क्या है Digital Rupee? यह कैसे काम करता है?

डिजिटल रूपी के तौर पर भारत में दो प्रकार के डिजिटल करेंसी जारी की गई है। एक है CBDC-W और दूसरा है CBDC-R। पहला होलसेल भुगतान में प्रयोग होगा और दूसरा फुटकर भुगतान में। यहां CBDC का मतलब सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी है।

Digital Rupee: डिजिटल होती दुनिया में जहां लोग अब चाय और पान का भुगतान भी डिजिटल करने लगे हैं, वहां डिजिटल रूपये का आना स्वाभाविक ही था। विनियम के माध्यम में डिजिटल करेंसी की अनुपस्थिति के कारण ही क्रिप्टो करेंसी अपना पैर पसार रही थी जिससे भारत समेत कई सरकारें चिंतित थीं। हालांकि वह करेंसी की जगह निवेश का प्रकार था लेकिन भुगतान में स्वीकार होने के कारण वह करेंसी का स्थानापन्न भी बन रहा था। इन्हीं सब बातों को दृष्टिगत रखते हुए और डिजिटल दुनिया से कदमताल करते हुए रिजर्व बैंक ने आखिर डिजिटल रूपये में प्रवेश कर ही लिया।

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    What is Digital Rupee and How does this work know rbi digital rupee uses benefits

    एक दिसंबर से रिटेल डिजिटल रुपये के इस्तेमाल का पहला मौका मुंबई, नई दिल्ली, बेंगलुरु और भुवनेश्वर के लोगों को मिला है। इसके बाद इसे अहमदाबाद, गंगटोक, गुवाहाटी, हैदराबाद, इंदौर, कोच्चि, लखनऊ, पटना और शिमला जैसे शहरों में जारी किए जाने की योजना है। आम आदमी को जारी किये गए इस डिजिटल करेंसी को लेकर लोगों के मन में कई जिज्ञासाएं हैं।

    कैसा होगा डिजिटल रुपया?

    यह डिजिटल टोकन के रूप में होगा। जैसे आप अपनी गाड़ी की आरसी और ड्राइविंग लाइसेंस एक डिजिटल लॉकर में रखते हैं और अब गाड़ी चलाते वक़्त आपको ओरिजिनल डाक्यूमेन्ट लेकर चलने की जरुरत नहीं है। आप अपने डिजिटल लॉकर में डिजिटल फॉर्म में रखी आरसी और ड्राइविंग लाइसेंस दिखा सकते हैं। डिजिटल रूपया भी कुछ ऐसा ही समझिये। यह टोकन एक "बेयरर इंस्ट्रूमेंट" की तरह होगा, एकदम बैंकनोट्स की तरह। इसका अर्थ है कि जो कोई भी एक समय विशेष पर इस टोकन का धारक होगा वही उसका स्वामी होगा। हां इसके लिए जेब की जगह डिजिटल डिवाइस या मोबाइल की जरुरत पड़ेगी।

    डिजिटल वॉलेट में करेंसी कौन डालेगा?

    फिलहाल रिजर्व बैंक अप्रत्यक्ष मोड का इस्तेमाल कर रही है। रिजर्व बैंक अन्य बैंकों के माध्यम से इसे आम आदमी के पास पहुंचा रही है। एक दिसंबर को पहले चरण के रूप में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, आईसीआईसीआई बैंक, यस बैंक और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में इसे शुरू किया जा रहा है।

    RBI के अनुसार, इसमें भागीदारी के लिए कुल आठ बैंकों की पहचान की गई है। आम आदमी इनके माध्यम से अपना डिजिटल वॉलेट अपने डिवाइस में खुलवा सकता है और इसमें पैसा लोड करवा सकता है। इसके लिए जरुरी नहीं है कि उसका बैंक में अकाउंट हो। इस डिजिटल वॉलेट में उसके पास रुपया या पैसा उसी रंग रूप और डेनोमिनेशन में टोकन रूप में होंगे जैसे असल में पेपर करेंसी में होते हैं। इसका मूल्य भी पेपर करेंसी के बराबर ही होगा। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लोगों को लगे कि यह वाकई में वही करेंसी है जो भौतिक रूप में उनके पास अब तक होती रही है।

    यह क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग या UPI से कैसे अलग है?

    क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग या UPI ऐसे मध्यस्थ हैं जो अपनी तरफ से धारक को जमा या क्रेडिट की सुविधा देते हैं। इसमें कहीं भी रिजर्व बैंक की गारंटी नहीं जुड़ी होती है। आपने जितना जमा किया या आपको जितना क्रेडिट मिला उतने का आप ट्रांसफर, डिपाजिट या पेमेंट कर सकते हैं। बैंक इसका अकाउंट लेजर भी बनाती है। क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग या UPI की व्यवस्था में अंतिम दायित्व बैंक या वित्तीय संस्थान का होता है, रिजर्व बैंक का नहीं। जबकि डिजिटल करेंसी में पूरा दायित्व रिजर्व बैंक का होती है। इसे आप ऐसा समझिये कि डिजिटल माध्यम से रिजर्व बैंक धारक को उसके वॉलेट में रखे टोकन की राशि का भुगतान का वचन देता है, जैसा आप हर पेपर नोट में पाते हैं।

    यदि यह डिजिटल वॉलेट है तो अन्य पेमेंट एप की तरह क्या इंटरनेट की जरुरत पड़ेगी?

