Uttar Pradesh Politics: जातीय जनगणना बिहार में लेकिन यूपी बनेगा मुख्य सियासी अखाड़ा
Uttar Pradesh Politics: इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 90 के दशक में बिहार की भूमि पर घटित एक घटना ने हिन्दुत्व की राजनीति को धार दी थी। उस समय रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए निकली रामरथयात्रा को लालू प्रसाद यादव ने बिहार में रोक दिया था। इसकी प्रतिक्रिया ने हिन्दुत्ववादी राजनीति को नयी धार दे दी।अब लगभग साढ़े तीन दशक बाद लालू के पुत्र तेजस्वी और नीतीश कुमार की संयुक्त सरकार ने जातीय जनगणना के आंकड़े जारी कर भाजपा को एक बार फिर प्रखर हिंदुत्व का कार्ड खेलने का मौका दे दिया है।
इसका संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में आयोजित सभा से दे भी दिया है। भाजपा एक ओर जहां केन्द्रीय स्तर पर हिन्दुत्व को मुद्दा बनायेगी, वहीं स्थानीय सरकारों के सामने गरीबी का मुद्दा उठायेगी। इस तरह जातिवादी राजनीति की काट के तौर पर भाजपा हिन्दुत्व के साथ अंत्योदय का प्रयोग करने के लिए तैयार हो रही है।

छत्तीसगढ के जगदलपुर में प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर हिंदुओं तथा गरीबों को बांटकर देश को तबाह करने का आरोप लगाया। मोदी ने गरीबों के कल्याण को मुद्दा बनाया और कहा कि उनके लिए गरीब ही सबसे बड़ी जाति है। उन्होंने आबादी के हिसाब से हक देने की बात पर कांग्रेस की अल्पसंख्यक नीति पर प्रहार किया और कहा कि 'कांग्रेस आबादी के हिसाब से हक देने की बात कहकर क्या अपने उस एजेंडे से पलट रही है जिसमें उसने देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों का बताया था। अगर आबादी के हिसाब से हक मिलना चाहिए तो क्या हिंदुओं को आगे आकर सभी हक ले लेना चाहिए।' साफ है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने एजेंडा तय कर लिया है।
भाजपा के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि 'भाजपा जातीय जनगणना की विरोधी नहीं है लेकिन विपक्ष की तरह हमारा मकसद गरीबों को जातियों में बांटकर उनको बरगलाना नहीं है। हमारे लिए गरीब सबसे बड़ी जाति है। हम समाज में बिना संघर्ष पैदा किए सबके कल्याण के लिए काम करना चाह रहे हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में ही केंद्र में सरकार संभालते ही 'सबका साथ-सबका विकास-सबका प्रयास-सबका विश्वास' के मंत्र पर विकास की रूपरेखा तय कर दी थी।' उनका कहना है कि 'भाजपा लोगों को याद दिलाएगी कि जाति जनगणना के नाम पर लोगों को बरगलाने वालों का मकसद उनका कल्याण नहीं बल्कि भाजपा सरकार के कल्याणकारी कार्यों में रोड़े डालकर गरीबों को उनके हक से वंचित करना है।'
आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी की बात भी भाजपा नेता की बातों की पुष्टि करती है। प्रो. तिवारी कहते हैं कि 'प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लगभग साढ़े नौ साल और योगी के लगभग साढ़े छह साल के शासन में गरीब कल्याण योजनाओं, मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली कनेक्शन, मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन, पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन, नीट में पिछड़ों को आरक्षण, प्रधानमंत्री आवास, चिकित्सा के लिए आयुष्मान कार्ड जैसी तमाम योजनाओं के सहारे सरकार ने करोड़ों शोषित व वंचित परिवारों से सीधे संवाद व संपर्क स्थापित कर लिया है। जाति जनगणना जैसे दांव की काट भाजपा इन योजनाओं से लाभान्वित होने वाले लोगों की लामबंदी से करेगी। जैसा प्रधानमंत्री ने कहा भी है कि उनके लिए गरीब ही सबसे बड़ी जाति है।'
दरअसल, भाजपा ने अति पिछड़ी और अति दलित जातियों को आरक्षण का लाभ देने के लिए आरक्षण में अलग आरक्षण देने का प्रयोग यूपी में किया था। मतलब पिछड़ी और अनुसूचित जातियों को मिले आरक्षण का बड़ा हिस्सा हथियाने के विरोध की आवाज कोई 23 साल पहले यूपी में भाजपा ने ही उठाई थी। राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार ने सामाजिक न्याय समिति का गठन करके अनूसूचित जाति को मिलने वाले 21 प्रतिशत आरक्षण को उस श्रेणी में आने वाली लगभग 65 जातियों में तथा पिछड़ों को मिलने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण को इस श्रेणी में आने वाली लगभग 80 जातियों के समूहों में बांटकर गैर यादव पिछड़ी और गैर जाटव दलित जातियों को लाभान्वित करने का फैसला किया था।
