NOTA: वोट की बर्बादी या लोकतंत्र की मजबूती, क्या करता है नोटा?
NOTA: आमतौर पर यह समझा जाता है कि ईवीएम मशीन पर नोटा का बटन दबाना अपना वोट बर्बाद करने जैसा है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है? क्या नोटा एक कीमती वोट की बर्बादी है या फिर यह लोकतंत्र की मजबूती का बड़ा जरिया साबित हो सकता है?
नोटा को हम इस तरह से समझ सकते हैं कि किसी सवाल का जवाब देते समय 'इनमें से कोई नहीं' (None of the Above) का विकल्प आप तब चुनते हैं, जब आप यह मान चुके होते हैं कि उपलब्ध विकल्पों में से कोई उत्तर सही नहीं है। चुनावों में यही काम नोटा करता है।

हालांकि बहुत सारे लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि जब हमारे सामने वोट न देने का विकल्प खुला है तो इस विकल्प को चुनने के लिए मतदान केंद्र तक जाने, वहॉं लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने की जहमत उठाने की क्या जरूरत है? आखिर देश के करीब एक तिहाई मतदाता मतदान बूथ तक कहां जाते हैं?
लेकिन, वोट न डालने वालों और नोटा चुनने के लिए मतदान केंद्रों पर जाने वालों में काफी फर्क होता है। जो मतदान स्थल तक जाते ही नहीं उनके भीतर नापसंदगी, गैरजिम्मेदारी, आलस्य, व्यस्तता, अरुचि जैसी बहुत सारी वजह हो सकती हैं, लेकिन नोटा बटन दबानेवालों के पीछे एक ही वजह हो सकती है कि वो अपने चुनाव क्षेत्र में खड़े किसी भी उम्मीदवार को चुने जाने योग्य नहीं मानता है। इसलिए समय निकालकर नोटा बटन दबाने जाता है।
वोट न डालना राजनीति से आपके मोहभंग का भी परिचायक है, जबकि नोटा को चुनना बताता है कि आपको राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पूरा विश्वास है, मगर आपके सामने जो उम्मीदवार खड़े किए गए हैं, उनमें से किसी पर आपको विश्वास नहीं है।
नोटा बेशक भारत में एक दशक पहले ही पेश हुआ है, लेकिन यह हमारे यहॉं लोकतंत्र के आगमन से पहले से अस्तित्व में है। नोटा दुनिया के कई देशों में अलग-अलग नामों से चलन में है। स्वीडन में बीसवीं सदी के आरंभ से ही खाली मतपत्र जमा करने को प्रोटेस्ट वोट के रूप माना जाता था। '70 के दशक में लोकतांत्रिक होने की प्रकिया में स्पेन ने भी ब्लैंक वोट को नोटा के रूप में अपनाया।
वर्ष 2008 में बांग्लादेश ने 'नो वोट' का विकल्प पेश कर दिया था। यूक्रेन में यह वर्ष 2010 में 'अगेंस्ट ऑल' के नाम से पेश किया गया। रूस और बेलारूस में भी यह इसी नाम से वर्ष 2013 में लाया गया। पाकिस्तान और भारत में यह आया वर्ष 2013 में, नाम था नोटा। नेपाल में यह 'नन ऑफ द कैंडिडेट्स' के नाम से प्रचलित है। इनके अलावा और भी कई देश हो सकते हैं, जिन्होंने पिछले एक-दो दशकों में लोकतंत्र को जवाबदेह बनाने और चुनाव सुधार के उद्देश्य से नोटा को अपनाया होगा।
भारत में नोटा को चुनाव विकल्पों में शामिल कराने में पीयूसीएल (पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) जैसे संगठनों की काफी बड़ी भूमिका रही है। पीयूसीएल ने वर्ष 2004 में चुनावों में पारदर्शिता को बढ़ावा देने और मतदाता की गोपनीयता की रक्षा के लिए नोटा लाए जाने की मॉंग के साथ एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। इसके आधार पर कोर्ट ने वर्ष 2013 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह ईवीएम और बैलेट पेपर पर मतदाताओं के समक्ष नोटा को एक विकल्प के रूप में शामिल करे ताकि उन्हें नेगेटिव वोटिंग का अधिकार मिल सके।
दिलचस्प बात यह है कि यह फैसला देने वाली पीठ में शामिल जजों ने इसे संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार का एक अंग माना था। सामाजिक संगठनों के समर्थन और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने नोटा का रास्ता साफ कर दिया और भारतीय चुनाव आयोग ने वर्ष 2014 के आम चुनावों में इसे लागू कर दिया।