    ऐसा नहीं है। अन्य डिजिटल भुगतान माध्यम की तरह इससे भुगतान के लिए इंटरनेट की जरुरत नहीं है। जैसे आप अपने जेब में नोट लेकर घूमते हैं वैसे ही इसे अपने मोबाइल या डिजिटल डिवाइस में लेकर घूमिये और जब भुगतान करना हो तो क्यूआर कोड से भुगतान कर दीजिये। यह डिवाइस से क्यूआर कोड का ट्रांजेक्शन है इसमें तीसरे माध्यम की जरुरत नहीं है। डिजिटल वॉलेट से पर्सन-टु-पर्सन या पर्सन-टु-मर्चेंट ट्रांजैक्शन कर सकेंगे।

    क्या यह बैंकों में पैसा जमा करने जैसा है?

    बिल्कुल नहीं। यह आपके जेब में रखे नोट को खर्च करने जैसा है। जैसे जेब से नोट निकालकर खर्च करने से आपके और नोट के बीच कोई नहीं आता, वैसे ही यह पूरी तरह से आपके और डिजिटल रूपी के बीच का मामला है। बैंक केवल मध्यस्थ हैं। जैसे बैंक एटीएम में पैसा डालता है और आप पैसा निकालते हैं, कुछ वैसा ही बैंक के स्तर पर होगा। बैंक से पैसा वॉलेट में ट्रांसफर हुआ तो बैंक की जिम्मेदारी खत्म जैसे बैंक से नगद निकालने पर होती है। इसकी पूरी जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की होती है।

    अब एक सवाल और उठता है कि क्या बैंक नोट की तरह यह धारक की गोपनीयता बरकरार रख पायेगा? सवाल जायज है क्यूंकि बैंकनोट में यह पता नहीं चल पाता है कि किस किस से गुजर के आया है, जबकि डिजिटल माध्यम में कुछ तो पदचिन्ह रह ही जाते हैं। स्पष्ट बोलें तो अभी भी यह चुनौती है किसी भी सीबीडीसी के लिए। अधिकांश देशों के केंद्रीय बैंकों और अन्य पर्यवेक्षकों का विचार है कि शत प्रतिशत गोपनीयता से शैडो इकॉनमी और अवैध लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा, इसलिए रिजर्व बैंक का भी मानना है कि छोटी राशि तक तो ठीक है लेकिन बड़ी राशि के लिए गोपनीयता का फीचर मुश्किल है। ऐसा करना इसके जारी करने के उद्देश्य को प्रभावित करेगा।

    डिजिटल डिवाइस खोने पर क्या होगा?

    ऐसे में परीक्षण तो जारी है लेकिन कांसेप्ट नोट में दो मॉडल का विकल्प बताया गया है। पहला कस्टोडियन मॉडल जिसमें टोकन 'सेवा प्रदाता (TSP) डिजिटल चाभी के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है तथा इसकी रिकवरी की जा सकती है। लेकिन दूसरा विकल्प जो है उसमें डिजिटल चाभी की जिम्मेदारी डिवाइस होल्डिंग यूजर की होगी जिसके पास डिवाइस है। वहां वही हाल होगा जैसे आपके पर्स खोने पर उसे पुनः नहीं पाते, वैसे इसमें भी गायब तो गायब। इन विकल्पों में किसे चुनना बेहतर होगा परीक्षण में पता चल जायेगा।

    हालांकि सरकार का मानना है कि डिजिटल रूपी के जारी होने से थर्ड पार्टी को जानकारी शेयर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। निजता बरकरार रहेगी। नगदी पर निर्भरता घटेगी। फिजिकल रुपए को छापने की लागत घटेगी। नगद अर्थव्यवस्था घटाने का लक्ष्य पाने में मदद मिलेगी। लेनदेन की लागत घटाने में भी मदद मिलेगी। लेकिन सुरक्षा और गोपनीयता में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। साइबर सिक्योरिटी के भी बहुत प्रश्न सामने आएंगे जैसे व्यक्ति के मोबाइल को ही किसी ने हैक कर लिया तो? ऐसे में अपना बटुवा खुद ही सम्भालों के सिद्धांत पर उसके पैसे तो डूब जायेंगे। सब अच्छा होने पर भी जन सामान्य ने इसे मान्य कर लिया तभी अच्छा माना जाएगा।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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