 प्रतिशत है। इसी तरह दुसाध या पासवान की संख्या 5.3 प्रतिशत है। इसके बाद नंबर है रविदास या चमार कही जाने वाली जाति का, जो करीब 5.2 प्रतिशत है। अति पिछड़ा समुदाय के जातियों वाले लोगों की संख्या कुल जनसंख्या का 36 प्रतिशत से ज्यादा है।

प्रचलित राजनीतिक मानकों पर भी इन जातियों के संदर्भ में राजनीतिक नेतृत्व को देखिए। कांशीराम ने एक नारा दिया था, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। यह नारा बेशक दलितवादी राजनीति ने दिया, लेकिन इसे धीरे-धीरे पिछड़ावाद की राजनीति करने वाले समाजवादी खेमे ने अख्तियार कर लिया। अब तो वह कांग्रेस भी यह नारा लगा रही है, जिसने 1984 में नारा दिया था, जात पर न पांत पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर।

अगर इस लिहाज से देखें तो बिहार को अगर पिछड़ावादी होना होगा या हिस्सेदारी देनी होगी तो रविदास समुदाय के नेतृत्व को ताकत देना होगा। इसी तरह यह भी पूछा जा सकता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति के दौर में आखिर क्यों पूरी ताकत यादव जाति के पास ही रही। अगर वह छिटकी भी तो कुर्मी समुदाय के नीतीश के पास पहुंच गई। आखिर यह ताकत किसी कुशवाहा या कोइरी समुदाय के नेता के पास क्यों नहीं गई?

जाति जनगणना के आंकड़ों के बाद जब हिस्सेदारी का विश्लेषण होगा तो ये सारे सवाल उठेंगे। राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर जब बात होगी तो न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का भी जिक्र जरूरी होगा। रोहिणी आयोग का नतीजा है कि पिछड़ावाद के आरक्षण में सिर्फ चार ताकतवर जातियों को ही फायदा हुआ है। देर-सेवर रोहिणी आयोग की रिपोर्ट जारी करने का केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ेगा। हो सकता है कि राजनीति के तहत वह इसे जारी भी कर दे।

इससे साबित होगा कि रोहिणी आयोग ने पिछड़े समुदाय की जिन दबंग जातियों पर आरक्षण का फायदा उठाने की बात कही है, कुछ वैसी ही स्थिति राजनीति की भी है। इससे आज के पिछड़ावादी राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल उठेंगे। तब दूसरी जातियों की ओर से दबाव बढ़ेंगे। ऐसे में सवाल यह है कि क्या महज दो फीसद से कुछ ज्यादा की संख्या वाले समुदाय के नेता नीतीश त्याग कर पाएंगे या फिर पिछड़ा समुदाय की दबंग जाति यादव के नेता तेजस्वी यादव त्याग करके नेतृत्व अति पिछड़ा वर्ग की जातियों के नेताओं के लिए छोड़ेंगे?

इन सवालों का जवाब ना में है। जाहिर है कि यह जवाब ही नए राजनीतिक टकराव की वजह बनेगा। अब तक होता यह था कि पिछड़ावादी राजनीति सवर्ण राजनीति पर हमलावर थी। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। सवर्णवादी राजनीति तो अल्पसंख्यक हो गई है। आंकड़ों ने इसे स्थापित कर दिया है। इसका असर यह होगा कि देर-सवेर वह खुद को अल्पसंख्यक घोषित करने की मांग करेगा। अब अगली लड़ाई पिछड़ावादी और अति पिछड़ावादी राजनीति में होना है।

इस सियासी संघर्ष में समाजवादी पृष्ठभूमि वाली राजनीति का आगे आ पाना मुश्किल होगा, क्योंकि पिछड़ावादी राजनीति से सिर्फ कुछ दबंग जातियों के ही नेता उभरे हैं। जबकि पिछले कुछ वर्षों में अति पिछड़ों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने खूब काम किया है। नीतीश और तेजस्वी ने जाति जनगणना तो एक तरह से बीजेपी पर हमले के लिए कराई, लेकिन उसके नतीजे अगर उनके लिए ही भस्मासुर बनते नजर आने लगें तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

वैसे आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए कि राजनीति इतनी परिपक्व हो कि महज कुछ लाख की जनसंख्या वाली नाई जाति का कोई कर्पूरी ठाकुर राज्य का नेता बनकर उभर सके। जिसकी योग्यता उसकी जाति नहीं, उसकी निष्ठा और सर्वस्वीकार्यता हो। जाति जनगणनाएं सर्व स्वीकार्यता की राजनीति का आधार नहीं हो सकती। वह अपनी-अपनी जातियों को ताकतवर बनाने और दूसरी को कमतर दिखाने और इस पूरी प्रक्रिया में सियासी संघर्ष पैदा करने का जरिया ही बन सकती है। दुर्भाग्यवश इस तथ्य को समझने की कोई कोशिश नहीं कर रहा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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