सिद्धांतत: नोटा की ताकत यह है कि यह मतदाता को ज्यादा बुरे और कम बुरे उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने की मजबूरी से मुक्ति के साथ साथ किसी को भी न चुनने की शक्ति प्रदान करता है। लागू होने के दस साल के भीतर ही नोटा बटन दबानेवालों की संख्या में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2014 में नोटा को 1.08% वोट मिले थे, लेकिन, वर्ष 2019 में स्थिति में नोटा को कुल वोट का 1.06% प्रतिशत प्राप्त हुआ। इनको अगर आंकड़ों में देखें तो 2014 में कुल 60 लाख वोट नोटा को मिले वहीं 2019 में कुल वोट बढ़ने के कारण यह संख्या बढकर 65 लाख हो गई। यानी इतनी बड़ी संख्या में वोटरों ने किसी भी उम्मीदवार को इस योग्य नहीं माना कि उसे वोट देने लायक समझ सके।
नोटा के तहत प्रावधान है कि किसी चुनाव क्षेत्र में अगर नोटा को सबसे ज्यादा वोट शेयर मिलता है तो वहॉं दोबारा चुनाव आयोजित किए जाएगा। बेशक अभी तक हमने नोटा के कारण ऐसा कोई चमत्कार होते हुए नहीं देखा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में भी ऐसा कभी नहीं हो सकता। नेपाल में वर्ष 2017 में भरतपुर महानगर और बहिराबस्ती नामक दो चुनाव क्षेत्रों में 'नन ऑफ द कैंडिडेट्स' ने बाकी उम्मीदवारों से ज्यादा, क्रमश: कुल पड़े 90,000 वोटों में से 25,000 और 37,000 में से 11,000 वोट हासिल किए। इसका नतीजा यह निकला कि वहॉं फरवरी 2018 में नए उम्मीदवारों के साथ फिर से चुनाव हुए।
अगर आप सोच रहे हैं कि नेपाल एक छोटा सा देश है तो दूसरा उदाहरण, क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया के सबसे बड़े और सर्वाधिक आबादी वाले दस देशों की सूची में नौंवे स्थान पर मौजूद देश रूस का है। यहॉं वर्ष 2012 में 'अगेंस्ट ऑल' को देश भर में करीब पॉंच प्रतिशत मत हासिल हुए थे। लेकिन, दिलचस्प रूप से हैरान करने वाली बात यह रही कि चार चुनाव क्षेत्र ऐसे भी थे, जहॉं 'अगेंस्ट ऑल' को राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से भी ज्यादा वोट मिले। राष्ट्रीय स्तर पर तो उनकी दावेदारी पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन नियम के मुताबिक इन चारों स्थान पर दोबारा चुनाव हुए।
ये दो उदाहरण दर्शाते हैं कि नोटा इतनी मामूली चीज नहीं है। इसे लेकर निराश होने जैसी कोई बात नहीं है। जरूरत इसके उपयोग को लेकर जागरुकता बढ़ाने की है, लोगों को यह बताने की है कि अगर उन्हें किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना, तब भी मतदान केंद्र पर जरूर आएं और मतदान के जरिए अपनी असहमति जताने के अधिकार का इस्तेमाल करें।
वर्ष 2014 में भाजपा के विजेता उम्मीदवारों को औसतन 32.7% और वर्ष 2019 में कांग्रेस के विजेता उम्मीदवारों को औसतन 31.6% वोट हासिल हुए थे। अर्थात एक तिहाई से कम वोट पाकर भी इनके उम्मीदवार जीत गए। सोचिए, अगर मतदान के दौरान घर में बैठे रहने वाले एक तिहाई से अधिक मतदाता नोटा को चुनने के लिए मतदान केंद्रों पर पहुँचने लगें तो लोकतंत्र की सूरत और सीरत बदलने में देर नहीं लगेगी।
इसका पहला असर तो यही होगा कि देश में दर्जनों सीटों पर पुनर्मतदान की जरूरत होगी। बार-बार इस स्थिति से बचने के लिए राजनीतिक दलों को ज्यादा योग्य और ज्यादा जवाबदेह उम्मीदवार मैदान में उतारने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उम्मीदवारों का चयन करते समय वो अपनी मनमानी करने से बचेंगे। इससे निश्चय ही लोकतंत्र, देश और समाज में काफी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे... और यही नोटा का उद्देश्य भी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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