भाजपा की तरफ से ही नहीं अति पिछड़ी जातियों के संगठनों की तरफ से भी लगातार सपा पर अति पिछड़ों का हक मारने का आरोप लगता रहा है। मोस्ट बैकवर्ड क्लासेज ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राम सुमिरन विश्वकर्मा आरोप लगाते हैं कि 'आरक्षण में आरक्षण के फार्मूले के खिलाफ सपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के इशारे पर राजनाथ सिंह सरकार में शामिल उनके एक सजातीय मंत्री ने न्यायालय में याचिका दायर कर स्थगन आदेश ले लिया था। बाद में 2002 में भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद मुख्यमंत्री बनी मायावती ने जुलाई 2002 में इस रिपोर्ट को वापस ले लिया था। इससे अति पिछड़ों को समूहों में बांटकर उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सका।
जाहिर है कि भाजपा इस मुद्दे पर सपा को घेरकर विपक्षी गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटों वाले राज्य यूपी में जरूर घेरेगी। भाजपा के सहयोगी दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (एस), निषाद पार्टी जैसे संगठनों के अलावा अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए तमाम संगठन बनाकर संघर्ष कर रहे नेताओं की तरफ से भी इस मुद्दे पर सपा के साथ कांग्रेस तथा अन्य दलों को घेरने की कोशिश होगी।
यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि ये सवाल तो बिहार में भी उठेंगे तो यूपी मुख्य अखाड़ा क्यों बनेगा? तो इसकी और भी खास वजह है। एक तो उत्तर प्रदेश देश की सर्वाधिक आबादी और लोकसभा की सबसे अधिक 80 सीटों वाला प्रदेश है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से सांसद हैं। स्वाभाविक रूप से लोकसभा चुनाव में विपक्ष के मुख्य निशाने पर मोदी ही होंगे। ऊपर से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के यूपी से ही लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा भी है। नीतीश यूपी से चुनाव लड़ें या न लड़े लेकिन मोदी के कारण इस मुद्दे पर यूपी में ही सबसे ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप होना तय है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि जातीय जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए हिंदुओं को बांटने का आरोप उस समय लगाया है, जब अयोध्या संघर्ष के रास्ते से सफलता के मार्ग पर चलते हुए श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण और उसमें रामलला की मूर्तियों की प्रतिष्ठा करने के लक्ष्य को प्राप्त करने वाली है। सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो जनवरी में प्रधानमंत्री मोदी पूजन करके रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह में स्थापित कर हिंदू समाज के लगभग 500 वर्षों से ज्यादा संघर्ष की सफलता का शंखनाद करेंगे।
काशी से लेकर कांची तक और केदारधाम से लेकर महाकाल के धाम तक सनातन संस्कृति के सरोकारों को सहेजने और उस पर गौरव की सार्वजनिक उद्घघोषणा करने वाले मोदी रामलला की मूर्तियों की प्रतिष्ठा के मौके पर हिंदुत्व के शंखनाद से चूकने वाले नहीं है। छत्तीसगढ़ के संकेतों को समझे तो मोदी जातीय जनगणना के दांव की काट के लिए अयोध्या से हिंदुत्व का एजेंडा सेट करेंगे, जिसमें गरीबों का कल्याण भी होगा और भ्रष्टाचार पर प्रहार भी।
उत्तर प्रदेश सर्वाधिक आबादी और सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले प्रदेश के साथ ऐसा राज्य भी है जिसके कई जिलों में मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है। आबादी के लिहाज से सबको हक देने की कांग्रेसी मांग पर प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह यह सवाल दागा है उससे यह साफ है कि आने वाले चुनाव में वह देश के सबसे ज्यादा आबादी और लोकसभा की सीटों वाले राज्य के मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश जरूर करेंगे कि कांग्रेस की नीति लागू हुई तो मुस्लिम समाज को वह भी नहीं मिलेगा जो अभी मिल रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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